ग्लोबल युग का क्रिकेटीय राष्ट्रवाद 

मज्कूर आलम

मज्कूर आलम

हम देशवासियों की तमाम शुभकामनाओं के बावजूद भी भारत टी-20 विश्वकप से बाहर हो गया । हालांकि क्वार्टर फाइनल बन गए आस्ट्रेलिया के साथ हुए कठिन मुकाबले में उसे हरा कर देशवासियों को भारतीय टीम ने जीत का सुखद मौका दिया था। इस जीत के बाद इस मैच के ‘अर्जुन’ विराट कोहली ने अपने और अनुष्का शर्मा के रिश्ते को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में चल रही अश्लील टिप्पणियों पर जिस तरह से करारा जवाब दिया था, वह साबित करता है कि देशभक्ति का जज्बा दिखाने में हम कितने हिंसक हो जाते हैं। हर लिमिट को पार कर जाते हैं।
सोशल मीडिया में वायरल ये सारी टिप्पणियां टीवी-अखबारों में भी ‘सोशल मीडिया के कॉलम’ में लगभग बिना सेंसर के दिखाई गईं और ये टिप्पणियां बड़े चाव से खूब देखी-पढ़ी भी गईं, जिसके रचयिता भी हम ही थे- इसी देश-दुनिया वाले। खालिश वैचारिक नंगई का प्रदर्शन करते हुए देशभक्ति के नये-नये नारे, जुमले और मुहावरे गढ़ रहे थे।
एक अप्रैल को इसे लिखते हुए हम सोच सकते हैं कि इस दिन तो वैसे भी हल्के-फुल्के मजाक का हक सबको बनता है। अभी-अभी होली बीती है, थोड़ा असर उसका भी है। मिजाज अब भी होलियाना है यार। चलिए अगर ऐसा है तो इसे क्षम्य माना जा सकता है, हालांकि इसके बाद भी रिश्ते को लेकर अभद्रता की हद तक जाने को किस तरह जायज ठहराया जा सकता है ? वह भी तब, जब अभी हाल ही में बीते 8 मार्च को हमने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिला सशक्तीकरण और महिला सम्मान की खूब बातें की हैं। एक अप्रैल से लागू होने वाले आम बजट में भी इसके लिए प्रावधान रखा गया और दिल्ली सरकार समेत लगभग हर राज्य सरकार ने अपने बजट में इसका बजट अलग से रखा है। मगर हम तो हम ही हैं…
लगता है कि कुछ मॉडल्स की चर्चा के बिना ये बात अधूरी रहेगी। चलिए उन्हें भी देख लेते हैं- पाकिस्तानी मॉडल कंदील बलोच, भारतीय मॉडल पूनम पांडेय, अर्शी खान आदि। अपनी-अपनी टीम की जीत और फेवरिट खिलाड़ियों के प्रदर्शन के साथ इनका वैचारिक दिवालियापन भी सामने आ रहा था | एक ने तो यहां तक कह डाला कि अगर टीम इंडिया टी-20 विश्वकप 2016 नहीं जीतती तो वे बीच सड़क पर धोनी और विराट का रेप करवा देंगी। ये क्या है ! ये है इनकी ताकत। लंपट राष्टवाद दिखाने का जज्बा!
ये एक होड़ है। जी हां, ये होड़ ही है- ज्यादा देशभक्त दिखने की होड़। हर किसी को यह साबित करना है कि उससे ज्यादा देशभक्त उसके देश में और कोई नहीं। इस होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। किसी से पीछे नहीं। इसी तरह की होड़ पूरी दुनिया में मची है। इस होड़ में दुनिया भर ‘की-के’ मॉडल शामिल हैं (मॉडल का अर्थ हिन्दी में नमूना होता है, इसलिए सिर्फ मॉडलिंग वाली मॉडल न समझा जाए, इसमें ‘का एंड की’ दोनों शामिल हैं)।
अगर देखा जाए तो मॉडल्स की नंगई और राष्ट्रवाद के नाम पर दिखाई जाने वाली वैचारिक नंगई में कोई ज्यादा का फर्क नहीं है। दोनों की अदाएं कातिलाना होती हैं। इतनी कातिलाना की कोई भी उग्र हो जाए- बेहद उग्र। उग्रता उत्तेजना लेकर आती हैं और उत्तेजना तनाव पैदा करती है और इस तनाव में जो भी हो जाए, वह कम ही है।
ये तो हुई इस टी-20 विश्वकप की बानगी, लेकिन ये सिर्फ इसी ‘एक अप्रैल’ यानी फूल्स-डे का मामला नहीं है। ऐसा हमेशा से होता आया है। खेल में राष्ट्रभक्ति दिखाने के लिए पहले भी मॉडल्स कपड़े उतारती रहीं हैं। ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों नाम मिल जाएंगे। कितने नाम लिखूं ! सीधे राष्ट्रवाद के नाम पर दिखाई जाने वाली वैचारिक अपंगता पर आते हैं। ऐसे उत्तेजित करने वाले खेल प्रशंसकों में खेल भावना का पूरी तरह अभाव होता है, जैसा नारे और जुमलों में राष्ट्रभक्ति दिखाने वालों में होता है। इसे अतीत के कुछ उदाहरणों से हम समझते हैं। हम जीत पर खिलाड़ियों को तुरत सिर पर बिठा लेते हैं तो हार पर पैरों तले रौंदने से भी बाज नहीं आते। हम हर दिन इसी मूड में रहते हैं और हमारे पड़ोसी देश भी इस मामले में कम नहीं हैं। बांग्लादेश में एशिया कप के दौरान तो किसी सिरफिरे प्रशंसक ने धोनी का कटा सिर मशरफे मुर्तजा के हाथ में पकड़ा कर सोशल साइट पर डाल दिया तो पाकिस्तान में विराट कोहली का एक प्रशंसक अब भी जेल में पड़ा है। थोड़ा और आगे बढ़ें तो यह समस्या वैश्विक नजर आती है। कोलम्बिया की फुटबॉल टीम के कप्तान आंद्रेस एस्कोबार को 1994 के फुटबॉल विश्वकप के बाद उनके ही देश में एक सिरफिरे फुटबॉल प्रशंसक ने सिर्फ इसलिए गोली मार दी, क्योंकि उनके एक आत्मघाती गोल की वजह से उनका देश विश्वकप के ग्रुप चरण से ही बाहर हो गया और इस ‘कृत्य’ की वजह से देश का सिर शर्म से नीचा हो गया। विश्व की महानतम टेनिस खिलाड़ियों में शुमार की जाने वाली जर्मन खिलाड़ी स्टेफी ग्राफ के एक हमवतन प्रशंसक ने तत्कालीन यूगोस्लावियाई टेनिस खिलाड़ी मोनिका सेलेस को सिर्फ इसलिए चाकू मार दिया, क्योंकि दो-तीन ग्रैंड स्लैम में स्टेफी ग्राफ उनसे हार गई थीं। इसका नतीजा यह हुआ कि मोनिका सेलेस इतनी बुरी तरह घायल हो गईं कि वह लगभग दो-तीन सालों तक टेनिस कोर्ट में नहीं उतरीं और जब वह वापस आईं तो अपने खेल को उस ऊंचाई पर कभी नहीं पहुंचा पाईं, जिस पायदान पर वे घायल होने से पहले थीं।
किसी भी खेल पर अगर आप निगाह डालेंगे तो खेल भावना की जगह इस तरह के उग्र राष्ट्रभक्ति का इतिहास आपको मिल जाएगा। इंग्लैंड के राष्ट्रभक्त फुटबॉल दर्शकों को तो इतना हुड़दंगी माना जाता है कि कई देशों ने उन्हें चिह्नित कर अपने देश में मैच देखने के लिए आने से बैन कर रखा है। ये तमाम राष्ट्रभक्त प्रशंसक खिलाड़ियों की हत्या, उन पर पथराव, आगजनी और उनके घरों में तोड़-फोड़ मचाने से भी बाज नहीं आते। इतना ही नहीं ये आत्मघाती प्रवृति इनमें इतनी प्रबल होती है कि आप अक्सरहां सुनते रहते हैं कि फलां देश के हार जाने से उस देश के ढिकां प्रशंसक ने आत्महत्या कर ली। ये आत्महत्याएं कई बार बहुत ज्यादा भी होती हैं।
सच में ये आत्मघाती लंपट प्रवृतियां ही हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। इस बात को ब्रिटिश लेखक सैमुअल जॉन्सन अट्ठारहवीं सदी में ही समझ गए थे, तभी तो 1775 में ही उन्होंने यह कहा था, ‘देशभक्ति लफंगों की अंतिम पनाहगाह होती है।’ यह पंक्ति वर्तमान में अक्षरश: सच होती नजर आ रही है।
दूसरे शब्दों में कहें तो खेल के दौरान खिलाड़ियों के किये गये प्रदर्शन का मूल्यांकन खेल भावना से नहीं, बल्कि उग्र राष्ट्रवाद की भावना से किया जाता है, जो कुछ-कुछ जर्मन तानाशाह हिटलर के राष्ट्रवाद जैसा होता है। इसका वैसे ही कोई सिर-पैर नहीं होता, जिस तरह अभी राष्ट्रवाद के नाम पर पूरे विश्व में चल रहे तांडव का नहीं है।
इसको इस तरह भी देख सकते हैं कि जब देश के सामाजिक, आर्थिक बदलाव या देश के विकास की बात होती है तो ‘देशभक्त’ उसे उग्र राष्ट्रवाद के नारे या जुमले में बदल कर जमीनी हकीकत को उसके भीतर दफन कर देते हैं और अपने-अपने गुणा-गणित के आधार पर विवेचना करने लगते हैं। संवैधानिक पदों के मुखियाओं को भगवान या भगवान का तोहफा भी करार देने से नहीं चूकते और अपना नफा-नुकसान देख कर चुप्पी साधने तक में कोई कोताही नहीं बरतते। बाई द वे अगर विरोध में जोरदार प्रतिक्रिया हो गई और लगा कि बचने का कोई रास्ता नहीं है तो तुरत उसे एक अप्रैल वाला मजाक करार दे देने से भी नहीं चूकते, चाहे वह साल का कोई-सा दिन हो।
अगर वर्तमान में देश-दुनिया में चल रहे मुद्दों पर नजर डालेंगे तो निश्चित रूप से आप भी कहेंगे हां यार ठीक कह रहे हो हर दिन ‘एक अप्रैल’ है।

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