कविता से हमेशा ही सौन्दर्य टपके ऐसा नहीं होता बल्कि विचलन भी होता है जब कविताई बिम्ब हमें अपनी सामाजिक, राजनैतिक स्थितियों के विकृत हालातों के रूप में नज़र आते हैं | लेखकीय दृष्टि से गुज़रता अपने समय और समाज का कुहासा अभिव्यक्ति के साथ शब्दों में उतरता है तो निश्चित ही इंसानी अंतस में सवालों की खदबदाहट पैदा करता है | उस कुहासे में आवाज़ की रौशनी पैदा करने का प्रयास करतीं दामिनी यादवकी कविताएँ ……संपादक 

गद्दार कुत्ते damini-yadav

आवारा कुत्ते खतरनाक बड़े होते हैं
पालतू कुत्ते के दांत नहीं होते हैं
दुम होती है,
दुम टांगों के बीच दबी होती है
दरअसल पालतू कुत्ते की
धुरी ही दुम होती है,
वो दुम हिलाते हैं
और उसी हिलती दुम की
रोटी खाते हैं,
आवारा कुत्ते दुम हिलाना नहीं
गुर्राना जानते हैं,
जब उनमें भूख जागती है,
वो भूख अपना हर हक मांगती है
और हर भूख का निवाला
सिर्फ रोटी नहीं होती है,
वो निवाला घर होता है,
खेत होता है, छप्पर होता है,
उस भूख की तृप्ति,
कुचला नहीं, उठा हुआ सर होता है,
इन हकों की आवाज
उन्हें आवारा घोषित करवा देती है
और ये घोषणा उन्हें
ये सबक सिखा देती है
कि मांग के हक नहीं,
भीख मिला करती है
इसीलिए पालतू कुत्तों की दुम
निरंतर हिला करती है,
यही रूप व्यवस्था को भी भाता है,
सो उन्हें हर वक्त चुपड़ा निवाला
बिना नागा मिल जाता है,
व्यवस्था उनसे
तलवे चटवाती है
और बीच-बीच में
उन्हें भी सहलाती है,
आवारा कुत्ते उन्हें डराते हैं,
वो पट्टे भी नहीं बंधवाते हैं,
इसलिए चल रही हैं कोशिशें
कि इन आवारा कुत्तों को
खतरनाक घोषित कर दो
और इनके जिस्म में
गोलियां भर दो,
अपनी सत्ता वो
ऐसे ही बचाएंगे,
चुपड़े निवालों के लालच में
हर उठती आवाज को
पट्टा पहनाएंगे,
हक मांगती हर आवाज का
घोंट देंगे गला
और पालतुओं से सिर्फ
तलवे चटवाएंगे,
सिर्फ पालतू कुत्ते ही
मिसाल होंगे वफादारी की,
आवारा कुत्ते सजा पाएंगे
थोपी हुई गद्दारी की
जमाना इन्हें नहीं अपनाएगा
पर इनके नाम से जरूर थर्राएगा,
हो जाओ सावधान
सत्ता और व्यवस्था के ठेकेदारो
कि जब ये आवारा कुत्ते
अपने जबड़ों से
लार नहीं लहू टपकाएंगे
तब ओ सत्ताधीशो,
वो तुम्हारी सत्ता की
नींव हिला जाएंगे
और इस नींव की
हर ईंट चबा जाएंगे।

अवोर्शन  

चित्र - प्रीतिमा वत्स

चित्र – प्रीतिमा वत्स

अभी तो तुम्हारे आने का
आभास-भर हुआ था
अभी तो मेरी कोख को तुमने
छुआ-भर था
कि सब जान गए,
तुम्हारे वजूद की आहट
पहचान गए,
नहीं, तुम्हारा वजूद
नहीं है कुबूल
लड़कियों का जन्म होता है
सेक्स की भूल,
ये भूल इस परिवार में
कोई नहीं अपनाएगा।
कल मुझे अस्पताल
ले जाया जाएगा
मेरी जाग्रति को
एनेस्थीसिया सुंघाया जाएगा,
मैं भी नहीं करूंगी प्रतिकार
अनसुनी कर दूंगी तुम्हारी
अनसुनी पुकार,
डाक्टर डालेगी मेरी योनि में
लोहे के औज़ार
उन के स्पर्श से तुम
मेरी कोख में
घबरा के सिमट जाओगी।
शायद किसी अनचीन्ही आवाज़ में
मुझे चीत्कार कर बुलाओगी,
पर अपने नन्हे-नरम
हाथ, पांव, गर्दन, सीने को
उन औज़ारों की कांट-छांट से
बचा नहीं पाओगी,
क्योंकि लेने लगे हैं वो आकार,
ओ कन्या!
इस दुनिया में आज भी
तुम नहीं हो स्वीकार।
तुम्हारे वजूद के टुकड़ों को
नालियों में बहा आऊंगी
और इस तरह मैं भी
लड़की जनने के संकट से
छुटकारा पा जाऊंगी,
वरना इस दुनिया में मैं तुम्हें
किस-किस से बचाऊंगी।
अगर बचा सकी अपना ही वजूद,
तभी तो क्रांति लाऊंगी,
मिट जाएगी मेरी पीढ़ी शायद
करते-करते प्रयास,
तब जाकर कहीं मैं इस दुनिया को
तुम्हारे लायक कर पाऊंगी
पर अभी तो ओ बिटिया!
तुम्हें मैं,
जनम नहीं दे पाऊंगी,
जनम नहीं दे पाऊंगी,
जनम नहीं दे पाऊंगी,

मां

मानती हूं कि किसी ने मेरी कोख में
खलबली नहीं मचाई,
ये भी माना कि दूध की नदियां
मेरी छातियों ने नहीं बहाई,
सच है, किसी के रोने से
मेरी नींद नहीं अचकचाई,
मैं सोई हूं सदा सूखे बिछौने पे
किसी ने मेरी चादर नहीं भिगाई,
ये सब भी है कुबुल मुझे कि
मैंने किसी के लिए लोरी नहीं गाई,
किसी के शुरुआती कदमों को
ऊंगली भी नहीं थमाई,
मगर, पूछना चाहती हूं मैं ये सवाल,
क्या यही सब बातें हैं मां होने का प्रमाण?
भला कब नहीं थी मुझमें ममता?
कब नहीं थी मैं मां?
हां, मैं तब भी मां थी,
जब सुलाती-जगाती, दुलारती-लताड़ती
और खिलाती-पिलाती थी अपनी गुडि़या को,
कम भावभीनी नहीं थी मेरे लिए
उसकी शादी और विदाई।
मैं तब भी मां थी,
जब अम्मा की गोद में था मुन्ना,
और अपने से दो बरस छोटी मुन्नी के लिए,
मैंने ही थी मां जैसी गोद जुटाई,
मैं तब भी मां थी,
जब रूठे भाई को,
मैंने लाड़-मुनहार से रोटी खिलाई ,
मैं अपनी मां के लिए भी,
मां बनी हूं तब,
जब बिखरे घर की,
मैंने जिम्मेदारी उठाई।
समेटकर अपनी विधवा मां के
बिखरे वजूद को अपनी बांहों में
मां की ही तरह,
मैंने उसके लिए सुरक्षा की छत जुटाई।
बताओ, कहां नहीं दी
तुमको मुझमें मां दिखाई?
नहीं कहा मैंने कभी कि
मेरे भींचे होठों में सैकड़ों लोरियां
हजारों परी-कथाएं खामोश हैं,
मैंने ये भी नहीं बताया कभी कि
जो दूध मैने छातियों में सूख जाने दिया,
वो आंखों में अब भी छलछलाता है,
मेरी कोख में जो बंजर सूख गया,
वो सिर्फ उम्र का एक गुजरता पल था,
ममता तो बिखर गई है मेरे सारे वजूद में।
आ जाए कोई भी,
किलकारियां मारता या भरता रुलाई,
मुझमें पा जाएगा
मां जैसी ही परछाईं,
फिर भी आप कहते हैं
तो मान लेती हूं,
कि बस मां जैसी हूं,
मैं मां नहीं हूं,
चलो ये क्या कम है,
अगर मेरी कोख किसी को
दुनिया में नहीं लाई
तो किसी जिंदगी की पहली सांस को ही,
सड़क किनारे की झाडि़यों में,
मौत की नींद भी नहीं सुलाई।
नहीं भरा किसी अनाथालय का
एक और पालना मैंने,
ना ही जिंदगी की वो लावारिस सौगात
मंदिर की सीढि़यों पर चढ़ाई।
कोई माने, ना माने,
क्या फर्क पड़ता है मुझे।
मैं जानती हूं कि ममता की खुशबू
किस कदर है
मेरे कुंवारे वजूद में समाई।

  • author's avatar

    By: दामिनी यादव

    जन्म – 24 अक्टूबर 1981, नई दिल्ली
    ‘‘मादा ही नहीं मनुष्य भी’’ स्त्री विमर्श पर आधारित ‘‘समय से परे सरोकार’’ समसामयिक विषयों पर केन्द्रित ‘‘ताल ठोक के’’ कविता संग्रह है। प्रकाशित
    सातवीं कक्षा की पाठ्यपुस्तक ‘वितान’ में भी इनका लेख सम्मिलित ।
    कार्य- ‘हिन्द पाॅकेट बुक्स’, ‘मेरी संगिनी’ तथा डायमंड प्रकाशन की पत्रिका ‘गृहलक्ष्मी’ में क्रमशः सहायक संपादक व वरिष्ठ सहायक संपादक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं।
    कुछ वर्षों तक आकाशवाणी दिल्ली से भी जुड़ी रहीं।
    नवभारत टाइम्स, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता, हिंदुस्तान, आउटलुक, नया ज्ञानोदय, हंस, अलाव और संवदिया आदि समाचार पत्र व पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं।
    डी.डी. नेशनल, जी.सलाम पर प्रसारित कई काव्यपाठ
    स्वतंत्र रूप से लेखन, संपादन व अनुवाद
    09891362926

  • author's avatar

  • author's avatar

    भविष्य की मौत: एवं अन्य कविताएँ (दामिनी यादव)

    See all this author’s posts

Leave a Reply

Your email address will not be published.