वर्तमान में हम भारत को देखें तो ग्रामों के विकास की अवस्था और दुर्दशा स्पष्ट हो जाती है। आज भी कई गांवों में पानी पीने की असुविधा के साथ बिजली, विद्यालय और स्वास्थ्य केन्द्रों का अभाव है। भारत का आज़ादी के बाद असंतुलित विकास और प्रगति हुई है, जिसमें गाँव आज भी केंद्र से छिटककर कहीं दूर हाशिये पर पड़ा नज़र आ रहा है। गाँधी जी ने इसीलिए ग्रामों की स्वायत्ता और अधिकारों की बात कही ताकि वे स्वयं अपना निर्णय लेते हुए अपने विकास की दिशा और दशा तय कर सकें। ‘मोहसिन खान’ का आलेख ……

गाँधी : संकल्प, शक्ति और अर्थवत्ता 

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

हात्मा गाँधी आधुनिक भारत के सबसे अधिक प्रसिद्ध व्यक्तित्त्व ही नहीं, बल्कि वे एक प्रेरणा स्रोत के रूप में पहचाने जाने वाले वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित दार्शनिक भी हैं। हजारों की संख्या में उन पर पुस्तकें केन्द्रित हैं और निरंतर पूरे विश्व में शोध का विषय बने हुए हैं । गांधी जी की विचारधारा को लेकर देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी ऐसा विशिष्ट आकर्षण है कि प्रत्येक वर्ष दुनिया के अलग-अलग कोनों से उनके जीवन और राजनीति को समझने और व्याख्या हेतु पुस्तकों का निरंतर प्रकाशन होता चला जाता है। गाँधी जी  पर केन्द्रित पुस्तकें गाँधी के जीवन, दर्शन और गाँधी के नेतृत्व में हुए राजनीतिक आंदोलनों के इर्द-गिर्द ही रची जाती रही हैं, उनके द्वारा किए गए आंदोलन पर या उनके व्यक्तित्त्व को केंद्र में रखकर जो पुस्तकें उभर कर आई हैं वे सब की सब गाँधी जी के व्यक्तित्त्व, कर्म, प्रयोग और सिद्धांतों की तलाश करती हैं। पिछले वर्षों में गांधी जी पर केन्द्रित फ़िल्मों का फिर से निर्माण हुआ और कई दृश्यों में तो उनकी छवि को तोड़ा-मरोड़ा गया, धुँधला किया गया। विदेशी निर्देशकों के साथ-साथ भारतीय निर्देशकों ने भी उनकी छवि और व्यक्तित्त्व को निरंतर खंगाला है। उन पर कई महत्त्वपूर्ण डाक्यूमेंटरी फ़िल्मों का भी निर्माण समय रहते हुआ। फ़िल्मों के माध्यम से आमजन तक गाँधी विचारधारा को पहुंचाने का जो प्रयत्न हुआ है, वह कितना सकारात्मक या नकारात्मक है, यह बहस का विषय नहीं बल्कि इस बात की यहाँ पड़ताल आवश्यक है कि गाँधी जी ने पास कुछ आकर्षण-शक्ति और मूल्य हैं जो सबको छू रहे हैं और निरंतर लोग उनसे जुड़ते चले जा रहे हैं।

गाँधी जी ने जब देश की वर्तमान दशा को देखते हुए देश की आज़ादी को प्राप्त करने के लिए संकल्प लिया होगा, तो कभी ये न सोचा होगा कि मेरा वर्चस्व देश की राजनीति में बने और क़ायम रहे। वे वास्तव में ऐसा सोच भी नहीं सकते थे, जो व्यक्ति मन, वचन, कर्म से ही उदार हो, जो अहिंसा का पुजारी हो वो भला ऐसी प्रभुता की बात कैसे सोच सकता है। वास्तव में गाँधी जी के पास देश की आज़ादी का सपना था, संकल्प था, प्रयास थे और वे अपने देश के प्रेम को केंद्र में रखते हुए आज़ादी की अलख जगाते रहे। राजनीति का वे एक अंग हैं, लेकिन राजनीति वर्तमान सत्ता हथियाने वाली राजनीति के समान भाव की नहीं थी, बल्कि देश की प्रभुता और अस्तित्व का लंबा संघर्ष था और देश को सम्मान दिलाने का अधिकार था। यदि राजनीति की भूख गाँधी जी में होती तो आज़ाद भारत के कई महत्वपूर्ण पद यूं ही वे ठुकरा नहीं देते और छोटे से गाँव को केंद्र में रखकर पीड़ितों की सेवा के लिए स्वयं को न्योछावर नहीं करते। गाँधी का दूसरा नाम ही सेवा है, वे अपने जीवन में सदैव सेवाभवी बने रहे और निरंतर मानव की सेवा में लगे रहे। उनकी सेवा का भाव मानवकेंद्र से शुरू होता है और व्यापक होते हुए राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आरूढ़ होता है। सेवा के भाव का कुछ अंश वे तुलसीदास से भी ग्रहण करके चलते हैं। कर्म सिद्धान्त को ग्रहण करते हुए स्वावलंबन की आवश्यकता को गाँधी जी ने बहुत शिद्दत से महसूस किया था, स्वावलंबन कर्म के साथ अर्थ की भूमि पर भी आधारित होता है। उनकी स्वावलंबन की परिभाषा में व्यक्ति का स्वयं के प्रति ज़िम्मेदार भाव होने के साथ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और अपना काम स्वयं करने की नीति के तहत देखा जा सकता है।

इसी कारण वे समस्त प्रकार का कार्य वह स्वयं करते हैं और अपने उदाहरण से दर्शाते हैं कि व्यक्ति को अपने कार्यों से परहेज न होनी चाहिए अथवा वे मानते हैं कि एक व्यक्ति को अपने कार्य के लिए दूसरे को गुलाम नहीं बनाना चाहिए, वास्तव में ये उनकी वास्तविक मानव मुक्ति और विकास की सही संकल्पना नज़र आती है। गाँधी जी की दृष्टि में वास्तविक विकास की स्पष्ट रूपरेखा थी, वे मानते हैं कि ग्रामों के विकास के साथ ही भारत का विकास जुड़ा हुआ है, यदि ग्रामों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार न पहुंचा तो भारत का विकास असंतुलित रूप से होगा। इसीलिए ग्रामों की स्वायत्ता के साथ उन्हें अधिकार देने की बात को उठाते हुए उसपर सदैव बल देते रहे और सत्ता के विकेन्द्रीकरण को महत्व देते रहे। स्वतन्त्रता के पश्चात गाँधी जी की बातों को समझने की किसी में सलाहियत शेष न रही, बल्कि राजनीति के नशे और सत्ता की भूख ने आज़ाद भारत के नेताओं को इस हद तक गिरा दिया कि विकास के नाम पर विनाश की लीला रचने लगे। वर्तमान में हम भारत को देखें तो ग्रामों के विकास की अवस्था और दुर्दशा स्पष्ट हो जाती है। आज भी कई गांवों में पानी पीने की असुविधा के साथ बिजली, विद्यालय और स्वास्थ्य केन्द्रों का अभाव है। भारत का आज़ादी के बाद असंतुलित विकास और प्रगति हुई है, जिसमें गाँव आज भी केंद्र से छिटककर कहीं दूर हाशिये पर पड़ा नज़र आ रहा है। गाँधी जी ने इसीलिए ग्रामों की स्वायत्ता और अधिकारों की बात कही ताकि वे स्वयं अपना निर्णय लेते हुए अपने विकास की दिशा और दशा तय कर सकें। उनकी दृष्टि में यही सच्चा लोकतन्त्र है जो विकास के साथ प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों और कर्तव्य के एकसाथ बात करे।

गाँधी जी एक साथ दार्शनिक, आध्यात्मिक, समाज सेवी, आंदोलनकर्ता, स्कॉलर रूप में नज़र आते हैं। जहां वे धर्म और अध्यात्म की बात करते हैं वे सभी धर्मों का आदर करते हुए समस्त धर्मों की अच्छाइयों को ग्रहण करते हुए समन्वय के पथ को महत्व देते हैं। उनके लिए अल्लाह और ईश्वर में कोई अंतर नज़र नहीं आता, इस दृष्टि से वे इस क्षेत्र में अद्वैतवाद के निकट पहुँच जाते हैं। उनकी दृष्टि में सभी धर्म और संप्रदाय समता के स्तर पर विद्यमान हैं और प्रत्येक व्यक्ति किसी भी धर्म का पालन कर सकता है। जाति-पाति में वे विश्वास न करके सबको हरि का ही अवतार मानते हैं और समता के मूल्यों को अपनाते हुए सबके महत्व तथा अस्तित्व को मानते हैं। उनके सामाजिक मूल्य भारतीय परंपरा से मेल खाते हैं और वे अपने जीवन में निरंतर उससे जुड़े रहकर अन्य व्यक्तियों के प्रेरक भी बन जाते हैं।

जीवन में उन्होंने चरित्र निर्माण पर बल दिया और शिक्षा के संस्कार को भी उन्होंने चरित्र से जोड़कर ही देखा। वे शिक्षा का अर्थ कभी भी रोजगार से न लगते हैं वे उसे जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य के रूप में देखते हैं। गाँधी जी एकसाथ इतनी प्रेरणाओं और मूल्यों के केंद्र हैं कि उनकी प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं हो पाएगी, उनकी चेतना से उपजे समस्त कर्म और मूल्यों से जीवन को गति मिलने के साथ व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण विश्व का कल्याण भाव समाहित होता है। वरना विश्व में ये कभी नहीं कहा जाता कि मानवता को बचाने के लिए गाँधी का रास्ता अपनाना होगा। गाँधी जी मौलिक सिद्धांतों के प्रबल पक्षधर और अपनानेवाले अद्भुत व्यक्ति थे, उनका व्यक्तित्व-निर्माण ही इन मूल्यों और सिद्धांतों के कारण होता है, वे सदैव कहते रहे कि सबकुछ आपके आसपास है मैं तो केवल उन्हें ग्रहण कर रहा हूँ, उनकी आस्था उन्हें मार्ग दिखाती है और गाँधी जी मानवता के पथ पर निर्भय होकर आगे बढ़ते हैं।

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