गोपाल: कहानी (फ़िरोज अख्तर)
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मानवीय चरित्र और उसकी संवेदनशीलता को एक पल के लिए झकझोर देने के साहस के साथ बेहद लघु आकार के बावजूद कितने बड़े और और अनसुलझे सवालों से मुठभेड़ के लिए विवश करती ‘फ़िरोज अख्तर’ की लघुकथा ….. | – संपादक 

गोपाल 

फिरोज अख्तर

फिरोज अख्तर

ए माई, कुछ ना होई तोहरा के…हम जा तानी रोटी लाबे…तू जगले रहिय…बारह साल का गोपाल मां को दिलासा देकर सड़क की ओर दौड़ा। आज वह अपनी उम्र से ज्यादा बड़ा लग रहा था। कलवतिया उसे टुकुर-टुकर देखती रह गई। क्या करती, एक तो दमे का मर्ज, ऊपर से कई दिनों की भूख। उससे तो हिला-डुला भी नहीं जा रहा था।

गोपाल सड़क के उस पार ब्रेड की दुकान पर हाथ फैलाकर गिड़गिड़ा रहा था। माई बीमार है…बाबू जी एक ब्रेड…। फिर आगे की बात जुबान की जगह उसकी आंखों से बहते आंसू बयां करने लगे, लेकिन दुकानदार का दिल नहीं पसीजा। उलटे खीझकर उसे धकिया दिया। गोपाल लड़खड़ाकर ब्रेड के पैकेट पर गिर पड़ा। फिर अचानक ब्रेड झपट कर तेजी से भागा। यह उसकी पहली चोरी थी। वह भी परिस्थितिवश, क्योंकि उसकी मां भले ही भीख मांगती थी, लेकिन कभी उससे भीख न मंगवाया। रहती तो पुल के नीचे झुग्गी में थी, मगर ख्वाब बहुत ऊंचे थे। सरकारी स्कूल में उसका नाम भी लिखवा रखा था। बेटे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहती थी, मगर…।

google से साभार

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भागते गोपाल को देखकर दुकानदार ने चोर-चोर का हल्ला किया। छोटा बच्चा था अभी ज्यादा दूर भाग नहीं पाया था कि लोगों ने पकड़ कर उसे बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। एक ने तो इतनी जोर से लात मारी कि दूर सड़क पर जा गिरा। अचानक वह एक तेज रफ्तार ट्रक के नीचे आ गया और मांस और हड्डी सब सड़क से चिपक गए।

फिर मौत का मंजर देखने वालों की भीड़ उमड़ी। जितने मुंह उतनी बातें…।

सहसा दूर से एक शोर सुनाई पड़ी। मुझे लगा शायद गोपाल की मौत पर प्रतिकार होगा। लोग सड़क जाम करेंगे। उसकी मां को इंसाफ दिलाएंगे। भीड़ जब नजदीक आई तो देखा कि ये लोग माखनचोर-नंदकिशोर… माखनचोर-नंदकिशोर के नारे लगा रहे थे। पीछे ठेले पर मुस्कराते कृष्ण कन्हैया की मूर्ति विराजमान थी। भक्तजन एक बच्चे की मौत से बेखबर नाच रहे थे, गा रहे थे। मैंने मन ही मन अपने आप से सवाल किया। एक ने चोरी की तो युगों-युगों तक उनका यशगान? और एक बीमार मां के लिए रोटी लेकर भागा, तो यह हस्र? भगवान तेरी लीला तो अपरमपार है ही, तेरे भक्तजन की लीला भी अपरमपार है। फिर मैंने मूर्ति की तरफ से मुंह फेर लिया। तभी देखा पुल के पास कोई साया लहराकर जमीन पर औंधे मुंह गिरा। यह गोपाल की मां थी। हां, गोपाल की मां ही थी। बेटे ने जागते रहने के लिए कहा था और वह सो गई। हमेशा हमेशा के लिए।

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    By: फ़िरोज़ अख्तर

    सीतामढ़ी जिले के सुरसंड में जन्म। प्राथमिक से कॉलेज तक की पढ़ाई वहीं से। छात्र जीवन से रंगकर्म से जुड़ाव। करगिल शहीदों पर लिखे नाटक ‘श्रद्धांजलि’ और उसके निर्देशन से मिथिलांचन क्षेत्र में पहचान। वर्तिका, चेतांशी सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां और गजल प्रकाशित। जीविका के लिए एक दशक तक पेंटिंग से जुड़ाव। अब हुनर को जिंदा रखने के लिए चित्रकारी। एनओयू से पत्रकारिता में स्नात्कोत्तर करने के बाद 2007 से प्रिंट मीडिया में। अभी हिन्दुस्तान पटना में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत।
    संपर्क : हरिहर सिंह निवास, राजेंद्र नगर पटना
    मोबाइल-9771203592, [email protected]

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One Response

  1. हनीफ मदार

    भीड़ जब नजदीक आई तो देखा कि ये लोग माखनचोर-नंदकिशोर… माखनचोर-नंदकिशोर के नारे लगा रहे थे। पीछे ठेले पर मुस्कराते कृष्ण कन्हैया की मूर्ति विराजमान थी। भक्तजन एक बच्चे की मौत से बेखबर नाच रहे थे, गा रहे थे। मैंने मन ही मन अपने आप से सवाल किया। एक ने चोरी की तो युगों-युगों तक उनका यशगान? और एक बीमार मां के लिए रोटी लेकर भागा, तो यह हस्र? भगवान तेरी लीला तो अपरमपार है ही, तेरे भक्तजन की लीला भी अपरमपार है।
    वाह …….

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