गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये (दो ग़ज़ल: माहीमीत)

महीमीत

गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये

गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये
परिंदो संग हर मस्तियां छोड़ आये
गांव में हम कितनी हस्तियां छोड़ आये

यूं तो इक घर की दहलीज छोड़ी थी हमने
लगता है अब कई बस्तियां छोड़ आये

उलझनों की ये शब अब नहीं बिताई जाती
आम की छांव तले निंदिया छोड़ आये

अब कोई दिल को अच्छा नहीं जंचता है
जब से वादे की एक बिंदिया छोड़ आये

शहर के कुछ समंदर नहीं पार होते
हौसले की जो हम कश्तियां छोड़ आये

हम तलब से रो रो मुस्कुराने लगे 

जब से जां नशीं आजमाने लगे
हम तलब से रो रो मुस्कुराने लगे

शख्स जो चिल्ला रहा अनेक सदियों से
उसकी आवाज सब क्यों दबाने लगे

मुंतज़िर हम है उस राह के अबतलक
सब मुसाफिर जहां से हैं जाने लगे

शोहरत दास्ताँ में तुझे जो मिली
उसको पाने में मुझको ज़माने लगे

जिस मंज़िल को निकले थे सदियों पहले
आज जैसे तैसे मुसाफिर ठिकाने लगे

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