वक्ती हालातों, ज़ज्बातों और संवेदनाओं को शब्दों के सहारे कविता में पिरोने का सार्थक प्रयास करतीं ‘रूपाली सिन्हा’ की दो कविताएँ …….| – संपादक 

क्रोध का प्रबंधन 

प्रबंधन के इस युग में
सिखाया जा रहा है
क्रोध का प्रबंधन भी
ताकि सहनशक्ति बढ़ सके
संवेदनाएँ हो जाएँ कुंद
और सरोकार को
मारा जा सके बेमौत
अशांति के दूत पढ़ा रहे हैं
शांति का पाठ
उनके क्रूर चेहरे
झाँक-झाँक जाते है
उनके आंसुओं के पीछे से
इतिहास की सुनहरी इबारतों को
मिटाने की हो रही हैं पुरज़ोर कोशिशें
ताकि असहमतियों की आवाज़ों को
स्थानांतरित किया जा सके
चुप्पियों से हमेशा के लिए।
उन्हें नहीं पसंद “उच्छृंखलता” या “उद्दंडता”
उन्हें तो भाती है आज्ञाकारिता
जो इस अपेक्षा पर नहीं उतरेंगे खरे
बाग़ी क़रार दिए जाएँगे
या कुछ और…..
इस भयानक समय में
सिखाया जा रहा है क्रोध का प्रबंधन
ताकि आत्मा का सूरज
खो बैठे अपना ताप
हवा में तनी हुई मुट्ठियाँ
पड़ जाएँ ढीली
आँखों में पल रहा सपना
मर जाये धीरे-धीरे
या लगा ले फंदा अचानक।
आजकल
उनके लिए बहुत ज़रूरी हो गया है
सिखाना क्रोध के प्रबंधन का कौशल।

जब रीत जाते हैं सपने  

जब सपने रीत जाते हैं
ज़िन्दगी हो जाती है ख़ाली
अंदर-बाहर होता है
केवल एक शून्य।
सवाल यह है कि
क्यूँ रीत जाते है सपने
युवा आँखों के यूँ अचानक
या धीरे-धीरे ?
क्यूँ मियाद से पहले ही कोई उम्र
छीज जाती है ?
क्यों सपनों से लदा
एक हरा-भरा पेड़
हो जाता है खोखला
और एक दिन
अपनी चुप्पी का ऐलान कर
खामोश हो जाता है
हमेशा के लिए?
सपनो की उपजाऊ ज़मीन
बंज़र क्यों हो जाती है?
क्यों धरती बहुत छोटी लगने लगती है
और ज़िंदगी सँकरी
बहुत सँकरी
विस्तार की तलाश
मृत्यु के वरण में ही
क्यों पूरी होती है अंततः?
अपनी-अपनी चौहद्दियों में
क़ैद हो जाती हैं विचारधाराएँ
और संवादों के सारे पुल
उड़ा दिए जाते हैं
शत्रुता के डायनामाइट से।
क्यों बंद दिखने लगते हैं
मुक्ति का द्वार दिखाने वाले सारे रास्ते?
और तब ढक लेते हैं वे खुद को
अपने ही सपनो की कफ़न से।
सपनों के खून से लथपथ
एक समूची सभ्यता है
जिससे पूछे जाने हैं
ये तमाम सवाल।

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