“24 नवम्बर, 1914 को अविभाजित भारत के वजीराबाद, जिला गूजरांवाला में जन्मे कृश्न चंदर ने 1936 से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। शफीक अहमद, जो उर्दू पत्रिका ‘इंकलाब’ में एक स्तंभकार थे, उनके लेखन का कृश्न चंदर पर काफी प्रभाव रहा। वे उनकी कहानियों से भी इतना प्रभावित थे कि उन्हीं की तरह लिखना चाहते थे। बहरहाल कृश्न चंदर के लिखने की शुरूआत एक लघु कथा से हुई। लघु कथा एक पत्रिका में प्रकाशित हुई और प्रशंसित थी। इस तरह से कृश्न चंदर के उर्दू अफसानानिगार बनने का रास्ता साफ हो गया। उनकी शुरूआती कहानियां ‘हुमायूं’, ‘अदबी दुनिया’, ‘अदब-ए-लतीफ’ और ‘नया अदब’ वगैरह पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। कृश्न चंदर के लेखक का आगे का विकास लाहौर में हुआ। लाहौर उस समय कला और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र माना जाता था। यह वह जमीन थी जहां से फैज अहमद फैज, बलराज साहनी, देवानंद और चेतन आनंद जैसे कलमकार और कलाकार निकले।

यह बात बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि देश की आजादी के संघर्ष में वे एक बार शहीद-ए-आजम भगत सिंह के साथ गिरफ्तार हो जेल भी गए थे। बंटवारे के बाद कृश्न चंदर लाहौर, पाकिस्तान से हिंदुस्तान आ गए। बंटवारे के बाद मिली आजादी को कृश्न चंदर हमेशा त्रासद आजादी मानते रहे और उसी की नुक्ता-ए-नजर में उन्होंने अपनी कई कहानियां और रचनाएं लिखीं। उनकी कहानी ‘पेशावर एक्सप्रेस’ भारत-पाक बंटवारे की दर्दनाक दास्तां को बयां करती है। इस कहानी में उन्होंने बड़े ही खूबसूरती से इस ख्याल को पिरोया है कि ‘‘कब आदमी के भीतर का शैतान जाग उठता है और इंसान मर जाता है।’’ देश के बंटवारे के कुछ दिन बाद ही उन्होंने एक और बंटवारा देखा। साल 1948 में भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का बंटवारा। कश्मीर के बंटवारे ने उन्हें इस मुद्दे पर अपना पहला उपन्यास ‘शिकस्त’ लिखने के लिए प्रेरित किया। कश्मीर को यदि वास्तविक रूप से जानना है, तो ‘शिकस्त’ एक लाजवाब उपन्यास है। कृश्न चंदर ने इस उपन्यास में अपनी पूरी आत्मा उडे़ल दी है।” 

‘जाहिद खान’ की इस आलेखीय सिलसिले की तीसरी क़िस्त में आज मुलाक़ात करते हैं ‘कृश्न चंदर’……

कृश्न चंदर: कड़वी हकीकत का सच्चा अफसानानिगार 

जाहिद खान

जाहिद खान

प्रगतिशील लेखक संघ को देश भर में मजबूत करने के लिए जिन साथियों के नाम का जिक्र बेहद जरूरी है, उसमें एक नाम कृश्न चंदर का भी है। कृश्न चंदर के नाम के बिना न तो प्रगतिशील लेखक संघ की बात की जा सकती है और न ही उर्दू अदब की। उर्दू अदब, खास तौर से उर्दू कहानी को जितना कृश्न चंदर ने दिया, उतना शायद ही किसी दूसरे रचनाकार ने दिया हो। इस मामले में सआदत हसन मंटो ही उनसे अव्वल हैं, वरना सभी उनसे पीछे। उन्होंने बेशुमार लिखा। हिंदी और उर्दू दोनों ही भाषाओं में समान अधिकार के साथ लिखा। कृश्न चंदर की जिंदगी के ऊपर तरक्कीपसंद तहरीक का सबसे ज्यादा असर पड़ा। प्रगतिशील लेखक संघ ने उनके लेखन को एक नई राह दिखलाई, जिस पर कि वे अपने मरते दम तक चले। यह अकारण नहीं है कि उनकी ज्यादातर कहानियाँ समाजवाद से प्रेरित हैं। वे एक प्रतिबद्ध लेखक थे। उनके सम्पूर्ण साहित्यिक लेखन को उठाकर देख लीजिए उसमें हमेशा एक उद्देश्य, एक विचार मिलता है। किसी उद्देश्य के बिना उनकी कोई रचना पूरी नहीं होती थी। कृश्न चंदर ने अपनी कलम के जरिये हमेशा दीन-दुखियारों के दुःख-दर्द, उम्मीदों-नाकामियों की बात की। साम्प्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता पर प्रहार किए।

kishan chandar 24 नवम्बर, 1914 को अविभाजित भारत के वजीराबाद, जिला गूजरांवाला में जन्मे कृश्न चंदर का बचपन और जवानी का शुरूआती हिस्सा कश्मीर में बीता। यही वजह है कि उनकी भाषा पर डोगरी और पहाड़ी का साफ प्रभाव दिखाई देता है। साल 1934 में उन्होंने लाहौर के फारमन क्रिश्चयन कॉलेज से अंग्रेजी में एम.ए. किया। कहने को बाद में उन्होंने एल-एल.बी. भी किया, लेकिन वकालत को पेशा न बनाते हुए, अपनी आगे की जिंदगी के लिए एक अलग जुदा राह अपनाई। यह राह थी, लेखन की। साल 1936 से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। शफीक अहमद, जो उर्दू पत्रिका ‘इंकलाब’ में एक स्तंभकार थे, उनके लेखन का कृश्न चंदर पर काफी प्रभाव रहा। वे उनकी कहानियों से भी इतना प्रभावित थे कि उन्हीं की तरह लिखना चाहते थे। बहरहाल कृश्न चंदर के लिखने की शुरूआत एक लघु कथा से हुई। लघु कथा एक पत्रिका में प्रकाशित हुई और प्रशंसित थी। इस तरह से कृश्न चंदर के उर्दू अफसानानिगार बनने का रास्ता साफ हो गया। उनकी शुरूआती कहानियां ‘हुमायूं’, ‘अदबी दुनिया’, ‘अदब-ए-लतीफ’ और ‘नया अदब’ वगैरह पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। कृश्न चंदर के लेखक का आगे का विकास लाहौर में हुआ। लाहौर उस समय कला और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र माना जाता था। यह वह जमीन थी जहां से फैज अहमद फैज, बलराज साहनी, देवानंद और चेतन आनंद जैसे कलमकार और कलाकार निकले। लाहौर के बारे में खुद कृश्न चंदर ने लिखा है, ‘‘लाहौर वह जगह है जहां मैं पैदा हुआ था, जहां मैंने शिक्षा गृहण की, जहां मैंने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत की, और जहां मुझे प्रसिद्धि मिली। मेरी पीढ़ी के लोगों के लिए लाहौर को भुला पाना नामुमकिन है। यह हमारे दिलों में किसी गहने की तरह चमकता है और हमारी आत्मा में खुशबू की तरह जिंदा है।’’

अपनी नौजवानी के दिनों में कृश्न चंदर ने राजनीति में भी हिस्सा लिया। वे बाकायदा सोशलिस्ट पार्टी के मेंबर भी रहे। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि देश की आजादी के संघर्ष में वे एक बार शहीद-ए-आजम भगत सिंह के साथ गिरफ्तार हो जेल भी गए थे। बंटवारे के बाद कृश्न चंदर लाहौर, पाकिस्तान से हिंदुस्तान आ गए। बंटवारे के बाद मिली आजादी को कृश्न चंदर हमेशा त्रासद आजादी मानते रहे और उसी की नुक्ता-ए-नजर में उन्होंने अपनी कई कहानियां और रचनाएं लिखीं। उनकी कहानी ‘पेशावर एक्सप्रेस’ भारत-पाक बंटवारे की दर्दनाक दास्तां को बयां करती है। इस कहानी में उन्होंने बड़े ही खूबसूरती से इस ख्याल को पिरोया है कि ‘‘कब आदमी के भीतर का शैतान जाग उठता है और इंसान मर जाता है।’’ देश के बंटवारे के कुछ दिन बाद ही उन्होंने एक और बंटवारा देखा। साल 1948 में भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का बंटवारा। कश्मीर के बंटवारे ने उन्हें इस मुद्दे पर अपना पहला उपन्यास ‘शिकस्त’ लिखने के लिए प्रेरित किया। कश्मीर को यदि वास्तविक रूप से जानना है, तो ‘शिकस्त’ एक लाजवाब उपन्यास है। कृश्न चंदर ने इस उपन्यास में अपनी पूरी आत्मा उडे़ल दी है।kishan

पढ़ाई पूरी करने के बाद कृश्न चंदर ने अपनी पहली नौकरी ऑल इंडिया रेडियो में की। उनकी पहली पोस्टिंग लाहौर में हुई और उसके बाद दिल्ली आना हुआ। कुछ दिन वे ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ में भी रहे। रेडियो में वे नाटक विभाग के इंचार्ज थे। ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी के दौरान उनकी मुलाकात अपने दौर के कई मशहूर लेखकों मसलन सआदत हसन मंटो, राशिद, मीरांजी, अहमद नदीम कासमी, उपेन्द्रनाथ अश्क, शाहिद अहमद देहलवी, निराग हसन ‘हसरत’, डॉ0 तासीर से हुई। जिनके साथ रहकर उन्होंने बहुत कुछ सीखा। कृश्न चंदर का फिल्मों में जाना कैसे हुआ, इसके पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा है। लखनऊ में नौकरी के दौरान कृश्न चंदर की कहानी ‘सफेद खून’ एक पत्रिका में छपी, जिसे एक फिल्म निर्माता डब्ल्यू जैड अहमद ने पढ़ा, तो तुरंत ही उन्हें इसे फिल्म के लिए लिखने का प्रस्ताव दिया। कृश्न चंदर ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और पुणे आकर शालीमार पिक्चर्स में शामिल हो गए। उन्होने ‘सफेद खून’ पर ‘मन का मीत’ फिल्म लिखी, जो कामयाब भी रही। शालीमार पिक्चर्स में पूना जाना हुआ, तो वे फिल्मी दुनिया के ही हो के रह गए। उनकी बाकी जिंदगी मायानगरी बंबई में ही गुजरी। फिल्मों के लिए उन्होंने कहानियां, पटकथा, संवाद लिखे। अपनी फिल्मी मशरुफियतों के बावजूद उन्होंने अदब से नाता नहीं तोड़ा।

कृश्न चंदर ने कहानियां, उपन्यास, व्यंग्य लेख, नाटक यानी साहित्य की सभी विद्याओं में खूब काम किया। लेकिन उनकी मुख्य पहचान कहानीकार के ही रूप में बनी। दूसरी आलमी जंग के दौरान बंगाल में पड़े भीषण अकाल पर लिखी ‘अन्नदाता’ उनकी कालजयी कहानी है। इस कहानी के लिखने के साथ ही उर्दू अदब में उनकी पहचान एक तरक्कीपसंद अफसानानिगार के रूप में होने लगी थी। ‘अन्नदाता’ का अंग्रेजी में भी तर्जुमा हुआ। जो कि हिंदी से भी ज्यादा लोकप्रिय हुआ। इस कहानी के साथ ही कृश्न चंदर अंतरराष्ट्रीय अदबी दुनिया में एक बेहतरीन कहानीकार के तौर पर तस्लीम कर लिए गए। ‘अन्नदाता’ के बाद भी उन्होंने कई शाहकार अफसाने लिखे। ‘गड्ढा’, ‘दानी’, ‘पूरे चाँद की रात’, ‘आधे घंटे का खुदा’ जैसी उनकी कई दूसरी कहानियाँ भी उर्दू साहित्य में क्लासिक मानी जाती हैं। कृश्न चंदर की ज्यादातर कहानियाँ ऐसे इंसानों पर केन्द्रित हैं, जिनको दूसरे लोग आम तौर पर नोटिस भी नहीं करते। मसलन कहानी ‘कालू भंगी’ में वे बड़े ही मार्मिकता से समाज में सबसे ज्यादा हाशिए पर रहने वाले दलित समुदाय के एक शख्स कालू की जिंदगी की दर्दनाक दास्तां को बयां करते है। उनमें हर इंसान को बराबरी और सम्मान देने का एक अद्भुत गुण था। उन्होंने अपनी कहानियों में व्यवस्था पर भी तीखे प्रहार किए। लालफीताशाही और अफसरशाही ने देश की व्यवस्था को कैसे चैपट किया है ?, यह उनकी कहानी ‘जामुन के दरख्त’ में दिलचस्प तरीके से आया है। कहानी का साफ-साफ संदेश है कि किस तरह अफसरशाही, अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करती है।

kishan उर्दू कथा साहित्य को कृश्न चंदर ने बहुत कुछ दिया। उन्होंने उर्दू कहानी को किसान-मजदूर आंदोलन से बाबस्ता किया और उसमें जन संघर्षों को अभिव्यक्ति देने की ताकत पैदा की। उर्दू कहानी को कृश्न चंदर की सबसे बड़ी देन, टेकनीक है। उनकी कहानियों की टेकनीक, रिपोर्ताज की टेकनीक है। वे शब्द चित्रों के माध्यम से अपनी कहानियों में एक शानदार वातावरण बना दिया करते थे। यह वातावरण पाठकों पर जादू करता था। फिर भी उनकी कहानी में मकसद ओझल नहीं होता था। कृश्न चंदर की कोई भी कहानी उठाकर देख लीजिएगा, उनमें बुद्धि और भावना का लाजवाब तालमेल मिलेगा। मशहूर उर्दू आलोचक सैयद एहतिशाम हुसैन, कृश्न चंदर की कहानियों पर तंकीद करते हुए लिखते हैं, ‘‘कभी-कभी उनका मकसद, उनकी कला पर छा जाता है।’’ लेकिन कृश्न चंदर अपनी कहानियों के बारे में खुद क्या सोचते हैं, यह उनके आत्मकथ्य में मिलता है। अपने आत्मकथ्य में वे लिखते हैं, ‘‘मेरी हर कहानी उस सफेद हत्थेवाले चाकू को हासिल करने की कोशिश है, जो कि बचपन में एक जागीरदार के बेटे ने मुझसे छीना था।’’

कृश्न चंदर की कहानियों में आलोचक बमुश्किल ही कोई कमी पाते थे। उनकी शुरूआती कहानी उठाकर देख लीजिए या बाद की, उनकी सभी कहानियों में शानदार कहानी-कला मिलती है। उनकी कहानी समय के साथ और भी बेहतर होती चली गई। प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक सज्जाद जहीर अपनी किताब ‘रौशनाई’ में कृश्न चंदर के मुताल्लिक लिखते हैं, ‘‘उनकी कहानी-कला के विकास और उत्कर्ष का कारण यह भी है कि वह अपनी कहानियों पर मुनासिब आलोचना से कभी नाराज नहीं होते थे, बल्कि बड़ी विनम्रता के साथ उन्हें स्वीकार कर लेते थे। बाज लेखकों और शाइरों में वह जो एक घटिया किस्म का घमंड और अहंकार होता है, जो कि सामंती दौर की एक गैर-जनतांत्रिक और मूर्खतापूर्ण परम्परा है और जिसे ध्वस्त करना प्रगतिशील आंदोलन के लिए जरूरी है, कृश्न चंदर में बिल्कुल नहीं।’’

मशहूर शाईर फिराक गोरखपुरी ने अपनी किताब ‘उर्दू भाषा और साहित्य’ में कृश्न चंदर की कहानी कला का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि-‘‘कृश्न चंदर की कला की दो विशेषताएं हैं-एक तो उनकी सार्वभौमिक दृष्टि और जागरूक बौद्धिकता। दूसरी उनकी विशिष्ट टेकनीक। जहां तक जागरूक बौद्धिकता का प्रश्न है, कृश्न चंदर को कथा क्षेत्र में वही स्थान प्राप्त है, जो अली सरदार जाफरी को काव्य क्षेत्र में। उनकी कहानियों की सर्जनात्मक दृष्टि विशाल भी है और स्पष्ट भी। वे जागरूक समाजवादी हैं। साथ ही उनका परिप्रेक्ष्य भी इतना विस्तृत है, जितना और किसी कथाकार का नहीं हुआ। वे कश्मीर के खच्चरवालों का भी उतना ही सजीव वर्णन करते हैं, जितना बंगाल के अकाल पीड़ितों और तेलंगाना के विद्रोही किसानों का। बंबई के फिल्म आर्केस्ट्राओं के दयनीय जीवन का भी विस्तृत चित्रण उन्होंने किया है। और वर्मा के मोर्चे पर लड़ते हुए अमेरिकी सैनिकों तथा कोरियाई युद्ध में आहुति देती हुई वीरांगनाओं का भी। किन्तु अपनी लगभग हर कहानी में सामाजिक क्रांति की आवश्यकता, बल्कि समाजवादी क्रांति की आवश्यकता चिल्ला-चिल्ला कर बोलती दिखाई देती है।’’maxresdefault

कृश्न चंदर की किताबों की संख्या तीन दर्जन से ज्यादा है। ‘एक गधे की आत्मकथा’, ‘एक वाइलिन समुन्दर के किनारे’, ‘एक गधा नेफा में’, ‘तूफान की कलियां’, ‘कार्निवाल’, ‘एक गधे की वापसी’, ‘गद्दार’, ‘सपनों का कैदी’, ‘सफेद फूल’, ‘प्यास’, ‘यादों के चिनार’, ‘मिट्टी के सनम’, ‘रेत का महल’, ‘कागज की नाव’, ‘दौलत और दुनिया’, ‘प्यासी धरती, प्यासे लोक’, ‘पराजय़’ आदि उनके प्रमुख उपन्यास हैं। तो वहीं ‘जिंदगी के मोड़ पर’, ‘टूटे हुए तारे’, ‘तीन गुंडे’, ‘समुन्दर दूर है’, ‘अजंता से आगे’, ‘हम वहशी हैं’, ‘मैं इंतजार करूंगा’, ‘दिल किसी का दोस्त्त नहीं’, ‘किताब का कफन’, ‘अन्नदाता’, ‘तिलस्मे-ख्याल’, ‘सुबह होती है’, ‘बाबन पŸो’, ‘हवाई किले’, ‘यरकान’ आदि उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं। कृश्न चंदर की किताबों के अनुवाद भारतीय भाषाओं के अलावा दुनिया की प्रमुख भाषाओं में भी हुए। मसलन अंग्रेजी, रुसी, चीनी, चेक, पोलिश, हंगेरियन आदि। उन्होने रेडियो नाटक और फिल्मी पटकथाएँ भी लिखीं। बंगाल के अकाल पर उन्होंने ‘अन्नदाता’ कहानी के अलावा दिल को छू लेने वाला एक नाटक, ‘भूखा बंगाल’ भी लिखा। जिसे इप्टा ने उस वक्त पूरे देश में खेला। उनकी एक और दीगर मशहूर कहानी ‘जामुन का पेड़’ का भी नाट्य रूपान्तरण ‘बड़ी देर की मेहरबान आते आते’ के रूप में हुआ। कृश्न चंदर का लिखा रिपोर्ताज ‘पौदे’ भी उर्दू अदब में एक खास मुकाम रखता है। ‘पौदे’ की तारीफ करते हुए सज्जाद जहीर ने अपनी किताब ‘रौशनाई’ में लिखा है, ‘‘इसमें काॅन्फ्रेंस के ब्यौरे नहीं हैं, बल्कि इसकी फजा और माहौल को पेश किया गया है। इससे बेहतर या वैसा भी लिखना मेरे लिए मुमकिन नहीं है।’’
कहानियों की तरह कृश्न चंदर के उपन्यास भी खासे चर्चित रहे। खास तौर पर ‘एक गधे की आत्मकथा’। इस उपन्यास में उन्होंने देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को बड़े ही व्यंग्यात्मक शैली में चित्रित किया है। यही नहीं उपन्यास में नेहरू सरकार की चीन से संबंधित नीतियों की भी तीखी आलोचना है। मशहूर अफसानानिगार सआदत हसन मंटो की तरह कृश्न चंदर ने भी प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को एक खुली चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी का शीर्षक ‘कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को एक वेश्या का खत’ था। खत में बंटवारे के परिणामस्वरूप भारत-पाकिस्तान दोनों देशों में शरणार्थियों के दर्द और पीड़ा का विस्तृत चित्रण है। इस काल्पनिक चित्रण में कृश्न चंदर ने दो लड़कियों, एक हिंदुस्तानी और एक पकिस्तानी, को मुख्य किरदार बनाया और उनके मार्फत से अपनी बात कही। खत में व्यक्त विचार और भावनाएं पाठकों पर जबर्दस्त असर डालती हैं।

किताब - तरक्की पसंद तहरीक़ के हमसफ़र लेखक- जाहिद खान प्रकाशक- उद्भावना, एच० 55, सैक्टर 23, राजनगर, गाजियाबाद मोब० - 098115582902 कीमत- 80/ - रु मात्र

किताब – तरक्की पसंद तहरीक़ के हमसफ़र
लेखक- जाहिद खान
प्रकाशक- उद्भावना, एच० 55, सैक्टर 23, राजनगर, गाजियाबाद
मोब० – 098115582902
कीमत- 80/ – रु मात्र

कृश्न चंदर उन मुट्ठी भर साहित्यिक दिग्गजों में से एक थे, जिन्होंने भारतीय फिल्म उद्योग को अपनी प्रतिभा से सजाया, संवारा। उन्होने तकरीबन दो दर्जन फिल्मों के लिए पटकथा और संवाद लिखे। इनमें से ‘धरती के लाल’, ‘आंदोलन’, ‘एक दो तीन’, ‘ममता’, ‘मनचली’, ‘शराफत’, ‘दो चोर’ और ‘हमराही’ जैसी फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी भी मिली। फिल्म ‘धरती के लाल’ और ‘शराफत’ उनकी कहानी पर ही बनी हैं। उन्होंने अपने भाई मोहिंदर नाथ को बतौर अभिनेता स्थापित करने के लिए दो फिल्में भी बनाई जो बॉक्स ऑफिस पर नाकामयाब रहीं। इस नाकामी के बाद उन्होंने एक लेखक यानी कलम का मजदूर बने रहने का ही फैसला किया। अलबत्ता कृश्न चंदर का फिल्म लेखन उनके साहित्यिक लेखन के साथ-साथ चलता रहा। वे साल 1970 से 1976 यानी छह वर्ष की अवधि तक ‘फिल्म राइटर्स एसोसिएशन’ के अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान उन्होंने फिल्म लेखकों के कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए।

कृश्न चंदर बहुत ही विनम्र और सरल व्यक्ति थे। दोस्तों के बीच भी वे उतने ही आडंबरहीन थे, जितना कि अपने घर पर। उनकी शख्सियत के बारे में सज्जाद जहीर लिखते हैं, ‘‘वे बेहद मितभाषी थे, जो बातचीत में और शायद जिंदगी में आम तौर पर जोड़-तोड़ का का कायल नहीं है और जिसकी ईमानदारी, उसकी सादगी बल्कि भोलेपन से जाहिर होती है।’’ कृश्न चंदर की शख्सियत की एक और महत्वपूर्ण बात, लिखने को लेकर उनके भीतर एक जबर्दस्त आग्रह था। लिखने के बारे में वे खुद कहा करते थे, ‘‘मैं एक जानवर हूँ। जो बस लिखना जानता है। यदि मैं ना लिखूँ तो जी भी नहीं पाऊँगा।’’ वे जल्दी उठते, अखबार पढ़ते, चाय पीते, नहाते और फिर नाश्ते के बाद लिखने के लिए बैठ जाया करते। सुबह नौ से बारह या एक बजे तक अकेले में बैठकर लिखना, यह उनकी रोज की आदत थी। यदि किसी दिन लिखना ना हो पाता, तो उन्हें लगता एक कोई बहुत जरूरी काम छूट गया है। लिखते समय वे अपने किरदारों से दिल से जुड़ जाते। किरदारों द्वारा सहे जा रहे दर्द और तकलीफ को वे खुद महसूस करते थे। इस बारे में कृश्न चंदर ने एक जगह लिखा है कि, ‘‘मेरा हर चरित्र मुझ पर से होकर गुजरता है।’’ यही वजह है कि उनकी कहानियों और उपन्यास के किरदार इतने जीवंत होते थे।

krishan-1कृश्न चंदर को अपने जीवन में कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। उनकी अनगिनत साहित्यिक उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने भी उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। कृश्न चंदर का नाम उन साहित्यकारों में शुमार होता है, जिन्हें सोवियत संघ के प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ से नवाजा गया। आखिरी समय तक कृश्न चंदर ने अपनी कलम नहीं छोड़ी। 8 मार्च, 1977 को मुंबई में जब चंदर का निधन हुआ, तो उस वक्त भी उनके हाथ में कलम मौजूद थी। निधन के वक्त कृश्न चंदर एक व्यंग्य ‘अदब बराय-ए-बतख’ (बतख के लिए साहित्य) लिख रहे थे। व्यंग्य उन्होंने शुरू ही किया था, और उसकी सिर्फ एक लाईन ही लिखी थी कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। जीवन के आखिरी दिनों में वे अपनी आत्मकथा पर भी काम कर रहे थे, लेकिन यह उनके जीते जी पूरी नहीं हो पाई। बाद में उनकी पत्नी सलमा सिद्दीकी ने इसे पूरा किया। राजपाल एंड संस से प्रकाशित इस आत्मकथा में उनके जीवन का पूरा सफर तफ्सील से मिलता है। कृश्न चंदर ताउम्र प्रगतिशील, मानवतावादी रहे। उनका बेश्तर लेखन हिंदू-मुस्लिम अलगाववाद के खिलाफ है। समाज के दलित, दमित, शोषित वर्गों के हक में उनकी कलम हमेशा आग उगलती रही। अपने भावपूर्ण लेखन, जमीन से जुड़े किरदारों और सर्वहारा के मार्मिक-सजीव चित्रण की खातिर कृश्न चंदर अपने पाठकों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।

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    By: जाहिद खान

    लेखक, पत्रकार जाहिद खान साल 2003 से लगातार बिना रुके अखबारी और गंभीर लेखन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के छोटे से शहर शिवपुरी में रहकर, सम-सामयिक मसलों पर देश भर की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनके पांच सौ से ज्यादा आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। प्रगतिशील और जनवादी साहित्यकारों के लेखन और उनकी सोहबत से उन्होंने लिखने का शऊर सीखा है। उनका पहला प्यार साहित्य है। लिहाजा अखबारी लेखन से जब भी उन्हें कुछ फुर्सत मिलती है, तो साहित्यिक आलेख और समीक्षाएं लिखने की कोशिश करते हैं। प्रस्तुत किताब भी इन्हीं साहित्यिक आलेखों का संकलन है, जो उन्होंने समय-समय पर लिखे थे। इस किताब के अलावा सम-सामयिक मसलों पर केन्द्रित उनकी दो किताब ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘संघ का हिंदुस्तान’ अभी तलक प्रकाशित हो चुकी हैं।
    लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ठ लेखन के लिए मुंबई की एक सामाजिक संस्था ‘पापुलेशन फस्र्ट’ और यूएनएफपीए (यूनेस्को) उन्हें दो बार, साल 2011-12 और 2013-14 में ‘लाड़ली मीडिया अवार्ड फॉर जेंडर सेंसिटिव्हिटी’ से सम्मानित कर चुकी है। ‘टर्निग इंडिया सम्मान’ उन्हें मिला दीगर सम्मान है। साहित्यकार मित्र और पाठक उन्हें इस पते, मोबाइल और ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं-जाहिद खान, महल कॉलौनी, शिवपुरी मध्य प्रदेश, पिन कोड-473551, मोबाइल-94254 89944, [email protected]

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