कागज़ की कश्ती 

कागजों की एक सत्ता थी
पेड़ों से अलग
पेड़ों की शाखें जब उनसे अलग हो रही थीं
क्या पता था पेड़ों से ताकतवर कोई सत्ता बना रही थी

क्या पता कोई हर्षचरित कहाँ लिख गया था
इंडिका कहाँ
रामायण कहाँ ,बाईबिल कहाँ
बाबरनामा कहाँ

कागज़ लिख गया अलग विधान
राज सत्ता की मुहरों से लैस हो कर

कागज़ दंड दे पुरस्कार दे
उदासी दे खुशी दे
कैद दे मुक्ति दे

कागज़ करे मुनादी
कि हवा में वह उड़ती पतंग है
और कट जाने पर लूटे जाने की पहली पसंद है.

कागज कागज़ हो कर भी ख़बर दे जाता है
कि बंद दुनिया की चाबियां उसकी मुट्ठियों में हैं.

शब्दावली में अंटका हुआ कोई शब्द

पानी बदलता था बानी बदलती थी
और शब्दावली भी

मेरी जमीन में अलग अलग भाषा लिये हुये लोग थे
जो मुँह में अलग अलग जुबान रखते थे

जुबान कैचियाँ बन कपडों के अलग अलग प्रदेश में चलती थीं
और कोई लम्बी थकाऊ यात्रा के बारे में बेफिक्र हो जिक्र करता

कोई सोने के चढ़ते हुये भावों की चर्चा अनमने से करता
और फिर उसके गिरते हुए समय में कुछ गहरी सांसे भरता

मैंने अक्सर पाया था कि जिन्हें बड़ी गाड़ियों की अच्छी जानकारी थी
उन्हें रफ़्तार का गम्भीर तकनीकी ज्ञान था
और मातृभाषा की शब्दावलियों में अंटकते हुये ऐसे लोग
कोई विदेशी भाषा में जलेबियों की दुरूह लड़ियाँ बना जाते

मुझे आश्चर्य था कि किताबों के फड़फड़ाते पन्नों में
कहीं कोई अनुचित शब्द नहीं था
जो अनुचित साधनों की जोशोखरोश वकालत करता था
और इसके बावजूद दुनिया विपर्यित और विभाजित थी

मैं व्यथित था कि साध्यों की नैतिक व्याख्या करते हुए
साधनों के अनैतिक इस्तेमाल का इल्जाम उन्हीं लोगों पर था
जिनकी शब्दावलियों में भाषा विदेशी जमीन पर रफ़्ता रफ़्ता सरपट सरकती नज़र आती थी

मैं अचम्भित था यह देख कर कि
शब्दावलियों में अंटके हुए जो लोग थे
उन्होंने कोई गम्भीर वा सरल किताबें नहीं पढ़ी थीं
और कहीं कोई सीमा का अतिक्रमण नहीं कर रहे थे

उनके लिए दुनिया किताबों की कब्र पर उगे हुए कुकुरमुत्ते की कोई पौध थी.

प्रवृत्तियाँ

प्रवृत्तियाँ जड़ों में थीं
जो बढ़ती चली जाती थीं

प्रवृत्तियाँ तनों में थीं
जो छालें मोटी होती जाती थीं

प्रवृत्तियाँ शाखाओं में थीं
जो पनपती जाती थीं

प्रवृत्तियाँ सदियों में थीं
दशकों में
सालों में थीं

प्रवृत्तियाँ आसमान से उतरी वर्षा की बूँदों में थीं
पहाड़ से उतरी हवाओं में थीं
गुफा कन्दराओं में थीं
सागर की अतल गहराईयों में थीं

प्रवृत्तियाँ जंगलों की थीं
इसलिये विवेकशील प्राणियों में थीं

प्रवृत्तियाँ रंगों में थीं
और इसलिये
प्रवृत्तियाँ रंगों के बदल जाने में थीं

प्रवृत्तियाँ अस्त्रों में थीं
और शस्त्रों में थीं
और उस शिकार में भी
जिसे किया जाना अभी बाकी था

प्रवृत्तियाँ हर उस जगह थीं
जहाँ से हमें चलना था
और जहाँ पहुँचना था

प्रवृत्तियाँ जनता में थीं
दरबारों में थीं
प्रजा में थीं
और सरकारों में थीं

सबसे बड़ी बात हमारे आदिम सरोकारों में थीं
और उनका नाश हमारा सर्वकालिक सरोकार था !

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