कोल इंडिया में कार्यरत अशोक कुमारकी कविताएँ कोयले की कालिख के भीतर से झांकती धवल जीवन की लालसाएं एवं इंसानी जिजीविसा की ज़िंदा तस्वीरें हैं …….संपादक 

काला – हीरा ( बचपन में )  

अशोक कुमार

अशोक कुमार

कोयले से परिचय पुराना था

और पता था कोयले से जलता है चूल्हा

और चलती है रेलगाड़ी

खाने और सवारी का मजा लेते वक्त भूलते थे हम

कि चूल्हे का धुआँ आँखों को जलाता था

कि रेलगाड़ी की खिड़की पर बैठे हुए तिनसुकिया मेल

आँखों और बालों को भर जाती थी कोयले की किरचियों से

बचपन में ही जाना था

कोयले को कहते हैं काला हीरा

और एक पूरी की पूरी बिरादरी

बिछुड़ कर बन गयी थी काला हीरा

कि जमीन के भीतर जो दबा रहा था करोड़ों साल

वह ताकत बन कर निकलता था

कि जो लोग दबे हुए थे सदियों से

निकलेंगे कभी ताकतवर बनकर

किसी सदी में काले हीरे की तरह

 

काला – हीरा 2 ( किशोर वय ) 

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साभार google से

कोयला सुलग रहा था चूल्हे में

और पड़ोसियों को धुएँ से परेशानी हो रही थी

उनकी नर्म – ओ – नाजुक आँखें सुर्ख लाल हो रही थीं

कोयला जब सुलगता है

तब धुआँ निकलता है

और जहाँ धुआँ होता है वहीं सुलग रही होती है आग

किशोर वय में जाना कि धुआँ ऊपर उठता है

और ऊपर के तल्लों में रह रहे लोगों के लिये परेशानी का सबब होता है

ऊपरी तल्लों में रहते लोग नहीं जानते

कि जमीन में हजारों फीट नीचे दबा कोयला

बाहर निकल आया था और रोटी के लिये चूल्हे में सुलग रहा था

कोयला ताप – भट्ठियों में झुलस रहा था

बिजली घरों में

और ऊपर के तल्ले बिजली के लट्टुओं की रोशनी में नहा रहे थे .

 

काला – हीरा  ( वर्ण ) 

वे काले हो गये थे

वे दिल के साफ लोग थे

वे रंग से श्याम हो गये थे

वे रोज धरती के गर्भ में उतरते थे

काले हीरे की तलाश में

और हर दिन उनकी पत्नियाँ संतानों के संग

उनके सकुशल घर लौटने की कामना करती थीं

वे किसी वर्ण के नहीं थे

वे काले हीरों के व्यापारी भी नहीं थे

वे तो बस काटते थे काला-हीरा घुप्प

अंधेरी खदानों के अंदर

जहाँ कभी भी निकली जहरीली गैस

उनके साँसों से घुल सकती थी

और वे सो सकते थे मीठी नींद

जो कभी न टूटती या फिर खदानों की छत से गिरे

किसी भी कोयले के टुकड़े से वे दब कर मर सकते थे

वैसे भी वे सालों से दबे हुए ही लोग थे

जो न थे वर्ण – व्यवस्था की श्रेणी में

वरन् उन्होंने गढे थे एक नया वर्ण-काला हीरा

वे बस उसी जाति के थे

और उसे महिमामंडित करना चाहते थे बस

वे पत्थर बन गये थे

वे दिन बन गये थे

वे साल बन गये थे

वे महीने और मौसम बन गये थे

वे अपनी दुनिया में व्यस्त थे

इसलिये तुम्हारी दुनिया से अलग हो गये थे

तुम्हारी रोशनी से जगमगायी दुनिया के लिये

वे काली अंधेरी गुप्त दुनिया चुन रहे थे

दिन बने लोग अपना नाम खो चुके थे

सोमर – सोमरी

मंगरा – मंगरी

बुधना -बुधनी

वृहस्पतिया – वृहस्पतिया

सुकरा – सुकरी

शनिचरवा – शनिचरिया

ऐतवारी – ऐतवरिया सारे खो गये थे

माह बने लोग भी खो चुके थे

फगुनी – फगुनिया माघो चैती बैसाखी

अब वे एक नया वर्ण भर थे

काला हीरा जिनकी जाति थी .

 

काला – हीरा  ( मशीनी मानव )

वे निजी खदानों के पौधे थे

जो सरकारी खदानों में पेड़ बन गये थे

मशीनों की सोहबत में धीरे-धीरे मशीन बन गये थे

वे भी तो दबे हुए थे चट्टानी सभ्यता से

उसकी ओट में जो विध्वंसकों से

खुद पर पड़ी कठोर शैल के टुकड़े उड़ा रहे थे

काले हीरों की तरह खुद को उद्-घाटित कर रहे थे

वे अपने मनों पर मनों पड़े बोझ को धो रहे थे

जैसे कोयले धोये जाते थे

वाशरियों में रसायनों से

कि उनकी राख कम हो और हो ताप ज्यादा

वे मन की राख झाड़ रहे थे

दन की ताप संचय कर रहे थे

वे बिना यह जाने कि आगे एक लड़ाई

उन्हें उन मशीनों से ही लड़नी है

जिन्हें वे अपना सहयोगी मानते हैं

मशीन हुए जा रहे थे

वे यह भी कहाँ जानते थे

कि एक दिन जब मशीन और आदमी का फर्क किया जायेगा

लोहे की मशीनें चुन ली जायेंगी

और उन्हें मशीनों से अलहदा कर दिया जायेगा आदमी बता कर

वे तो बस छद्म मानव थे

जो मशीनों से एकाकार कर चुके थे

जो अपनी होली , दीवाली , ईद और दशहरे

इन्हीं मशीनों से एकालाप कर बिता रहे थे

और मशीनें तैयार हो रही थीं

कि दिन उन्हें अपनी आदतों से बेदखल करने के लिये

आग की भट्ठियों में कोयला सुलग रहा था .

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