सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य को लेकर बन रही फिल्मों से परहेज नहीं, किन्तु यह जरुरी नहीं कि वो वाकई मनोरंजन करेंगी | मनोरंजन की परिभाषा को दरअसल निर्माता एवं बाज़ार अपने हिसाब से गढ़ रहे एक जमाना था जब बी आर इशारा की बोल्ड फ़िल्मों की धूम थी । उनकी फ़िल्म ‘चेतना’ ने एक साथ कई नई बहसों को जन्म दिया था। इनमें फ़िल्मों में सेक्स-चित्रण, यौन-शुचिता और नैतिकता के साथ-साथ सेंसर बोर्ड पर भी सवाल उठाए। लेकिन आज कामेडी में सेक्सुआलिटी का पुट देकर एक नए किस्म के हास्य-व्यंग्य (फूहडता) को रचा गया है । वर्तमान में कॉमेडी के बदलते स्वरूप पर तुलनात्मक अध्ययन करता सैयद एस तौहीदका आलेख ….| संपादक 

क्या एडल्ट कॉमेडी वाकई कूल है..?  

आईए ‘नक्शाब जारचवी’ को जाने: सख्शियत (सैयद एस तौहीद)

एस तौहीद शहबाज़

फिल्मों का सतहीपन आपको परेशान करता होगा | मुझे भी करता है | नयी फिल्मों में ‘मस्तीजादे’ व ‘क्या कूल हैं हम’ के नए संस्करण ट्रेलर भी सतहीपन का एहसास दे गए | क्या कूल का तीसरा संस्करण इसी शुक्रवार को रिलीज भी हो गया | मनोरंजन को एक नया आयाम देने की कोशिश हो रही है | पहला वाला लेकिन नकारात्मक प्रभाव का मनोरंजन | मस्ती-मस्तीजादे व ‘क्या कूल हैं हम’ तथा उनके समान बाकी फिल्मों ने हिंदी सिनेमा में एडल्ट कॉमेडी की धारा विकसित की | मनोरंजन के नाम पर कंटेंट मेनीपुलेशन का नया किस्म देखने की इच्छा हो तो इन्हें देखें | माना कि टीवी के बनावटी ठहाकों ने बहुत खुश किया होगा, लेकिन विचार करें कि बनावटी ठहाकों के लिए फ़िल्में बनाने का चलन टीवी के कॉमेडी नाइट्स एवं सर्कस से शक्ति नहीं पा रहा ? हालात से उपजा लाफ्टर, दर्शकों से आसानी से अनुकूलन कर लेता है | स्वाभाविक व्यंग्य स्वत: उत्पन्न हुआ करता है | हांस्य -व्यंग्य दरअसल आरोपित ना हो तभी भाता है | बनावटी तालियों व ठहाकों के मकसद को लेकर बना सिनेमा सतही मनोरंजन से अधिक नहीं दे सकेगा | आज की हॉरर हिंदी फिल्मों एवं एडल्ट कॉमेडी फिल्मों का ओवर-मेनीपुलेटेड कंटेंट मनोरंजन को लम्बी उम्र नहीं दे सकता| सिनेमा स्वयं अपने भविष्य का नुकसान करने वाला साबित ना हो, इसके लिए निर्माता को नजर एवं नजरिया दोनों बदलना होगा | उन्हें विचार करना होगा कि वर्तमान परिदृश्य में इस तरह की फिल्मों को स्वीकार करने के लिए क्या भारतीय समाज तैयार है ? दूसरा यह कि उस पर इस किस्म का कंटेंट क्या नकारात्मक दबाव नहीं बनाएगा ?

क्या कूल के तीसरे संस्करण का पोर्न वेबसाइटों पर प्रमोशन भी किया गया | फ़िल्म में अभिनेता तुषार कपूर व आफ़ताब शिवदासानी मुख्य भूमिकाएं निभा रहे हैं | सेंसर की ओर से इसे ‘ए’ सर्टिफ़िकेट के साथ पास किया गया | फ़िल्म का प्रमोशन पोर्न वेबसाईटों पर किया जा रहा है | तुषार कपूर के अनुसार ऐसी वेबसाइटें काफ़ी सर्च की जाती हैं | फ़िल्म को वहां प्रमोट करने में कोई हर्ज नहीं! बालाजी टेली फ़िल्म्स का भी जरा तर्क देखें ऐसा इसलिए …क्योंकि इस फ़िल्म में किरदार पोर्न इंडस्ट्री से जुड़े हैं ! यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल फ्लोरिडा के अनुसार एडल्ट फिल्में पुरुषों को विकल्प देती हैं | उस एक वक्त में उसे लगता है कि उसके पास विकल्प ही विकल्प हैं| विकल्प व्यवहार में भी काफी बदलाव लाता है| एडल्ट फ़िल्में पुरुषों को धोखा देने के लिए प्रेरित करती हैं | हंसी मजाक में सही लेकिन एडल्ट कॉमेडी फ़िल्में धोखा देने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं | सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य को लेकर बन रही फिल्मों से परहेज नहीं, किन्तु यह जरुरी नहीं कि वो वाकई मनोरंजन करेंगी | मनोरंजन की परिभाषा को दरअसल निर्माता एवं बाज़ार अपने हिसाब से गढ़ रहे | दर्शको का एक बड़ा सेक्शन 18 वर्ष से अधिक में पड़ेगा, इस एज ग्रुप के लिए ही ‘क्या कूल’ सरीखी फ़िल्में बनाई जा रही हैं | लेकिन यह जरुरी नहीं कि उनको यह फ़िल्में ठीक भी लगती हो | ‘क्या कूल’ एवं उस श्रेणी की अन्य कॉमेडी फ़िल्में क्या वाकई कूल कही जानी चाहिए? कंटेंट के हिसाब से क्या एडल्ट कॉमेडी फिल्में खुद को कूल बना पा रहीं हैं | फिर भी यह सिनेमा बन रहा है एवं चल भी रहा है | बाजार की मांगों का समाज पर प्रभाव होगा ही | दर्शकों का टेस्ट बाज़ार के दबाव के सामने धूमिल सा हो रहा है |

एक जमाना था जब बी आर इशारा की बोल्ड फ़िल्मों की धूम थी । उनकी फ़िल्म ‘चेतना’ ने एक साथ कई नई बहसों को जन्म दिया था। इनमें फ़िल्मों में सेक्स-चित्रण, यौन-शुचिता और नैतिकता के साथ-साथ सेंसर बोर्ड पर भी सवाल उठाए। चेतना की रेहाना सुल्तान ने एक काल गर्ल की भूमिका निभाई । लेकिन उनका किरदार पारंपरिक वेश्याओं ( सेक्स वर्कर ) से नितांत अलग था । हिंदी सिनेमा में यह चरित्र पहले भी आ चुके हैं। रेहाना देह को सक्षम मानती है, साथ ही दिमाग का भी इस्तेमाल करती है। इशारा की फिल्मों ने व्यस्कता को अधिकार की तरह रखा। लेकिन इशारा की फिल्में सतही-नीरस एडल्ट फिल्मों से काफी आगे थी। इस साहसी फिल्मकार ने मुख्यधारा में रहकर ही व्यस्क किस्म की फिल्में बनाई। आप चाहे तो इशारा के काम को सी व डी ग्रेड में रख लें, किंतु उनके सिनेमा की गुणवत्ता कम नहीं कर सकते। कंटेंट की वैचारिक धुरी के आधार पर यह फ़िल्में कूल थीं | आपकी फिल्मों की कहानी की तरह सतही आइडिया से उत्पन्न नहीं थी | आज की एडल्ट हिंदी फिल्मों की कथा में इशारा की फिल्मों की तरह गंभीरता नहीं नजर आती | आज एडल्ट कॉमेडी फिल्मों से गंभीरता की उम्मीद करना बेमानी सी बात होगी | लेकिन इससे वो सामूहिक जिम्मेवारी से बच नहीं सकती | रामसे की हारर फिल्मों में मौजूद सेक्सुआलिटी में सतहीपन –स्टीरियोटाईप में वैचारिकता की घोर कमी थी। विक्रम भटट की हारर फिल्मों में खुलापन तो जरूर है,लेकिन रामसे की तुलना में दूसरे किस्म का है। आधुनिक जमाने में ‘सेक्सुआलिटी’ एक दबा हुआ सा लेकिन अभिव्यक्त विषय बन गया है। हेट स्टोरी के तीन संस्करण आ गए हैं| दशकों पूर्व ‘कर्म’ में देविका रानी-हिमांशु राय बीच सीन को लेकर काफी तर्क-वितर्क हुआ, लेकिन भारतीय सिनेमा में एडल्ट कंटेंट नहीं रूका। शोर्ट टाइम कलाकारों को लेकर वो फ़िल्में बनने लगी | फिर एडल्ट कॉमेडी फिल्मों की धारा विकसित की गई | हंसी मजाक को व्यस्क एंगल देकर एडल्ट कंटेंट जारी रहा | कभी अनजान कलाकारों को लेकर रिलीज हुई एड्ल्ट फिल्मों में आज जाने-पहचाने कलाकार भी काम करते देखें जा सकते हैं| अब की ‘एडल्ट’ फ़िल्में सतहीपन-स्टीरियोटाईप को चुनौती देने के नजरिए से बन रही हैं, लेकिन सतहीपन से मुक्ति की राह इतनी सीधी भी नहीं है |

आज भोजपुरी सिनेमा इस बात को सम्मान मान रहा है कि उसने सी व डी ग्रेड की फिल्मों अथवा मोर्निंग शो की फिल्मों को खत्म कर दिया है। लेकिन क्या वो नहीं भूल रहे कि सफाई अभियान में गंदगी की ओर झुक गए? उसका घोर रूप से हिस्सा बन गए ! भोजपुरी सिनेमा का खुलापन शब्दों से होकर फिल्मांकन- संगीत व दृश्यों तक पहुंच गया है। कहानियों से हटकर चर्चा करें तो वहां आ रहे आईटम गानों में सेक्सुआलिटी की बडी संकीर्ण परिभाषा नजर आती है। बडे शहरों में अब सुबह के शो वाली सी-डी ग्रेड हिंदी फिल्में नहीं नजर आती हैं। छोटे शहर-कसबे व गांवों के सिनेमाघरों में टाईमपास के लिए यह फिल्में अब भी दिखाई जाती हैं। इनके निर्माताओं को नामकरण के लिए पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए ! साहब इनका नाम कामुक व अति कामुक नामों में अवार्ड लेगा। लेकिन फिल्मो को किस श्रेणी में रखा जाए, इस पर आप भी विचार करें | कांति शाह की फिल्मों को आप किसी कतार में रखते हैं? वो बी सी या डी नहीं, कांति ग्रेड की फिल्में बनाते हैं। व्यस्क फिल्मों के लेखक भी बडे कलाकार किस्म के हैं। एडल्ट कहानी-पटकथा लिखना जोखिम वाला काम होता है, क्या वो अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को व्यर्थ नहीं कर रहे ? कहा जाता है कि इस किस्म की फिल्मों से कला व सार्थक की कामना नहीं करनी चाहिए, क्या इनकी चिता से जन्म लेने वाली मुख्यधारा व्यस्क अथवा एडल्ट कॉमेडी फिल्मों से भी कामना नहीं करें? हालीवुड की एडल्ट व स्ट्रीक्टली एडल्ट फिल्मों में भी सतहीपन होता है! वहां की ए ग्रेड सिनेमा में खुलेपन का असर देश में बन रही फिल्मों पर हुआ, यहां के सिनेमा में खुलापन परोसने वालों का तर्क देखिए ! एडल्ट फिल्मों के दर्शक घोर अवसाद की स्थिति में होते हैं। मन व काया पर कामुकता का विस्फोट करने वाली फिल्में आदमी का काफी नुकसान करती हैं। लेकिन कोमल मनोभावों की हत्या का जुर्म बड़े बैनरों तले बनी एडल्ट सर्टिफाइड हिंदी कॉमेडी फिल्मों पर भी बराबर है।

मानवीय रिश्तों पर फिल्में बनाने वाले फिल्मकार भी कंटेंट में खुलेपन को बडी चतुराई से डाल रहे हैं। कुछ यूं हो रहा है मानो वो नहीं किया तो फिल्म चलने वाली नहीं। इधर देखने में आ रहा है कि किरदार का गाली अथवा अपशब्द बोलना लाजिमी है! अभिव्यक्ति के नाम पर वासेपुर की सृजनात्मक सीमा आप को याद होगी | साहसी फिल्मों के सारथी लोग सेक्सुआलिटी को व्यक्त करना साहस मानते हैं। गालियों व कामुक प्रसंगों का प्रसार समाज में उन्माद की स्थिति नहीं बना रहा ? अपराध व सेक्स के मेलजोल से बनी कहानियों का चलन सिनेमा में काफी समय से है। इस मामले में किरदार व कहानियां में बदलाव तो हुआ, लेकिन प्रेरणा टाईपकास्ट रही। विज्ञान व आधुनिकता के जमाने में भूत-पिशाच की हारर फिल्में बननी चाहिए थी ? ज्यादातर स्त्री आत्माएं कामुक व बलाजान सुंदरी क्यों बनाई जा रही हैं ? जिस कलाकारी व खुलेपन से आत्माओं का रूप-रंग गढा जा रहा, उसे देखकर मालूम पडता है कि फिल्मकार ने उन्हें देखा है ! रामसे व कांति शाह की हारर फिल्मों में भूत-पिशाच अमूमन कुरूप व डरावने किस्म के रहे, इनके रूप-रंग की एक नयी परिभाषा हिंदी की मुख्यधारा फिल्मों ने रची। आलम देखें कि ग्रेंड मस्ती सरीखा एडल्ट कॉमेडी फिल्म हिट-सुपरहिट बनी। एडल्ट सर्टीफीकेट पर रिलीज हुई फिल्मों में मौजूद खुलापन पारिवारिक फिल्मों को भी मायाजाल में खींच ले गया। आज के जमाने से पहले ‘कामेडी’ का मतलब केवल हास्य-व्यंग्य हुआ करता था लेकिन आज कामेडी में सेक्सुआलिटी का पुट देकर एक नए किस्म के हास्य-व्यंग्य (फूहडता) को रचा गया है । कहना होगा कि इस किस्म के प्रयोग मूल विधाओं को बर्बाद कर रहे है । फिल्मों को अंतरंग दृश्यों के दावे चलाने वाले प्रयासों की कमी नहीं। अनेक बार काफी वैचारिक कामों को अनावश्यक आईटम गानों द्वारा खराब होते देखा है। सेक्सुआलिटी को कहानी की टाईमलाईन में जगह कम मिली, लेकिन मिली । हिंदी में अब बन रही व्यस्क फिल्मों को शायद इन हिट गानों से भी प्रोत्साहन मिला होगा। सिनेमा में सृजनात्मक संभावनाओं की अपार क्षमता हुआ करती है, एक मामूली से कहे जाने वाले प्रसंग को कहानी में ढलते देखा है। अभिव्यक्त करने के पचासों तरीके फिल्मकार आजमाया करते हैं। सृजनात्मक महत्वकांक्षाओं ने फिल्मकारों को अनावश्यक चीजों तक पहुंचाया। सिनेमा को गैर-जरूरी चीजों से बचाए रखने से सतहीपन से मुक्ति मिलेगी व कंटेंट में गरिमा कायम होगा । वो सिनेमा वाक़ई कूल भी कहा जाएगा ।

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