हमरंग पर सूरज प्रकाश द्वारा लिखित विशेष व्यन्ग्यालेख ‘किस्से किताबों के’ की दूसरी क़िस्त –

किस्‍से किताबों के – किस्‍सा तीन

sooraj-prakash

इस बार का किस्‍सा मेरे बेटे अभिजित की जुबानी 
अच्‍छी किताब ने पिटाई से बचाया

मैं तब नाइंथ में था। सेंट्रल स्‍कूल आइआइटी, पवई में पढ़ता था। उन दिनों पापा ऐन फ्रैंक की डायरी का अनुवाद कर रहे थे। जब तक अनुवाद पूरा न हो जाये, मुझे किताब को हाथ को लगाने की अनुमति नहीं थी। आखिर अनुवाद पूरा हुआ और किताब मुझे मिली। मैंने किताब स्‍कूल बैग में डाली और स्‍कूल बस में ही पढ़ना शुरू कर दिया। अब किताब में इतना मन रमा कि छोड़ने को दिल ही न करे। स्‍कूल पहुंच कर भी डेस्‍क के भीतर किताब खोल कर बीच बीच में पढ़ता रहा।
तीसरे पीरियड तक आते आते ये हालत हो गयी कि किताब खोल कर सिर झुका कर लगातार पढ़ने लगा। पता ही नहीं चला कि कब इंगलिश की टीचर मिसेज भसीन आयीं और पढ़ाना शुरू कर दिया। अपन राम तो ऐन फ्रैंक में मस्‍त। मिसेज भसीन ने देखा कि मेरा ध्‍यान क्‍लास में नहीं है। एटैंडेंस में मैंने यस मैम भी नहीं बोला था। उन्‍होंने दो तीन बार मेरा नाम पुकारा लेकिन सुनायी किसे देना था। पूरी क्‍लास में सन्नाटा। मिसेज भसीन मेरे सिर पर आ कर खड़ी हो गयीं और बोली – क्‍या पढ़ रहे हो अभिजित?
मैडम को सिर पर खड़ा देख कर मेरे तो हाथ पैर फूल गये। मैडम बहुत कड़क थी। तय था आज जम के पिटाई होगी। मुंह से मैं.. मैं .. ही निकल पाया। मैडम ने मेरे हाथ से किताब ली और टाइटल देख कर पूछा – कहां से लाये?
– पापा की लाइब्रेरी से, सॉरी मैडम, अब आगे से..।
– जब पढ़ लो तो मुझे देना। मैंने नहीं पढ़ी है। कह कर मैडम ब्‍लैक बोर्ड की तरफ बढ़ गयीं।
आप समझ सकते हैं कि मैंने कितनी राहत की सांस ली होगी। एक अच्छी किताब ने पूरी क्‍लास के सामने मेरी दुर्गत होने से बचा लिया था।

किस्‍से किताबों के –किस्‍सा नम्‍बर चार –

 किस्‍सा एक खराब किताब का

कुछ बरस पहले मुंबई में एक साहित्यिक आयोजन चल रहा था। कई वरिष्ठ रचनाकार बाहर से आये थे। उस वक्‍त निर्मल वर्मा जी वक्‍ता के रूप में अपनी बात कह रहे थे। पिछले दिन के सत्रों की खबर तस्‍वीरों सहित अखबारों में छपी थीं। रमेश चंद्र शाह आदि मंच पर थे।
तभी सफारी सूट पहने एक सज्‍जन भीतर आये। वे मझौले लेवल के कारोबारी आदमी लग रहे थे। मंच की तरफ देखा तक नहीं कि कौन हैं वहां। आस पास का जायजा लिया और बाहर खड़े अपने ड्राइवर को इशारा किया। दो मिनट में ही उनका ड्राइवर किताबों के दो बंडल लिये अंदर आ गया। अब जनाब एक-एक आदमी के पास जा कर उसका नाम पूछ कर किताबें भेंट करने लगे। प्रिय भाई अलां को सप्रेम भेंट और फलां को सप्रेम भेंट। मेरे पास भी आये, नाम पूछा, आंखें मिलाने या अपना नाम बताने की ज़रूरत नहीं समझी और एक सप्रेम भेंट टिका गये। किताब देखी – उनकी पीएचडी की थीसिस थी। कविता में रस और रस में कविता टाइप कुछ नाम था।
शाम को डिनर का प्रोग्राम था इसलिए मैं कपड़े बदल कर जब पांच बजे के करीब घर से वापिस आया तो वही सज्‍जन अपनी थीसिस के अगले बंडल निपटा रहे थे। भला रोज़ रोज़ थोड़े ही मिलते हैं इतने सारे गुण ग्राहक एक साथ। अख़बार में खबर देख कर बीवी ने साफ साफ कह दिया होगा कि जाओ सारी किताबें आज ही निपटा कर आओ। वरना…. ये वरना ही उन्‍हें अपना धंधा छुड़वा कर ये नेक काम करवा रहा होगा।
अभी मैं बैठा ही था कि एक बार फिर मेरे पास आ कर मेरा नाम पूछने लगे। मैंने बताया – सुल्‍तान अहमद। एक और सप्रेम भेंट – सुल्‍तान अहमद के नाम।
दोनों प्रतियां मेरी कार में कई दिन तक रखी रहीं। एक दिन हिन्‍दी भाषी मेकैनिक कार में कब से रखी इस किताब के पन्ने पलट के देख रहा था, तो तुरंत उसे थमा दी। वापिस न लेने की शर्त पर।
अब इस पूरे प्रसंग में उन पीएचडी भाई साहब, मेरा या मेकैनिक का क्‍या कसूर। एक सही किताब एक गलत हाथ से दूसरे गलत हाथ में जाती रही और अपने दुर्भाग्‍य को कोसती रही।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.