पूंजीवादी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं, अवसर और बाज़ार के प्रभाव में नई गढ़ी जातीं और बिकतीं प्रेम व्याख्याओं की  अनुसंधानिक प्रयोगशाला में निश्छल मानवीय प्रेम को तलाशती अनीता चौधरीकी दो कविताएँ ……संपादक 

कुछ तो शर्म करो  

मैं पीछे क्यों रहूँ

अनीता चौधरी

क्यों नहीं कचोटती तुम्हें
तुम्हारी अन्तरात्मा।
जो तुम कर रहे हो।
कहीं मुखिया बनकर
कहीं प्रेमी बनकर
देते रहे हो धोखा
कि, रखोगे सबका ख्याल
तभी तो बैठाया था
अपने भीतर और भीतर
बहलाते रहे आज तक
यूं ही मुस्कराते हुए
मन की बात कहकर
जरुरत के समय
दो बूँद पानी की
आँखों से टपकाकर
देते रहे दिलासा
बदल जायेगी हमारी जिंदगी।
और बेच दिया तुमने
हमारा सबकुछ
उन चंद दोगले मुखोटों
की बाजारी वफ़ाई पर।
अपनी अनंत महत्वकांक्षाओं की खातिर।
उजाड़ दिए अनेक घर
अनाथ हो गए बहुत
मार दिया कइयों को
मोहब्बत बेवफाई से।
अब तो बंद कर दो
अपनी इन शतरंजी चालों को
कुछ तो शर्म करो
कुछ तो शर्म करो।

2 –  

मेरी एक छुअन
सहला देती है तुम्हारे दर्द को
मेरे लवों की फड़फड़ाहट
कर देती है तुम्हें बेचैन
मेरे सीने की गरमाहट
भर देती है तुम में
एक आत्मीय सुकून।
जिसे खोजते हो
अपनों के बीच
हर कीमत देकर भी
पाते हो खोखला और
ढोंगों से भरा अपनापन
फिर भी ललचाये रहते हो
अपनी जाति धर्म और खून के
रिश्तों के बीच उनके बोझ तले
भूलना चाहते हो उस
आत्मीय प्यार भरे सुकून को
उस तथाकथित समाज
के दबाव में।
करते हो छलावा उस
निश्छल और अस्वार्थ
प्रेम के साथ
जो देता है तुम्हें
असीम अपनत्व की छाँव और
जीवन की अनंत लालसा
फिर भी नकारते हो
उस प्रेम के स्वरूप को
जीवन की प्रायोगिकता कहकर
और करते हो प्रेम की
नयी व्याख्या
बेड शेयरिंग फ्रेंड के रूप में।

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