“सभी माध्यमों के इतर दिलों को जोड़ने वाला माध्यम गिने-चुने हैं। कला ,उसमें सबसे सशक्त माध्यम है जो दिलों को छू जाती है। अभी जनमाष्टमी पर अबू मोहम्मद औऱ फरीद अय्याज की आवाज मे ‘कन्हैया, याद है कुछ भी हमारी’ कव्वाली सुना। कृष्ण के प्रति इतना अनुराग देखकर कैसे ये मन नही चाहेगा कि कला को सीमाओं मे न बाधा जाए! नफरत का आकाश भी इतना घना है कि लोग इसे सैनिकों के बलिदान से जोड़ेगे औऱ अमन की बात करने वालों से उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रमाण मांगा जाएगा। पर बिना डरे निर्भीकता से उनको चलना होगा, क्योंकि युद्ध कोई हल नही है बल्कि स्वयं मे ही एक समस्या है।” ‘अभिषेक प्रकाश’ का आलेख ……

क्या कला को सीमाओं में बाँधना आदर्श स्थिति होगी ? 

अभिषेक प्रकाश

अभिषेक प्रकाश

आजादी औऱ विभाजन हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की नियति मे साथ साथ था। घृणा और हिंसा की गठरी को दोनों मुल्कों ने स्वेच्छा से ही उठा लिए। पाकिस्तान के हुक्मरानों का यह शुरू से ही एजेंडा रहा कि कैसे भारत से कश्मीर लिया जाए। इसके लिए उस मुल्क ने जितना भी हो सके नफरत के कारोबार को हवा दी। ‘गुड’ व ‘बैड टेररिज्म’ भले ही मान्य न हो परन्तु पाकिस्तान सरकार ने उन आतंकवादी संगठनों को सहायता दी जो पाकिस्तान के ‘गुड’मंसूबो से मेल खाते हो। कश्मीर के लिए उसने अपने पूरे मुल्क के विकास को दांव पर लगा दिया। कश्मीर को ‘अनफिनिश्ड एजेंडा’ मानकर उसने अपने आव़ाम को राष्ट्रवाद की घूंट्टी तो पिलाई ही उसने भारत को भी लगातार इसमें उलझाए रखा। हालांकि राष्ट्रीयता की कमोवेश वही घुट्टी भारतीय हुक्मरान भी आवाम के भीतर घोल रहे थे किन्तु उसमें मानवीय तर्कशीलता भी थी।किन्तु आज राष्ट्रीयता की गूँज तो बढ़़ी है लेकिन कहीं न कहीं तर्कशीलता की कमी हुई है। बावजूद इसके भारत आज पाकिस्तान से बेहतर स्थिति मे है जिसके पीछे बहुत हद तक कारण रहा हमारा संविधान, तर्कशीलता और हमारी इंसानी सलाहियत । परन्तु आज जिस तरह से लोग युद्ध के लिए लामबंदी कर रहे है वह अफसोस जनक है। कुछ भी हो सच्चाई यही है कि दुनिया के किसी अन्य देश की तुलना मे हम आज भी एक दूसरे से ज्यादा सांस्कृतिक समानता रखते है। हांलाकि विभाजन ने केवल सीमाओं को ही नही बांटा बल्कि हमारे दिलों को भी बांटने की कोशिश की। परन्तु जख़्म गहरा होने के बावजूद भी नफरत उतनी गहरी नही थी जैसा कि आज हम देखते हैं या दिखाने की कोशिशें हैं ।

google से साभार

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मंटो साहब की एक कहानी है ‘टोबा टेक सिंह’। जिसके एक पागल चरित्र के माध्यम से ही उन्होंने तत्कालीन समाज की सोच को सामने रखा।एक पागल जिसको अपने घर की तलाश है ,उसका पता कहीं राजनीतिक आकांक्षाओं मे गुम हो चुका था । वही एक दूसरा पागल पात्र एक पेड़ पर बैठकर उसकी ही शाखाओं को काटता है। पूछने पर कहता है कि ” मैं न हिन्दुस्तान मे रहूंगा न पाकिस्तान मे। मै इस दरख्त पर रहूंगा। “कहानी छोटी है पर विभाजन की वेदना को स्पष्टता से रखती है। सियासत को छोड़ दे तो अमूमन हम यह पाएंगे कि आव़ाम अमन पसन्द ही होती है।समय भले ही बदला हो पर ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। आनन्द पटवर्धन की एक डॉक्यूमेंट्री है ‘वॉर एण्ड पीस’ जिसमें उन्होंने दोनो देशों द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण के बाद वहां के लोगों से बातचीत की। जिसका सार यह है कि जो एक गैर-राजनीतिक वर्ग है उसे युद्ध नही शान्ति पसन्द है। दोनों मुल्को के लोग सारी असहमतियों के बावजूद एक दूसरे से मिलना चाहते है। दोनों एक दूसरे के बारे मे जानना चाहते है। संवाद सबसे कारगर माध्यम है जो तमाम संदेहो को मिटाने की ताकत रखता है। संदेह के साथ एक अजीब सी अधीरता भी है हमारे भीतर पाकिस्तान को लेकर । पीयूष मिश्रा के एक गीत का बोल है –
पत्ते क्या झड़ते हैं/पाकिस्तां में वैसे ही
जैसे झड़ते यहां/होता उजाला क्या/
वैसा ही है/जैसे होता हिन्दोस्तां में।
औऱ /रोता है रातों मे
पाकिस्तां क्या वैसे ही/ जैसे हिन्दोस्तां।
“ऐसी अधीरता ही हमें एक दूसरे से दूर जाने नही देती। और इसी को अपने शब्दों व संगीत के माध्यम से कलाकार हम तक पहुंचाते हैं।
सच यही है कि हमारी संवादहीनता ने संदेह के बादलों को और घनीभूत किया है। मन तो मेरा भी है कि मैं गुरु नानक और भगत सिंह के जन्मस्थान को देखूं पर हमारे लिए अब्राहम लिंकन के घर को देखना तुलनात्मक रूप से ज्यादा आसान है।
युद्ध, हिंसा, नफरत, घृणा, के इस माहौल मे अगर कोई आशा जगाने वाले है तो ये कलाकार औऱ खिलाड़ी ही है। जो हमारे बीच अमन,शांति औऱ भाईचारे का पैगाम फैलाते है। आबिदा परवीन, गुलाम अली, नुसरत फत्ते अली खां जैसे तमाम नाम है जिन्होंने देश की सीमाओं से ऊपर उठकर लोगों के दिलों मे जगह बनाई। आबिदा परवीन कहती हैं कि ‘मेरी या हमारी संस्कृति अध्यात्म और प्रेम मे समृद्ध है। इस मोहब्बत के पैगाम को ही हमें फैलाना है। भले ही इसका विरोध हो लेकिन यदि एक भी इस पैगाम को समझता है तो समझूंगी कि मै सफल हुई, क्योंकि एक बन्दा भी पूरी कायनात है।’
इसके उलट जो लोग इन कलाकारों पर बन्दिशें लगा रहे है क्या यह दोनों मुल्को की समस्याओं का समाधान हो सकता है। ये तो और जहर बोने वाली बात हुई। ऐसा नहीं कि केवल हमीं ऐसा सोचते है बल्कि आप वहां के अखबारों, पत्रिकाओं को खंगालिए ऐसे अमनपसंद लोगों की एक अच्छी ज़मात हैं वहां। पाकिस्तानी चैनल पर एक संगीतकार ने एक वाजि़ब बात कही कि मेरा मुल्क अमेरिका का एहसानमंद है ,क्यों कि इसने हमसे जंग लड़वाई ! जो बीज उन्होंने बोया वह हम काट रहें है ! भारत से ज्यादा नुकसान तो अमेरिका ने हमें पहुंचाया। फिर भी हम आज अमेरिका जाते हैं !क्योंकि हमें भी रोजी-रोटी चाहिए। भारत की भी यह समस्या है, औऱ हिन्दुस्तानी भी इसलिए वहां जाते है।’
वाजिब है कि जिसके खिलाफ सियासत को जंग लड़नी चाहिए उस ओर किसी का ध्यान नहीं है। आज भारत -पाकिस्तान के बीच जब क्रिकेट मैच होता है तब आप राष्ट्रवाद का कोई पैमाना लेकर बैठिए तब देखिये कैसे सीमाएं बॉर्डर पर नहीं हमारे दिलों मे खींच दी गई है !खेल भावना की जगह दोनों मुल्को मे बदले की भावना हावी हो जाती है। हारने के बाद हम अपने ही खिलाडियों का अपमान करते हैं।
हर बर्ष ‘बाघा बार्डर’ पर भीड़ बढ़ती ही जा रही है। दोनों देश के सैनिकों का परेड के समय एक दूसरे के सामने पैर उठाकर चेक मारना हमारे अन्दर के देशभक्ति को तुष्ट करती है।
इन सभी माध्यमों के इतर दिलों को जोड़ने वाला माध्यम गिने-चुने हैं। कला ,उसमें सबसे सशक्त माध्यम है जो दिलों को छू जाती

साभार google से

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है। अभी जनमाष्टमी पर अबू मोहम्मद औऱ फरीद अय्याज की आवाज मे ‘कन्हैया, याद है कुछ भी हमारी’ कव्वाली सुना। कृष्ण के प्रति इतना अनुराग देखकर कैसे ये मन नही चाहेगा कि कला को सीमाओं मे न बाधा जाए! नफरत का आकाश भी इतना घना है कि लोग इसे सैनिकों के बलिदान से जोड़ेगे औऱ अमन की बात करने वालों से उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रमाण मांगा जाएगा। पर बिना डरे निर्भीकता से उनको चलना होगा, क्योंकि युद्ध कोई हल नही है बल्कि स्वयं मे ही एक समस्या है। आज दोनों मुल्क मे ऐसे लोगों की बिशेष जरूरत है जो शान्ति के पैगाम को फैलाए,क्योंकि राजनैतिक नेतृत्व और सेना अपने हिसाब से समस्याओं को हल कर रही है। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ‘समझौता एक्सप्रेस’ जाने को तैयार है और लाहौर से आई ताहिरा के आंखों मे अपनो से बिछड़ने का दर्द है। बयासी बर्ष के कुरैशी , जो पिछली बार १९६२ मे भारत आए थे, इस बार यहां आने के लिए पिछले कई सालों से पैसे इकट्ठा कर रहे थे। आज ऐसे बहुत से लोग है जिनको दोनो देशो के सम्बन्धो मे बेहतरी की उम्मीद है।
राम मनोहर लोहिया ने भी अपनी पुस्तक ”भारत विभाजन के गुनहगार” मे एक कॉनफेडरेशन की कल्पना की थी। हांलाकि भारत ने हमेशा ही सहयोगात्मक दृष्टिकोण रखा। पर परिणाम अपेक्षित नही रहा। कभी-कभी कड़े कदम उठाने पड़ते है पर उसके बाद आज जो जहरीली मानसिकता बोई जा रही है,वह इस देश के भविष्य के लिए खतरनाक है।

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