जिएऔर लिखे के बीच का फ़र्क

नीलकमल

दिखे और लिखे से
झांकने लगे
पकडना मेरा गिरेबान
मेरे गुनाहो का हिसाब लेना
कभी दस्खत मत करना
एक बेईमान कवि की बात पर

यह पैमाना चरित्र का है ,व्यक्तित्व का है और कविता का है। जो जीवन में बेईमान और घूस खोर होगा कवि हो नही सकता।अगर कविता उस कतार में खडी है जहां भ्रष्टाचार के मानक तय हो रहे है तो कहना पडेगा कि कविता को भी भ्रष्टाचार का प्रतीक बनने से अब रोका जाना चाहिए।‘  कविता और लेखक के बीच सामाजिक मानवीय सरोकारों के पुल को जर्जर होकर टूटते जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए नील कमलकी कविताओं के गहरे सामाजिक संदर्भों पर चर्चा कर रहे हैं निलय उपाध्याय‘..| संपादक 

‘कही-अनकही’ कविता की’

किसी ने तो कही,अनकही कविता की।
बनारस में जन्मे और कलकत्ता में रहने वाले नील कमल ने कही , वह अनकही जो कविता की थी।
नील कमल चुनौती भरे लहजे में कहते है-

भाड में अकेले चने सी
खनखनाएगी,
भले ही वह हार जाएगी

इतना बडा भाड । इतनी बडी दुनिया। सत्य के साथ एक चना अकेला खनखनाता रहेगा,भले ही हार क्यो न जाय। खनखनाना एक क्रिया है, जिसका प्रयोग भोजपुरी में मिलता है। जेब में रेजगारी खनखनाती है। जब जब समय का घडा हिलेगा, कवि का चना बजेगा, यह चना भूंजा नहीं गया है, इसमें अंकुरण की क्षमता है। वह किसी खेत में अंकुरित होने की क्षमता रखता है, लेकिन जब वह हारने की नीयति स्वीकार करता है कि वह महज कवि नही कविता का कार्यकर्ता है।
नील कमल के पास जीवन और कविता का यह गर्व है। यह बात इसलिए कह रहा हूं कि मै नील कमल से दो बार मिल चुका हूं। एक बार कलकत्ता में एक बार दिल्ली मे।कई बार फ़ोन से बात चीत हुई है ।
गोरा रंग,सुदर्शन चेहरा। हमेशा प्रसन्न चित रहने वाली मुस्कान।
गंगा यात्रा के दौरान मैं कलकत्ता गया था। कई मित्र मिले । राकेश और नील कमल के घर भी गया था। वहां पता नील कमल की दूसरी किताब प्रेस में थी।
मैं चौंका-प्रेस में मतलब
मैं अपनी किताबों को खुद छपवाता हूं।
सच कहता हूं मुझे धक से लगा।
मन मे आया अरे इस देश में साहित्य अकादमी करोडो का खर्च कर विश्व कविता आयोजन करवा रही है और नील कमल जैसा लेखक अपनी किताब खुद छपवा रहा है।
नौ हजार रूपए, तीन सौ प्रतिया।
मन में आया कि सारे कवि जुगाड लगा कर कहीं न कही छपवा ही लेते है, नीलकमल भी छपवा लेते लेकिन कुछ तो अलग है, लगा कि एक कवि कही न कहीं कवियों की भीड से अलग रास्ता खोज रहा है,कविता में भी कविता के बाहर भी।नील कमल नौकरी करते है ,उनकी पत्नी भी नौकरी करती है। उनकी बहन भी कविताए लिखती है। उनके पास बनारस का अपना गांव है, खेत है । साहित्य का संस्कार पिताजी से मिला।
उन्होंने भोजपुरी संस्कृति से बांग्ला संस्कृति की यात्रा की।
नील कमल को मैने परिवार में,नौकरी में, साहित्य में ,जहां देखा एक परिपक्व संस्कारित ब्यक्तित्व की तरह देखा। उनके साथ मैं बांग्ला के कई लेखको से मिला। उनके साथ बात चीत हुई। न किसी की व्यक्तिगत प्रशंशा न आलोचना। कविता कैसी हो यह चिन्ता।
प्रकाशन की सूचना से यह तय हो गया कि यह स्वाभिमान का वह रास्ता है जो नीलकमल ने, साहित्य के प्रलोभनो से अलगकविता की दुनिया में अकेले चलते रहने के लिए चुना है और उसी का परिणाम है कि उनकी कविता पढते हुए कहना चाहता हूं कि नील कमल की कविताए किसी बंधन किसी कन्फ़्यूजन में नहीं है, उन्हें मालूम है कि कविता कैसी चाहिए ? जिस तरह की कविता वे चाहते है उसके लिए कवि कैसे चाहिए।मेरे लिए यह वह अनकही है जो कविता में नहीं कही गई और न हाल के कवियों के जीवन में दिखी।
कोई कवि अनकही कहता है तो कविता का नया मार्ग तलाशता दिखता है,कविता का बंधन तोडता दिखता है , मुक्ति का वह मार्ग तलाशता दिखता है, जिसका उद्देश्य सबसे नीचे खडे आदमी का हित करना है,अपने हित को प्रकृति से जोड कर देखना है। खाट एक तरफ़ बुनी जाती है, दूसरी ओर उसकी बुनावट अपने आप हो जाती है। कुछ काम अपने हो जाते है। कुछ मुफ़्त के यश भी मिल जाते है। बिना कुछ किए उनकी पहचान ऎसे कवि आलोचक की बन जाती है जो लेखक नकली लेखको के गर्व को शर्म के रूप में चिह्नित करता है।जो नकली प्रकाशन संस्थाओ के गर्व को शर्म के रूप में दर्ज करता है।
लेखक के रूप में वह समाज का सजग प्रहरी है। वह हमे यकीन दिलाता है कि इस समय को चाहे तो कवि साफ़ कर सकते है, कविता साफ़ कर सकती है।उसे कविता पर यकीन है, कविता से होने वाले बदलाव पर यकीन है। वह चुनौतियों को बढा चढा कर नहीं बताता। उसे मालूम है कि आज के समय को जितना चुनौती पूर्ण बताया जाय, कबीर और लोदी काल,तुलसी और मुगल काल, मिर्जा गालिब और १८५७ के अंग्रेजो का काल ,निराला और मुक्तिबोध के अंधेरे में से निकल कर उजाले में खडा है। अपने खुद के कवि से एक मांग है।पहले खुद को बदल ,समाज को क्या बदलोगे।कवि अपनी कविता से कहता है।

जिएऔर लिखे के बीच का फ़र्क
दिखे और लिखे से
झांकने लगे
पकडना मेरा गिरेबान
मेरे गुनाहो का हिसाब लेना
कभी दस्खत मत करना
एक बेईमान कवि की बात पर

यह पैमाना चरित्र का है ,व्यक्तित्व का है और कविता का है। जो जीवन में बेईमान और घूस खोर होगा कवि हो नही सकता।अगर कविता उस कतार में खडी है जहां भ्रष्टाचार के मानक तय हो रहे है तो कहना पडेगा कि कविता को भी भ्रष्टाचार का प्रतीक बनने से अब रोका जाना चाहिए।पुरस्कार से समाज की मर्यादा का पता चलता है, जो कलाओ को मान्यता देता है. अपमानित होकर खडा है।
नकली कवियो की भरमार मे गुम हो रहे है असली कवि ।
नकली कवि चाहते है कि असली और नकली के बीच का फ़र्क मिट जाए, एक कमाउ जैसा उत्सव धर्मी वातावरण बने। ज्योति कुमारी कांड, नामवर सिंह के पप्पु यादव और राजेन्द्र यादव कांड और जाने कितनी घटनाओ में सब कुछ अब साफ़ हो गया है। इतना साफ़ कि प्रमाणित करने के लिए अब कोई उदाहरण भी नहीं मांगता। लूट और जश्न की सभ्यता है। साहित्य और संस्कृति भला इससे अछूता कैसे रहेगा।उत्तर काशी मे हिन्दी के एक बडे लेखक के लेखन को जानता था। वहां कमाई के आचरण के बारे में पता चला। बडे कवि भी, बडे पैसे वाले भी, आन्दोलनकारी भी?लोग कौन कम है नाम रख दिया-जोगाडी।
जब जीवन में चरित्र नहीं बचा तो आपके उपदेश किस काम के। आप कविता के जश्न में शामिल हो सकते है,बदलाव नही ला सकते। आपने कविता को भी दिल से निकाल कर बाजार तक पहुंचा दिया।गालिब कहते है।

रगे संग से टपकता,वो लहू फ़िर न थमता
जिसे गम समझ रहे हो, ये अगर शरार होता

हे लेखक अगर आपने इस देश के किसी किसान का ,किसी नदी,किसी पहाड का दु:ख लेखक बन कर देखा होता तो कविता वह बला है जो इंसान तो इनसान पत्थर में चिनगारी बन कर समाती है और खून के आंसू रूलाती है तब बदलाव की जमीन तैयार होती है। लेखक जो सबसे संवेदन शील प्राणी है ने अपनी संवेदन शीलता गंवा दी, अपनी होश की दीवानगी गंवा दी।

क्यों नहीं लिखी गई कोई महान कविता

अब तक
उसकी ऎडियो की फ़टी बिवाईयो पर
कविता को तरह कविता का विषय बने रहना चाहिए।
कविता जब विषय बनती है, समय साफ़ होता है।

मैं उनके सुर में अपना स्वर लगा कर पूछना चाहता हूं।
क्यों नही है
कोई याद रखने लायक कविता
हमारी भाषा में
उनकी हथेलियो में उग आए
काले कठोर घट्ठो पर

आप का जीवन कैसा है,आपने फ़टी विवाईयो और हाथ के कठोर घट्ठो को देखा नही।अपने आस की दुनिया को महसूस नहीं किया। हे महाकवि, ये दरार वाले पांव, बबूल के डाक से ये हाथ हर जगह है। गांव ,शहर और महानगर में भी।आपकी नजर नहीं जाती।
काले कठोर घट्टे इमेज में बदल जाते है।
एक देश की पांव की विवाईयां और देश के हाथ के घट्ठे है।
इन कवियों के विषय ये नहीं है। वे छांव को छ्म से गिराते है। वे नदी से पत्र मंगवाते है। यथार्थ के समानान्तर वे एक एसा यथार्थ रचते है जो देखने में यथार्थ की तरह लगे,। यह रूप वाद है।

उनके लिए असंभव कुछ भी नही
वे चांद के चेहरे से पसीना पोछेंगॆ
वे सूरज पर कुंवे खोद पानी निकाल लाऎंगे
वे पुदीने की झाड पर चढकर बादलों में मुंह छुपाऎंगे
वे जेठ की दुपहरी में कजरी गाऎंगे
और कविता की राजधानी आह वाह से गूंज उठेगी।
अब सुनिए यह आह वाह।
अकादमियों की आह वाह,

विश्वविद्यालयों की आह वाह। लेखक संगठनों की आह वाह। हमारी छोटी पत्रिकाए किनके पैसो पर चलती रही, कैसे कैसे लोग साहित्य में आ गए। यह कविता समझा देती है कि कविता को समय को साफ़ करने के लिए लेखको के प्रति अब हमे उसी तरह सोचना होगा जैसे लालू यादव या मुलायम के समाज वाद के बारे मे सोचते है। हम लालू और मुलायम के संप्रदायिकता पर सोच रहे है। सुविधा के लालच में सच को सच कहने की हिम्मत नही है और कवि बनने चले हो। सच को समझ सको,इसके लिए कुछ नहीं करते।

बडी कायर किस्म की है
तुम्हारी सोच, समकालीनता के बारे में
तुम्हारे समाकालीन कैसे खुजला रहे है
देखो, एक दूसरे की पीठ
देखो
सभ्यता की उस दीवार के पीछे
बौने छू लेते है आकाश

इस कविता में सभ्यता आती है, उसकी दीवार के पीछे एक बौना आकाश छू लेता है. कविता बडी हो जाती है। सभ्यता का आक्रमण कविता पर हुआ है, दिख रहा है।नकली कवि लेखक कवि बाजार की सभ्यता के साये में विश्राम कर रहे है असली को अपने लिखे का नाम भी नही मिलता।

मखमली कालीनो पर
चहल कदमी करेंगे
शब्दों की दलाली करने वाले।

बनारस से कलकता तक के स्वर और सरेह के बीच चौकन्ने किसान की तरह नील कमल की कविता मुक्ति की मांग तक जाती है। कविता की मुक्ति की मांग कवियों से है और उन तमाम लोगो से जिन्हे कविता पर भरोसा है ।चालीस साल पहले यह बात बंगाल के कवि नवारूण भट्टाचार्य ने यही बात कही थी। हो सकता है उनके भीतर यह काब्य संस्कार बांग्ला से आया हो।

कलम को काग़ज़ पर फेरते हुए
आप दृष्टि को
बड़ा नहीं कर सकते
क्योंकि कोई नहीं कर सकता।
दृश्य के नीचे जो बारूद और कोयला है
वहाँ एक चिनगारी जला सकेंगे आप?
दृष्टि तभी बड़ी होगी
लहलहाते
फूल फूलेंगे धधकती मिट्टी पर
फटी-जली चीथड़े-चीथड़े ज़मीन पर
फूल फूलेंगे।
ज्वालामुखी के मुहाने पर
रखी हुई है एक केतली
वहीं निमन्त्रण है आज मेरा
चाय के लिए।
हे लेखक, प्रबल पराक्रमी कलमची
आप वहाँ जायेंगे?
यह भाषा नक्सलवाडी कविता की है । यही भाषा धूमिल की थी। हो सके तो बगल में गुजरते आदमी से कहो लो यह रहा तुम्हारा चेहरा जो पीछे गिर पडा था और कविता को भाषा होने की तमीज कहा था। गोरख पांडे की थी, पाश की थी और दुश्यंत कुमार थी। आज भी इनकी पंक्तियां सडक से संसद तक पहुंच रही है। हमने इन्हे नकारा ।हमारी उपेक्षा के बाद भी अपनी यात्रा कर रही

है और समाज को दिशा दे रही है ।
यह उन कविताओ की ताकत है।

कथ्य के स्तर पर यह काम नील कमल ने अपनी कविताओं में किया है। नील कमल के पास अपने काल की भाषा है, अपने काल की संवेदना है और कविता के साथ कार्यकर्ता बन कर खडा होने का साहस भी है।पाश और गोरख ने सत्ता के चरित्र को अलग अलग रूपों को बेनकाब किया तो नीलकमल ने अपनी कविता में लेखको के चरित्र को बेनकाब किया है ।मजा तब आता है जब लेखक अंतत: सत्ता के चरित्र मे बदल जाते है। संसद में सारी बाते जनता की होती है, सारे कानून जनता के लिए बनते है ,लेकिन उसे लाभ पहुंचाते है जिसने उन्हे बनाया है। उनकी मंशा महज महज विरोध नहीं है, उनकी मंशा सृजन की है

समय गर्भ धारण करे
प्रसव मुखी हो कविता

कविता प्राण के तारो पर फ़ेरती है उंगलियां, उससे फ़ूटता है राग। उस राग को बचाए रखने के लिए अच्छी कविताओं की जरूरत है और अच्छे कवियो की जरुरत है-

कुछ कागज और एक कलम
जिसकी स्याही कभी न सूखे
थोडी सी अक्ल
कविताओ की समझ की खातिर
थोडी सी तमीज
शब्दों के साथ बरतने को
थोडी सी हिम्मत
सच को सच कहने के लिए
एक कवि का मानक ।
अपने समय के कवि का मानक।

चाहत , उम्मीद ,स्वर में अकड को कवि की भाषा के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए जो बनारस के आस पास की भाषा की अकड है और अब बनारसी मस्ती भी देख लीजिए।नील कमल की कविताओं का यह सचेत देशी किसान का मन है जो विरोधी है

और विनोदी भी ।
और क्या चाहिए
अगर शब्दों की लहलहाती फ़सले हो
भाषा के उस सीमान्त पर,
ए मालिक
हम बार बार जिए और मरे

यह ए मालिक कौन है, जिससे अक्ल तमीज और सच को सच कहने के हिम्मत मांग रहा है ।
क्या यह कहने और मांगने की चीज है, यह तो बुनियादी जरूरत है।
नील कमल महसूस करते है कि आज ये मूल्य साहित्य में नहीं बचे। जब वे मालिक कहते है तो अपने खास बनारसी अंदाज में उन सबका मजाक उडाते है जो इसके लिए जिम्मेदार है।

कवि गण रहे रीझते
पृथ्वी के उंचाइयो वाले उभारों पर
गहराईयों में रहे तैरते डूबते
अलक्षित रहा इस भू भाग का जहा
नदियां जुटाती रही मिट्टी युगो से चुपचाप

आज हिन्दी कविता जिस जगह जाकर खडी है यह बुरी खबर है कविता के लिए।लेकिन नीलकमल और कई कवि मुक्ति के लिए नया स्वर तलाश रहे है, नया रास्ता तलाश रहे है यह अच्छी खबर है। शिल्प के स्तर पर अभी और निखार आएगा क्यों कि कविता का इलाका है, यहीं कविता की समझ है, वह खेत में सरसों के दाने की तरह पकती है। मुझे भी सकून मिलता है,कविता के इलाके में कोई किसान तो है।

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