गज़ल: सत्येन्द्र कुमार “सादिल”

सतेन्द्र कुमार “सादिल”

गज़ल 

कुछ भी नहीं, मैं माँ के चरागों का ख़्वाब हूँ
एक दास्तां, कहानी, एक खुली किताब हूँ

ख़ुशबू लुटाने की मैं, ख्वाईश लिए हुए
काँटों की परवरिश में, खिलता गुलाब हूँ

अब तक बुझा नहीं जो, हवाओं के ज़ुल्म से
दुश्मन हूँ अंधेरों का, मैं नन्हा चराग हूँ

क्यों हूँ खफ़ा ज़माने से, हैं लोग पूँछते
लाखों सवाल का मैं, अकेला ज़बाब हूँ

हैरान हूँ मैं देख के, हालत ये मुल्क़ की
बदलाव की सीने में, सुलगती मैं आग हूँ

जो जाति या मज़हब को, सियासत में धकेले
हर ऐसे शख्स के मैं, हमेशा खिलाफ हूँ

जो चढ़ के उतर जाये, हूँ मैं वो नशा नहीं
आँखों में आँखें डाल के, करता हिसाब हूँ

लम्हें ये ज़िन्दगी के, अदब में हैं मदद में
मैं दरमयां दिलों के, मोहब्बत का राग हूँ

अब और न सहना पड़े, ये ज़ुल्म दोस्तों
आओ मिलाओ हाँथ, मैं एक इंकलाब हूँ

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