क्या मैं आदमी हूँ….? (अश्विनी ‘आश्विन’ की दो ग़ज़लें)

अश्विनी ‘आश्विन’

अश्विनी ‘आश्विन’ उन रचनाकारों में से है जिन्हें रचनाओं के रूप में खुद के प्रकाशित होने से कहीं ज्यादा रचनाधर्मिता का नशा रहता है | चुपके से कहीं कोने में बैठ कर समाज का जरूरी विश्लेष्ण करते रहना और उन्हीं मानवीय कुंठाओं और विषमताओं को अपनी रचनाओं में उकेरना उन्हें ज्यादा अच्छा लगता है | हालांकि उन्होंने संकेत रंग टोली और कोवलेन्ट ग्रुप के नाटकों के लिए गीत भी लिखे हैं वहीँ जन सिनेमा द्वारा निर्मित फिल्म के लिए गीत भी आप ही ने रचे थे | अनुरोध के बाद उनसे उनकी दो हालिया ग़ज़लें प्राप्त हुईं हैं जिन्हें यहाँ प्रकाशित करते हुए हमें बेहद ख़ुशी है | -सम्पादक 

1- क्या मैं आदमी हूँ….?

कहीं मैं बौद्ध हूँ ! जैनी कहीं हूँ !
कहीं हिन्दू, यहूदी, पारसी हूँ !!

बजाता हूँ कहीं घंटे मठों में,
पुजारी, संत, पंडित, ध्यानची हूँ!!

लगाता हूँ अज़ानें मस्ज़िदों में,
वहाँ क़ाज़ी, नज़ूमी, मौलवी हूँ !!

कहीं गिरिजाघरों में धर्म गढ़ता,
नए आयाम देता पादरी हूँ !!

अगर मेरा यहाँ मज़हब न कोई,
ज़हाँ भर के लिए मैं अज़नबी हूँ!!

अगर मज़हब, ज़हां तय कर चुका हो,
महज़ मैं मज़हबी हूँ! मज़हबी हूँ! !

यहाँ दैर-ओ-हरम से दूर होकर,
भले कुछ हूँ! मगर कुछ भी नहीं हूँ!!

मज़हब-ओ-क़ौम यदि पहचान मेरी,
यकीं कैसे करूँ ? मैं आदमी हूँ!!

2- आओ, बात करें ! !

आओ ! उजड़े खेतों, सूखे-
खलिहानों की बात करें।
भूखे-प्यासे, बेघर-बेदर
इंसानों की बात करें।।

बात करें, सुरसा के मुंह सी
बढ़ती इस मंहगाई की,
रोटी के टुकड़ों पर बिकते
ईमानों की बात करें।।

चूम लिया फाँसी के फंदों
को, आज़ादी की खातिर,
साहस के ऐसे मतवाले-
दीवानों की बात करें ।।

आये रोज़, मसलते असमत,
इन बेख़ौफ़ दरिंदों की,
मानवता के हर पल होते
अवसानों की बात करें।।

सोना उगल रही धरती पर,
पुल, मिल, सड़कें, मौल बना
आदमियत का अक्स निगलते
भगवानों की बात करें ।।

दारू के रंगीन भंवर में,
कितने-ही घर डूब गए,
लोगों के परिवार निगलते
मयखानों की बात करें।।

बात करें हम, अपने हक से
बंचित, बे-बस बचपन की,
इन बच्चों के लुटते-पिटते
अरमानों की बात करें।।

दिन पर दिन बढ़ती आबादी
रोटी को मिमियाते हम,
हम पर होते रोज़, विदेशी
अहसानों की बात करें।।

जाति, धर्म, भाषा, भूषा पर
अपना खून बहाते, उफ़!
मंदिर-मस्जिद पर लड़ते इन
नादानों की बात करें ।।

बात करें, भ्रष्टाचारों की,
रिश्वत की, घोटालों की,
हाँ ! खादी में छिप कर बैठे,
हैवानों की बात करें ।।

बात करें, आतंकित युग की,
हिंसा, अबला शोषण की,
दानवता के पग-पग चढ़ते
सोपानों की बात करें ।।

बात करें हम, कदम-क़दम पर,
गिरते मानव-मूल्यों की ,
मानवता के हित में, अपने
बलिदानों की बात करें ।।

आये-दिन गोष्ठी, परिचर्चा,
वाद-विवादों के पचड़े,
कोरी बातें करने वाले
विद्वानों की बात करें ।।

चमक-दमक से चुन्धियाये हम,
अकुलाये-से, बेकल-से,
पल दो पल हम अपनी भटकी
संतानों की बात करें ।।

इस गुलशन की बदहाली पर,
खूब सियासत करते जो,
मजबूरों का शोषण करते
धनवानों की बात करें ।।

कदम-कदम पर रंग बदलते,
गिरगिट को मातें देते,
आडम्बर का चोगा पहने
शैतानों की बात करें ।।

ये बूढ़े माँ-बाप, सड़क पर
जिन का दाना-पानी है,
थोड़ा औलादों पर, इनके
अहसानों की बात करें ।।

खलने लग जाए जब मन की
बेचैनी, कुछ ज़्यादा ही,
तब मन के कमरे में कैदी
तूफानों की बात करें ।।

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