यद्यपि गुस्से को पी जाने का सटीक फार्मूला हमारे संत महात्मा बहुत पहले से बता गए हैं लेकिन अब ऐसा सम्भव नही रह गया है, क्योंकि पीने के लिए अब बहुत सी चीजें उपलब्ध हैं।  गुस्सा पीना पिछडा हुआ और अप्रासंगिक तरीका रह गया है। ब्रजेश कानूनगोका व्यंग्य ……

गुस्से की गूँज 

ब्रजेश कानूनगो

ब्रजेश कानूनगो

पहले कभी ऐसा नही होता था कि आपने जरा सा गुस्सा किया तो पूरी दुनिया को पता चल जाए। देह भाषा से कभी-कभी यह पता लगाना बडा मुश्किल हो जाता था कि हुजूर कुपित भी हैं। नाराजी का नारियल सबके समक्ष नही फोडा जाता था। बडी मुश्किल से सूत्रों से खबर लगती थी कि फलाँ व्यक्ति ने किस कारण से खाना पीना छोड रखा है।

इस मामले में कुछ लोग बडे जानकार हुआ करते हैं,  जैसे मेरे दादाजी अक्सर कहा करते थे कि कोप करना दादीजी कि वह आवश्यक क्रिया थी जिससे उनका भोजन पचा करता था। हमने यह भी देखा था कि जब हमारी माताजी कुपित होतीं थीं तो घर का कामकाज मौनव्रत करते हुए बहुत तत्परता से निपटाने लगती थीं। यही वे छोटे-छोटे संकेत होते थे जिससे विरोधी पक्ष अपनी रणनीति तय कर लिया करता था। गुस्सा करने वाला खुद भी इसे किसी तरह शांत करने के उपाय भी तलाश लिया करता था।

प्राचीन काल में राजा-महाराजा भी बडे दूरदर्शी हुआ करते थे। वे अपने प्रासादों और महलों में सारी भौतिक सुख सुविधाओं के साथ एक कोप भवन भी बनवाया करते थे। रानी के मन के आकाश में  जब नाराजी का सूरज चढने लगता और वे कोप गति को प्राप्त होनें लगतीं वे रनिवास की बजाए तुरंत कोप भवन की ओर प्रस्थान कर जाती थीं। महाराजा को जब अपने सेवकों से ज्ञात होता कि रानी साहिबा कोप भवन पधारीं हैं तो वे पूरी सावधानी और तैयारी के साथ कोप भवन की ओर कूच कर जाया करते थे।

यद्यपि गुस्से को पी जाने का सटीक फार्मूला हमारे संत महात्मा बहुत पहले से बता गए हैं लेकिन अब ऐसा सम्भव नही रह गया है, क्योंकि पीने के लिए अब बहुत सी चीजें उपलब्ध हैं।  गुस्सा पीना पिछडा हुआ और अप्रासंगिक तरीका रह गया है। वैसे भी नाराजी और गुस्से को दबा कर चेहरे पर मुस्कुराहट बनाए रखने का अब पहले जैसा अभ्यास भी नही रह गया है, दूसरी ओर अब किसी के गुस्से को ताड लेने के साधन और नई कलाओं ने भी इन दिनों काफी प्रगति कर ली है। आपका जरा सा गुस्सा भी छुपता नही बल्कि तुरंत सार्वजनिक हो जाता है। किसी माइक्रोफोन के सामने बोले गए चन्द शब्दों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से विशेषज्ञ तुरंत पता लगा लेते हैं कि नाराजी की तीव्रता और उसकी असली वजह क्या है।

यह कहना भी गलत नही होगा कि गुस्से के सहज प्रकटीकरण के साधनों की उपलब्धता के कारण गुस्से की सार्वजनिक प्रस्तुतियाँ होने लगी हैं।  अपने हितों को साधने के लिए कई उदाहरण देखे जा सकते हैं। ऐसे कई सार्थक प्रसंग भी हमारी स्मृति की धरोहर बने हैं। भरी सभा में क्रोध प्रकट करते हुए शीर्ष नेता या प्रमुख को केमेरे के सामने जलील करते हुए बहिर्गमन करके अपना अलग गुट बनाया जा सकता है। जन सभा में कुर्ते की बाँहें चढाकर किसी कागज को चिन्दी-चिन्दी करके भी क्रोध की अभिव्यक्ति की जा सकती है। चलते टीवी साक्षात्कार में केमेरा छीनकर या संवाददाता के सवालों पर लम्बी चुप्पी से भी भीतर का गुस्सा सार्वजनिक हो जाता है। पार्टी या सरकार में महत्वपूर्ण पद की आकांक्षा को मूर्त रूप देने के सन्दर्भ में भी अपनी नाराजी के सार्वजनिक इजहार से अपनी स्थिति को मजबूत बनाया जा सकता है।

यों आम मान्यता है कि गुस्सा करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है लेकिन देश के स्वास्थ्य की खातिर मतदाता गुस्से की मारक मिसाइल के प्रयोग से सत्ता के समीकरण भी बदल दिया करते हैं। ईवीएम के बटन पर मतदाता की उंगली भले ही हल्के से पडती है लेकिन उसके गुस्से के प्रहार की जोरदार आवाज  बरसों तक राजनीति की हवाओं में गूंजती रहती हैं।

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