क्या हम भगत सिंह को जानते हैं …? 

हनीफ मदार

हनीफ मदार

ऐसे समय में जब पूंजीवादी व्यवस्थाओं के दमन से आर्थिक व सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है जो सामाजिक राष्ट्रीय विघटन को तो जन्म दे ही रहा है साथ ही स्वार्थ और संकीर्णता जैसी विकृतियां पैदा कर मानव मूल्यों का संकट भी पैदा कर रहा है | क्यों हो रहा है यह सब..? क्या इसे बदलने का कोई रास्ता नहीं…? यह सवाल जितना महत्वपूर्ण है उतना ही मुश्किल भी | सामाजिक और राजनैतिक रूप से यह सवाल वस्तुगत तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ गहन विश्लेषण की दरकार रखता है | ऐसे में हमेशा ही भगत सिंह की आवश्यकता जान पड़ती रही है | कि हम भगत सिंह से मिलें, जानें, और समझ सकें कि आखिर क्यों आज़ादी के बाद से भी अभी तक हमने कभी यह नहीं सोचा कि एक आदमी जो खेतों में अन्न उगाता है वही भूखा क्यों सोता है…? कपडे बुनने वाला नंगा और घर बनाने वाला बेघर यानी उत्पादन करने वाले हाथ ही उन तमाम भौतिक संसाधनों से दूर क्यों हैं …? हालांकि इधर भगत सिंह को, उन्हीं के शब्दों में कहें तो ‘राष्ट्रवादी’ ‘सरदार’ भगत सिंह’ को विशुद्ध रूप से एक ‘राष्ट्रभक्त’ के रूप में पुनर्स्थापित किये जाने की पुरजोर कोशिश जारी हैं | यूं तो इसे सुखद अनुभूति माना जा सकता है | किन्तु बिडम्बना है कि यह सब ऐसे वक़्त में हो रहा है जब युवाओं का एक बड़ा वर्ग भगत सिंह से या तो परिचित ही नहीं है या उसे महज़ एक क्रांतिकारी के रूप में ही जानता है, कि उसने देश के लिए अपनी जान दे दी | तब महज़ राजनैतिक स्वार्थों के लिए भगत सिंह को एक ‘आक्रान्ता’ ‘राष्ट्रवादी’ योद्धा के रूप में व्याख्यायित और पुनर्परिभाषित किया जाना युवा पीढ़ी को तो भ्रम के गलियारों में भटकाने जैसा है ही साथ ही भगत सिंह जैसे महान विचारवान व्यक्तित्व के प्रति भी अन्याय ही है |

क्या ऐसे में इस सवाल का उठ खड़ा होना स्वाभाविक नहीं लगता कि आखिर किन वज़हों के चलते भगत सिंह की फांसी के बाद से आज तक भगत सिंह को उनकी समूल वैचारिकता के साथ भारतीय जन और ख़ासकर युवा पीढ़ी के सामने नहीं आने दिया गया ? शायद यही कारण है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से घोर असमानताओं और विषमताओं के समय में भी हम भगत सिंह के वैचारिक पक्ष की ओर मुड़ कर नहीं देख रहे जो मानव हित के लिए सबसे ज्यादा जरूरी रहा है |
भगत सिंह एक व्यक्ति मात्र नहीं बल्कि एक समूल वैचारिक संस्था या कहा जाय कि बीसवीं सताब्दी में तात्कालिक समय के कार्यकर्ताओं, राजनीतिज्ञों से एक कदम आगे के राजनैतिक दूरदृष्टा और वुद्धिजीवी थे | यह सब वैचारिक समानता की आत्ममुग्धता नहीं है बल्कि उनकी सामाजिक, राजनैतिक समझ को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि फांसी से ठीक पहले १९३० में भगत सिंह का कहना था कि ‘लगभग १५ वर्ष बाद आज़ादी तो मिल जायेगी लेकिन यह आज़ादी वास्तविक आज़ादी नहीं बल्कि महज़ सत्ता हस्तान्तारण के रूप में ही होगी एक किस्म का समझौता भर’ | अब अगर आज़ादी मिलने बाली बात को महज़ संयोग मान भी लिया जाय तो वास्तविक आज़ादी से लेकर सत्ता हस्तांतरण तक के उनके कथन को क्या आज़ादी के 65 सालों में भी झुटलाने का एक भी वाजिब कारण नज़र आता है …? क्या क़र्ज़ के बोझ तले दबा किसान आज आत्महत्या नहीं कर रहा है….? क्या बड़े बड़े महलों के ठीक सामने उन्हीं महलों को बनाने वाला मजदूर अब भी सड़कों पर या झुग्गी बस्तियों में रात बिताने को मजबूर नहीं है…? क्या कोई ग़रीब आज अपने बच्चे को उच्च शिक्षा दिला पाने में सक्षम है….? फिर चाहे स्त्री मुक्ति या सुरक्षा का सवाल हो, स्वास्थ्य या न्याय पाने का मामला हो | क्षेत्र कोई भी हो स्थितियां बीसवीं सताब्दी के उत्तरार्ध से अलग नहीं हैं और यदि यथार्थ के धरातल पर यह सवाल हमें जीवित दिखाई नहीं देते हैं तब निश्चित ही हम भगत सिंह को नहीं जानते और न ही उस 23 वर्षीय नौजवान की राजनैतिक दूरदृष्टि की गहराई को समझ पाए हैं |
गरीबों और दलितों को दरिद्रनारायण या हरिजन कहकर सब कुछ उनके भाग्य पर थोप देने के सिद्धांत को हम जानते हैं, जबकि भगत सिंह इन सिद्धांतों को विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार मानते थे जो अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर सही ठहराते हैं | यदि हमें वर्तमान सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था में ऐसी विषमताएं दृष्टिगोचर नहीं होतीं तो हम भगत सिंह को नहीं जानते |
महज़ 23 वर्ष की अल्प आयु में चार्ल्स डिकेन्स, कीट्स, रोपेशिन, मैक्सिम गोर्की, मार्क्स, उमर खय्याम, एंजिल्स, आस्कर वाइल्ड, जार्ज बर्नाड शॉ के अलावा आयरिश क्रांति, रूसी क्रांति आदि का गहन अध्धयन कर लेने वाले अध्येता भगत सिंह ने अर्थशास्त्र, विश्व क्रांति, समाजशास्त्र एवं राजनीति पर अधिकार पूर्वक अपनी स्पष्ट और साफ़ समझ बना ली थी | हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू
आदि भाषाओँ पर उनकी मज़बूत पकड थी | ‘अकाली’ ‘कीर्ति’ दोनों अखवारों का सम्पादन, कुछ समय बाद स्व. इंद्र विद्यावाचस्पति के अखवार ‘अर्जुन’ और स्व. गणेश शंकर विद्यार्थी के मशहूर अखवार ‘प्रताप’ में सम्वाददाता के अलावा ‘चाँद’ मासिक पत्रिका का जब्तशुदा फांसी अंक भगत सिंह के सम्पादन का बेहतर उदाहरण है | क्रांति दल के लिए पर्चे, पोस्टर या अन्य साहित्यिक सृजन आम तौर पर भगत सिंह ही किया करते थे | यही कारण है कि बेहद संवेदनशील सृजन कर्ता भगत सिंह से समाज का कोई भी बिन्दु उनकी वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली विचार परिधि से अछूता नहीं रहा |
अप्टन सिंक्लियर की तरह जिसने शायद कहीं लिखा था “मनुष्य को बस अमरत्व में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसका सारा धन संपत्ति लूट लो, वह बगैर बडबडाए इस काम में तुम्हारी मदद करेगा” | ऐसे हीं दृष्टिकोण के धनी बचपन से ही नास्तिक प्रकृति वाले भगत सिंह को फूल मालाओं से लादकर देवता बनाकर पूजना भी भगत सिंह को समूल रूप से न जानने का प्रतिरूप ही है क्योंकि किसी भी धर्म या धार्मिक मान्यता से उन्हें उतना ही परहेज था जितना सत्ताधारी ब्रिटिश शासन व्यवस्था से | हालांकि फांसी होने से ठीक पहले उन्होंने अपने एक विस्तृत आलेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ …?” में अपने नास्तिक होने के तमाम अकाट्य तर्क विस्तारपूर्वक लिखे हैं बावजूद इसके भगत सिंह पर चर्चा करते समय यह कहना गलत होगा कि वे बचपन में धार्मिक थे और बाद में आयरिश क्रांति के जनक ‘डेनब्रूनी’ या रूसी क्रांतिकारी विचारक ‘लेनिन’ को पढने के बाद नास्तिक हुए | दरअसल उनमें धार्मिक विमुखता बचपन से ही थी इस बात के बहुत सारे प्रमाण भी हैं | प्रसंगवश लाहौर के डी० ए० वी० कॉलेज का एक वाकया महत्वपूर्ण होगा, कॉलेज के गेट पर एक बूढा सर्दी में कांपते हुए चने बेचता था, भगत सिंह के पूंछने पर उनके एक सहपाठी ने कहा “यह सब इसके कर्मों का फल है” | इतना सुनते ही भगत सिंह आक्रोशित होकर बोले “यह सब बहलावा है .. इस बूढ़े को काम का सहारा सरकार से मिलना चाहिए और यह समाज की जिम्मेदारी भी है | जब तक एक भी इंसान भूखा है हम सब दोषी हैं क्योंकि हम सब खा रहे हैं | और जब तक एक भी इंसान बंधन में है तो समझ लो हम सब भी स्वतंत्र नहीं हैं … और यह सब आँख मूंदकर मोक्ष की प्रार्थना करने से नहीं समझा जा सकता” | इतिहास में भरे पड़े ऐसे अनेक प्रसंगों से यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि भगत सिंह किसी भी तरह की धार्मिकता या जातीयता से मुक्त थे इसी लिए उन्होंने लिखा था कि ‘धर्म व्यक्तिगत विश्वास की चीज़ हो सकती है लेकिन सामूहिक नहीं’ |
तब यह कहना कितना सही मान लिया जाय कि भगत सिंह की यह सोच उनके लिए या तात्कालिक समय के लिए ही जरूरी हो सकती है जबकि उनके बाद के समय से आज तक साम्प्रदायिक दंगों या धार्मिक असहिष्णुता के बीच भगत सिंह का यह वैचारिक पक्ष और भी प्रासंगिक हो जाता है | तब यह बिडम्बना ही है कि सामाजिक, मानवीय चेतना से युक्त ऐसे व्यक्तित्व को ‘भगत सिंह’ या ‘शहीद भगत सिंह’ के बजाय “सरदार” भगत सिंह के रूप में परिचित होने या कराये जाने की राजनैतिक मंशाओं को यदि हम नहीं समझ पा रहे हैं तब क्या वाकई हम भगत सिंह को जानते हैं….?
भगत सिंह आधुनिक तकनीक या विकास के विरोधी भी नहीं दिखाई देते किन्तु वे १३० करोड़ की आबादी में लगभग 75 प्रतिशत गरीबी में जीती आबादी को हासिये पर डालकर किये जाने वाले विकास के पक्षधर नहीं थे जहाँ लगभग ९०००० बच्चे रोजाना भूख या बीमारी से मरते हों, लगभग ६० प्रतिशत बच्चे और महिलायें कुपोषण का शिकार हों, लगभग ३० करोड़ लोगों के पास रहने को घर न हो, कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा पीने के स्वच्छ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, बिजली, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर हो… | इन सामाजिक और आर्थिक असमानताओं एवं साम्राज्यवाद के विपरीत मानवीय समाजवादी व्यवस्था के पक्षधर इंकलाबी भगत सिंह की वास्तविक आज़ादी की परिकल्पना तक पहुँचने और जानने के लिए महज़ 23 मार्च को ही भगत सिंह को याद कर लेना, उनको लेकर चंद बातें सुन या सुनाकर इतिश्री कर लेने से वक़्त की वैचारिक रिक्तता को भरपाना संभव नहीं है बल्कि भगत सिंह के इस कथन कि “अध्ययन की पुकार मेरे मन में गूँज रही है, विरोधियों द्वारा रखे गए तर्कों का सामना करने और अपने मत के समर्थन में तर्क देने के लिए सक्षम होने के लिए पढो” | को वर्तमान की जरूरत मानकर अध्ययन, मनन को अपनी जिम्मेदारी बना लेने की है ताकि न केवल हम बल्कि अगली पीढ़ी भी इंकलाब के साथ गर्व से कह सके कि हाँ हम भगत सिंह को जानते हैं |

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