इंसानी जीवन में घर की महत्ता को पुरुष सत्ता ने शायद सबसे पहले भांप लिया था…… क्या इसी लिए समाज में स्त्री का कोई घर नहीं होता ताकि इसी असुरक्षा बोध में वह शोषित होने को विवश होती रहे …..| तब निश्चित ही आर्थिक समानता ही स्वतंत्र वजूद की पहली सीढ़ी है ….. स्त्री संदर्भ में इन्हीं सवालों पर रचनात्मक विमर्श करती ‘डा0 नमिता सिंह’ की कहानी ….| – संपादक 

डा0 नमिता सिंह

        डा0 नमिता सिंह

                               “मेरे खुदा मुझे इतना मोतबर कर दे , 

मैं जिस मकान में रहता हूँ उसे घर कर दे | (संकलन से)

घर

मेरी समझ में नहीं आता, हिन्दुस्तानी आदमी इतना हिंसक क्यों होता है ?
सामने की खाली कुर्सी को घूरते हुए विभा ने फिर यही वाक्य दुहराया जो अभी वह दो मिनट पहले कह चुकी थी।
रिपोर्ट लिखते-लिखते वह रुक गयी जैसे कुछ सोच रही हो। शायद सामने पड़ी उस खाली कुर्सी से सवाल कर रही थी जिस पर अभी थोड़ी देर पहले रेशमी बैठी बिलख रही थी। आज मुझे बिल्कुल ज़रूरत नहीं थी कि मैं विभा से पूछूँ कि क्या उसके भाई ने फिर क्या कोई हंगामा खड़ा किया। जब से विभा ने हमारी संस्था में काम करना शुरू किया है, उसका भाई थोड़ा दबने लगा है। जो भी हो वह कमा रही है। इसके बावजूद वह गाहे-बगाहे झगड़ा करने से बाज़ नहीं आता। वह समझता है कि यहाँ दफ्तर में मौज मस्ती होती है और उसकी बहन न जाने कहां जाती है-क्या करती है।
मैंने सोच में डूबी विभा के सामने रखी फाइल अपनी ओर खिसका ली।
– लाओ, आज की रिपोर्ट मैं तैयार कर लेती हूँ…..’’
मुझे मालूम है अभी समय लगेगा विभा को यहाँ का माहौल समझने में और अभ्यस्त होने में। हर केस के बाद हम अवसाद् का शिकार होने लगे तो हो गया फिर काम। हमारी स्थिति तो उस डाक्टर के समान है जो मरीजों को निर्विकार भाव से देखता है, मरीज की दशा-दुर्दशा से विचलित नहीं होता। लेकिन अच्छा डॉक्टर भी वही होता है जो संवेदनशील होता है। मरीज को पूरी आत्मीयता के साथ बरतता है। मरीज के रोग का आधा इलाज तो डाक्टर की संवेदना और सहानुभूति के जरिये हो जाता है। दो महीने पहले जॉइन किया है विभा ने हमारी संस्था को! इसे अन्दाज भी नहीं रहा होगा कि यहाँ किस तरह का काम होता है। किस तरह से किया जाना होता है। शुरू में इसका बिल्कुल दिल नहीं लगता था। माथे पर बल पड़े रहते थे।
– क्या दस से पाँच तक की ड्यूटी करो… सिर्फ पाँच हजार रुपल्ली में…। सारा दिन सर मारते फिरो इन जाहिलों से।
मैं चुप रहती । कुछ बोलने की या जवाब देने की ज़रूरत ही नहीं थी।…. सिर्फ़ पाँच हजार रुपल्ली….’’ तो न आतीं। किसने जबरदस्ती की थी ! मुझे मालूम विभा के घर का हाल। तीस साल से ऊपर उम्र हो गयी है उसकी ! माँ बाप हैं नहीं ! भाई-भाभी के साथ रहना ! मुहल्ले वाला मध्यवर्गीय परिवार। भाई किसी प्राइवेट फर्म में क्लर्क। अपने परिवार को ही ठीक से पाल लें…. उनके पास क्या धरा था कि लंबा चौड़ा दहेज़ देकर शादी करते विभा की…। खुद विभा ! ग्रेट घुस्सू। इतनी हिम्मत नहीं कि बाहर निकल कर अपने लिये नयी दुनियाँ खोजती। नया रास्ता बनाती ! नौकरी करना उसकी मजबूरी भी है !
मैं चुप रहती हूँ ऐसे मौके पर।
विभा से पहले मिसेज़ शाह थी यहाँ काउन्सिलर। उनके पति का तबादला हो गया तो वह चली गयीं। एक आदमी से यह काउन्सिलिंग सेन्टर नहीं संभलता। कभी-कभी तो बहुत काम बढ़ जाता है। एक साथ दो-तीन केस आ जायें तो निरी भीड़ जुट जाती है।
हमारी महिला मंडल की अध्यक्ष ने मुझसे कहा कि अगर कोई मेरी जान पहचान में महिला हो तो मैं उसे यहाँ ले आऊँ…। अखबार में विज्ञापित करो… ढेर सारी औपचारिकताएँ पूरी करो। बहुत समय लग जाता है… और यहाँ का काम तो ऐसा है कि चार लोग हों तो वह भी कम। कभी-कभी एक साथ दो-तीन केस आ जाते हैं तो संभालना मुश्किल होता है। दोनों पक्षों के पूरे-पूरे परिवार आ धमकेंगे अपनी-अपनी ताकत दिखाने के लिये। कभी आपस में मारपीट की नौबत आने लगती है।
बहुत सोचा…. तो विभा का चेहरा जे़हन में उभरा। अकेली है। खाली बैठी है घर पर। मनोविज्ञान में ही एम0ए0 है। कुछ अन्य डिप्लोमा भी कर रखे हैं।
शुरूआती ना-नुकुर के बाद वह तैयार हो गयी।
मुझे मालूम है कि अपने विक्षोभ के क्षणों में विभा मुझे कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करती है। जैसे इस जगह पर उसे जबरदस्ती बिठाने की मैं अपराधी हूँ।
मैं चुप रहती हूँ। मुझे तरस आता है विभा पर। उसकी मजबूरी पर।
कभी-कभी हम वास्तव में क्या चाहते हैं-खुद समझ नहीं पाते। अनचाही परिस्थितियों को नकारते-नकारते हम खुद को ही नकारने लगते हैं। जिस हवा से हमारी साँसें बंधी हैं उसे ही तोड़ने की बात करने लगते हैं।…..
आज पहली बार परामर्श केन्द्र में किसी केस में दिलचस्पी लेते हुए विभा को मैंने देखा।
शुभ लक्षण है ! कम से कम विभा के लिये तो जरूर है।
मैंने बहुत पहले एक बार उससे कहा था-‘‘तुम हमारे यहाँ आकर देखो। तरह-तरह की औरतों के कैसे-कैसे केस आते हैं। उनकी दुख-तकलीफे़ देखोगी तो तुम्हें लगेगा तुम उनसे कितनी बेहतर हो…… तुम्हारे पास एक घर तो है……. एक छत तो है तुम्हारे सर के ऊपर…..।
– हुंह ! खाक डालो घर की इस छत पर ! सड़क का आसमान इस से भला ! सारा दिन घर में खटते रहिये…. ऊपर से सबकी जली कटी सुनो….’’ और उसने मुँह फेर लिया था !
मुझे हंसी आई विभा की बात पर। क्या करेगी सारा दिन बैठे-बैठे ! खासी पढ़ी लिखी लेकिन व्यर्थ करती रही है अपने को। ऊपर से उसके भाई साहब का तुर्रा यह कि हम नौकरी नहीं कराते…. लोग क्या कहेंगे। एक बहन है उसे खिला भी नहीं सकते….?
और बहन है कि शादी के इंतजार में राह तकते तकते बुढ़ा रही है… भस्म हो रही है…वृथा जनम हमारो…..।
बहुत मुश्किल से उसके भाई तैयार हुए विभा को परामर्श केन्द्र में भेजने के लिये..। अभी भी बीच-बीच में छापामार तरीके से आ जाते हैं देखने के लिये कि बहन सुरक्षित तो है! कोई व्यभिचार तो नहीं कर रही। मैं उन्हें आश्वस्त करके भेजती हूँ….।
– भाई साहब ! आप चिन्ता न करें ! मेरे साथ है न !
– हाँ, मैडम ! क्या करें…. आजकल ज़माना बहुत खराब है। कुछ ऊँच नीच हो गया तो लोग क्या कहेंगे….’’ भाई साहब अपना स्कूटर बार-बार टेढ़ा करते हुए स्टार्ट करने की कोशिश करते
कह रहे थे।

– कितना ज़माना बदल गया है। अब औरतें निकल कर आती तो हैं अपनी बात कहने के लिये….’’ सोच में डूबी विभा फुसफुसाई और उसने फाइल मेरी ओर बढ़ा दी।

रेशमी की पड़ोसन दूर के रिश्ते से उसकी बहन लगती थी। वही लेकर आई अधमरी रेशमी को लेकर। हमारे आॅफिस में। रेशमी का होंठ कटा था और खून जम गया था उस पर ! आँख के नीचे नील पड़ी हुई थी।
– मैडम, पिछले बरस भी इसके आदमी ने इसे इतना पीटा था कि इसका गरभ गिर गया था…. मरते-मरते बची थी यह’’.. उसकी बहन बयान लिखा रही थी…. महीना भर अस्पताल में रही थी। और देखो… इस बार फिर….’’
– ‘‘अरेऽऽऽ !’’ मैं घबड़ा गई थी ‘‘क्या फिर से कुछ है ?
– हाँ मैडम ! दिन चढ़े हैं इसे। दो महीने हो गये….। बहुत जालिम है कमबखत… पहले बीज डाले है फिर पीटे है…. जिनगी खराब है औरत की तो….
– ‘‘छोड़ क्यों नहीं देती उसे….. क्या धरा है वहाँ जो चिपकी हुई है’’…. विभा बोली। हाँफती-काँपती सी रेशमी लुटी पिटी बैठी थी सामने ! विभा की ओर आँख उठाकर देखा उसने फिर अपनी गुसमुसैली चुन्नी को सिर पर जमाते हुए आँखें नीची कर लीं। हल्की सी कराह के साथ उसने पहलू बदला मानो अपने को कुर्सी पर जमा रही हो।
– ‘‘कहाँ जायेगी ! है कोई इसका….’’ तरस खाती नजरों से देखा उस बहन ने बगल में बैठी रेशमी की ओर ! ‘‘एक भाई है फरीदाबाद में। फैक्टरी में काम करता है…. वो ना ले जावैगा…. पिछले साल आया था। मैंने कहा कि काहे इन कसाइयों के बीच छोड़ दिया है अपनी बहन को। दिन भर सास सर पे सवार रहे… शाम को दारू पीकर मियाँ कूटै…. बोला मैं कहाँ ले जाऊँ इसे। मेरे काम का क्या ठिकाना। आज यहाँ तो कल वहाँ। फिर इकली होती तो एक बात थी। तला ऊपर के तीन बच्चे….’’
ये क्या कम उपकार था कि रेशमी की पड़ोसन उसके साथ यहाँ तक आ गयी। केस दर्ज करा गयी। यह अलग बात थी कि रेशमी के घर का हाल वह जितना बता रही थी उससे ज्यादा उसकी दिलचस्पी अपने बारे में बताने की थी। विभा ने एक बार उसे टोका भी था लेकिन मैंने उसका हाथ दबाकर इशारा किया कि बोलने दो उसे। दरअसल रेशमी तो इस हालत में थी नहीं कि कुछ कह पाती। या तो बेहद डरी हुई थी कि कहीं उसके घरवालों को पता न चल जाय कि वह यहाँ अपना केस दर्ज कराने आई है। या फिर वह अपनी रोज-रोज होने वाली पिटाई से ऐसी कुन्द हो गयी कि उसका दिमाग ही काम नहीं कर रहा था। हमें भी उलझन थी कि सही बात तो पता चले। इसीलिये जो उसकी पड़ोसिन बता रही थी हम रेशमी के मुँह से उसकी ताईद कराना चाहते थे। पुलिस तक केस ले गये तो सच्चाई मालूम होना जरूरी है।

रजिस्टर्ड खत रेशमी के घर डाल कर उसकी सास और पति को आॅफिस बुलवाया गया था।
नियत दिन पता चला कि सास चली आ रही है चार लोगों के साथ। आफिस में वे इस तरह घुसे जैसे कहीं धावा बोलने आये हों…. आक्रामकता अपनी सुरक्षा का बेहतरीन हथियार होती है… इसे कम से कम साधारण आदमी बहुत अच्छी तरह जानता है।
उसकी सास हट्टी-कट्टी औरत। धूप और मेहनत से पका सख्त चेहरा।
– तुम कौन हो……
– सास हूँ जी मैं रेशमी की…. कहाँ भगा दयी तुमन्ने हमारी रेशमी…’’ उसने आते ही हम पर हावी होना चाहा।
– क्या बकती हो….हम भगायेंगे उसे ? क्या हालत कर दी है तुमने उसकी । और, ये कौन है ! आदमी है उसका ?
– जेठ है जी यह रेशमी का, मेरा बड़ा लड़का….
जेठ नाम का जीव एक नंबर का शातिर लग रहा था। बाज जैसी आँखें…. अपना शिकार ढूँढ़ती हुई।
– इसका परिवार कहाँ है…. साथ रहता है या अलग….
– साथ रहैगा….। वर्ना काम को करैगा….
– इसकी बीबी से पटती है तुम्हारी ? या दोनों बहुओं को एक जैसा बरतती हो….
– अरे इसकी लुगाई तो दो साल पहले भाग गयी अपने पीहर। अपने पिल्ले छोड़ गयी हमारे मत्थे….।’’ सास की मुंह टेढ़ा हो गया।
– ‘‘ये बाकी दो कौन हैं !’’ दो बन्दे चाक चौबन्द खड़े थे दायें-बायें।
– ‘‘हमारे रिश्तेदार हैं जी’’
– ये क्यों आये हैं ? पैरोकार हैं क्या तुम्हारे ? बाहर भेजो इन्हें….।’’ मैंने जोर से डपटा उसे।
– ‘‘का कर रये ये। बैठे तो हैं….। आये हैं हमारे साथ ।’’
– नहीं । मियाँ बीबी के घरेलू मामले में किसी और का दखल नहीं… बाहर जाओ जी आप लोग… कमरा खाली करो।
– ‘‘जाओ जी जाओ ! ना बैठने देंगी ये… ऐसा तो थानेदार भी ना करें।’’ रेशमी की सास जल कर बोली। पुलिस केस का डर न होता तो वह कब की हमारे ऊपर फैल चुकी होती। उसके दोनों आदमी अभी भी खड़े थे कि शायद कोई गुंजाइश हो उनके बैठने की। आखिर रेशमी की सास की सेना में सिपाही बनकर आये थे। ऐसे कैसे चले जाते।
– देखिये । आप अगर बाहर नहीं जायेंगे तो हम कोई बात नहीं करेंगे और सीधे थाने में केस दे देंगे….।
सास बड़बड़ाती रही। उन दोनों को बाहर जाना पड़ा।
– ये बताओ । रेशमी का आदमी क्यों नहीं आया। हमने तो उसे बुलाया था।
– वो माल लाने बाहर गया है।
– कैसा माल ! क्या काम करता है वह ।
– घर का काम है जी ! ताले बनते हैं ठेके पर…
– कौन बनाता है
– हम सब बनाते हैं। घर पर ही काम हौवे। सभी को लगना पड़ै। बच्चे भी लग जावैं.
– रेशमी ?
– रेशमी भी करै। काहे ना करैगी !
– रेशमी को उसका आदमी क्यों पीटता है ?
– अरे, आदमी की जात ! कभी हाथ उठा दिया तो… ऐसे कोई शिकायत करेगा! मियाँ बीबी में होता ही रहवै।
– होता रहबै ? क्या जान ले लोगे उसकी ? फांसी हो जायेगी तुम सब को अगर वह मर गयी तो….
सास अबतक काफी नीचे आ चुकी थी।
– क्यों पीटता है उसका आदमी। सुना है तुम भी मारपीट करती हो…
– कोऊ न पीटेे। अरे बहू है हमारी। हमारा परिवार है…. काहे पीटेंगे हम उसे।
– क्यों ! वह तो कह रही थी कि जेठ तंग करता है उसे ! और तुम भी हाथ उठाती हो उसके ऊपर !
– अरे नांय ! बकती है…. कोऊ ना हाथ उठावै !
– अब कहां है रेशमी ! घर पर है ?….
– भाग गयी ! जाने कहाँ चली गयी… बेशरम है… वह! ऐसे ही लच्छन रहे उसके….।

रेशमी के आदमी को तुरन्त आफिस में भेजने की बात तो कह दी हमने उनसे लेकिन हम चकरा गये। रेशमी आखिर गयी कहाँ। ऐसा तो उसने कुछ नहीं कहा था हमसे।
हमारे यहाँ केस के सिलसिले में होम विजिट का प्रावधान है। पहले हम रेशमी के घर गये तो वही खडूस सास मौजूद थी। आंगन के साथ लगा बरामदा। उसके कोने में प्रेस मशीन लगी थी। पास ही अधबने तालों का ढेर था। सास के साथ तीन चार बच्चे। रेशमी नहीं थी। हमने रेशमी के सिलसिले में पूछा। सास मुंह सिले बैठी रही।
– मोय न पतौ ! भाग गयी….। तुम्हें बता गई होगी।
उसकी पड़ोसिन बहन जरूर कुछ बता सकेगी, हमने सोचा। रेशमी वहाँ तो हो नहीं सकती यह हम जानते थे। वह कह चुकी थी कि उसका आदमी यह सब चक्करबाजी पसन्द नहीं करता। उसने तब कहा था, ‘‘मैडम, आज तो मैं इसे ले आई हूँ लेकिन मेरा आदमी… उसे पता चलेगा तो नाराज होयगा। मैडम, अब पड़ोस के झमेले में मेरा घर टूटे… आप भी ना चाहोगे…’’ पड़ोसन का पता हमारे पास था। हम वहाँ पहुँचे।
– मैडम, उस दिन रिक्शा से लौटते में ही उसकी तबियत खराब होने लगी। खून आने लगा था उसे। सो, वहीं के वहीं उसे अस्पताल में भर्ती करा आई। अब क्या कहूं आपसे। तीसेक रुपये भी रख आई उसके हाथ में। क्या करूं। दुखियारी है। मदद तो करनी चाहिये… मगर मैडम जी… मेरे आदमी को पतौ न चलनी चाहिये….।
क्या मुसीबत है ! इसका आदमी न हो गया, आतंकवादी हो गया।
अस्पताल में पूछते-पूछते पहुंचे तो देखा जनरल वार्ड के कोने में पलंग पर रेशमी पड़ी है। निचुड़ी हुई। आँखें बन्द थीं। पास ही बेंच पर एक आदमी बैठा था।
– रेशमी…. कैसी हो !
– ‘‘कौन ! मैडम जी !!’’ रेशमी हमें देख कर ताज्जुब में भर गयी और उठने की कोशिश करने लगी….. वह सोच भी नहीं सकती थी कि हम अस्पताल में उसे देखने के लिये आ सकते हैं….।
– लेटी रहो तुम । कैसी तबियत है तुम्हारी रेशमी ?
– ठीक हूँ….. सफाई कर दी उन्होंने…. कल छुट्टी करेंगे। आप बैठो मैडम जी…’’ वह इधर उधर देखने लगी कि वह हमें कहाँ बिठाये।
– ये कौन है!’’ मैंने उस आदमी की ओर इशारा किया जो हमें देखते ही खड़ा हो गया था।
– मेरा शौहर है मैडम जी !’’ संकोच से बोली वह… जैसे उसकी कोई गलती पकड़ी गई हो।
– यहाँ क्या कर रहा है ? फिर मार कुटाई करने आया है ?’’ मैंने उस हट्टे-कट्टे नौजवान की ओर देखकर कहा जो आँख नहीं मिला रहा था। कभी दरवाजे की ओर तो कभी पलंग की ओर देखने लगता जिस पर रेशमी लेटी हुई थी। पैरों पर लाल कंबल पड़ा था उसके।
– पुलिस ढूंढ रही थी इसे मैडम जी । ये यहाँ छिप गया और घर गया ही नहीं तबसे….
– तो यहाँ छिपे हो तुम लालचन्द।
लालचंद के मुंह पर हवाइयाँ उड़ रही थीं।
– ‘‘मैडम जी !’’ उठने की कोशिश करते हुए हाथ जोड़ रही थी रेशमी। ये कसम खा रहा है। माफी मांग रहा है। अबकी माफी करा दो। कहता है कि अलग कमरा लेकर रह लेगा अपने परिवार के साथ। अब हाथ नहीं उठायेगा….।
दरअसल रेशमी की सास ने जब आफिस में आकर कहा था कि रेशमी का पता नहीं है कि कहां गई तो हमें शक हुआ कि कहीं उसके शौहर ने उसे ठिकाने तो नहीं लगा दिया….. और हम लोगों ने अपनी रिपोर्ट थाने में भेज दी थी। थाना इंचार्ज इत्तिफाक से अबकी बार कुछ ठीक ठाक आदमी है। पहले वाले थानेदार की तरह नहीं कि रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करे और उल्टे हमें सीख दे कि हमने औरतों को बिगाड़ दिया है। रेशमी के लापता होने की रिपोर्ट पर पुलिस के सिपाही रेशमी के घर पूछतांछ करने गये तो रेशमी की सास और जेठ तोे वैसे ही आधी जान हो गये।
बहरहाल अस्पताल से छुट्टी होने के बाद रेशमी और उसके आदमी को थाने ले जाकर समझौता कराया। तय हुआ कि वह जल्दी ही कोई कमरा ले लेगा और अपने परिवार के साथ अलग रहेगा…..।

चलो ! रेशमी का केस तो ठीक हो गया…. मैंने विभा को बधाई दी। इस केस में उसने बहुत दिलचस्पी ली। दौड़भाग की। न सिर्फ अस्पताल बल्कि थाने में जाकर भी दो बार बात की। समझौता कराया। उसके आदमी से कहा कि अलग कमरा मिल जाय और वहां चला जाय तो मिठाई लेकर केन्द्र में आयेगा। अनाथ है रेशमी अपने मायके की तरफ से। अब घर बन जायेगा उसका।

मिठाई का इन्तजार ही रहा। मिठाई नहीं आई लेकिन दो महीने बाद उसकी पड़ोसन का फोन जरूर आया।
– मैडम अभी आप रेशमी का केस खत्म मत करना। उसकी हालत फिर खराब कर दी है उसके घर वालों ने….।
– नहीं ! हम इतनी जल्दी केस खत्म नहीं करते। बीच में जाकर देखते हैं। राजी-खुशी की खबर लेते रहते हैं…. सब ठीक चलता रहा तो छह महीने बाद फाइल बंद करते हैं….’’
…..इतनी आसानी से रेशमी की मुक्ति कैसे हो सकती थी। हमने उस सहृदय पड़ोसिन से कहा कि वह रेशमी को अस्पताल ले जाय।
अबकी उसके जेठ और पति दोनों ने पीटा था उसे । अलग कमरा ढूंढने का प्रयास सफल नहीं हुआ था। घरवालों ने सोचा होगा कि ऐसा तो होता ही रहता है। अलग कमरा लेकर वे लोग रहेंगे तो अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा। फिर काम तो एक ही जगह करना है। मिलकर ही करना है। लड़का अलग होकर कुछ और काम करना चाहता था। लेकिन काम कहाँ धरा है। किसी कारखाने में मजदूरी करे तो दस-बारह घंटे की हाड़तोड़ मेहनत। हिलने की भी गुंजाइश नहीं। नहीं तो सबेरे सबेरे चौराहे पर लगने वाली मजदूरों की मंडी में जाकर खड़ा हो…. पल्लेदारी से लेकर ईंट ढोने के काम की तलाश में…। ऐसे में अपने घर का काम क्या बुरा है। अपना काम और खुद मुख्तारी।
फिर रेशमी ! शायद उसने भी सब्र किया होगा कि अब ऐसा कुछ नहीं होगा। काफी लानत मलानत हो चुकी है।
लेकिन ये कैसे संभव था। अबकी मारपीट में उसकी सास और जेठ भी शामिल थे। जेठ ने उसको लात मारी थी जो उसके पेट पर लगी। सास शायद जेठ की मंशा से वाकिफ थी। उसने इशारा दिया था कि क्यों वह जेठ को देखकर बिदकती है। ऐसा भी क्या सती सावित्री बनना….।
पति मिट्टी का माधो। घर आया। माँ-भाई की सुनी। रेशमी की बात सुनने का धैर्य नहीं था या फिर रोज की चख-चख से तंग था। पेट में पड़ी लात से बिलबिला कर बिसूर रही रेशमी पर उसने भी अपना गुस्सा निकाला और फिर चल दिया बाहर… उसे अपने तनाव से निकलने का रास्ता मालूम था।
दोपहर होते-होते उसके पेशाब में खून आने लगा… और कोई चारा नहीं था। संस्था में उसका केस दर्ज़ था अतः तुरन्त हमने फिर थाने में उसकी ओर से रिपोर्ट दर्ज करायी। एस0ओ0 चौहान थाने में ही थे। उन्होंने दो सिपाही भेजे जीप में। सास पकड़ में आ गयी। रात को दूसरा चक्कर लगा तो रेशमी का पति और जेठ भी मिल गये।
अबकी हमने जल्दी नहीं की। अस्पताल में रेशमी का इलाज चल रहा था। अच्छा है जरा इन दोनों की तुड़ाई हो जाय थाने में। पता तो चले कि पिटने का दर्द कैसा होता है।.

एक हफ्ते बाद ! मैं आफिस पहुंची तो देखा रेशमी वहाँ विराजमान ! विभा परेशान थी।
– दीदी देखिये इसे…… क्या कह रही है। अस्पताल से भाग आई है यह ।
– ‘‘मैडम ! छुड़ा लीजिये उन्हें…’’ वह विलाप करने लगी।
– किसे….
– ‘‘मेरे आदमी को मैडम जी ! बहुत पिटाई कर रये पुलिस वाले उनकी। छुड़ा लीजिये मैडम जी?’’
– क्या पागलपन है। पहले शिकायत लेकर आती है…. फिर हिमायत में भागी फिरती है.
– नहीं मैडम जी। घर बर्बाद हो जायेगा मेरा।
– घर ! कहाँ है घर तेरा ? फिर वहीं जायेगी अपनी कुटाई पिसाई कराने ?
– नहीं जी ! नहीं ! अबकी कसम खा रहा है कि अलग रहेगा। बच्चों की कसम खा रहा। कहता है कि बचा ले रेशमी…. मैं चाहे एक कुठरिया ले लूँ…. हम अलग रहेंगे…. बहुत डंडे बरसा रये हैं पुलिस वाले उस पर…. उसकी चीख पुकार जारी थी। कभी वह हाथ जोड़ती और कभी पैरों पड़ती थी। अजीब कोहराम मचा रखा था आफिस में। आस-पास के लोग जुट आये थे वहाँ शोर सुनकर।
दो घंटे बाद हम सब एक बार फिर थाने में थे। लुटा पिटा रेशमी का परिवार वहाँ था। उसका पति, जेठ, सास…..। आँसू बहाती हाथ जोड़े रेशमी खड़ी थी।…..
स्टाम्प पेपर पर समझौता लिखा जा रहा था। नीला अंगूठा लिये सब तैयार थे समझौते पर छाप लगाने के लिये।
– मैडम ! अब इनका केस मेहरबानी करके हमारे थाने में न लायें। ये औरत रोज यही नाटक करती है। पहले पिटेगी, शिकायत करेगी, फिर रो-रोकर छुड़ाने आयेगी…. चौहान खीझ रहे थे।
– चौहान साहब ! और कर भी क्या सकती है यह गरीब। है कहीं ठौर इसके लिये कि मेहनत मजदूरी करले…. कहां सर छिपायेगी अपने चार बच्चों के साथ…..

मैंने सोचा कि किसी दिन फुर्सत में चौहान साहब के साथ बैठूंगी और उन्हें समझाऊंगी कि औरत के लिये घर कितना जरूरी होता है। घर की चारदिवारी से वह निकल कर जायेगी तो फिर दूसरी चारदिवारी चाहिये। सड़क पर तो कुत्ते नोच कर खा जायेंगे…..।
हम लोग लौट रहे थे।
– क्या सोच रही हो विभा…. बहुत खामोश हो….
– दीदी ! सर के ऊपर छत और दीवारों की ओट…. क्या सचमुच इतनी जरूरी होती है।….
– हाँ ! शायद !! जब तक हम एक और घर बनाने के काबिल न हो जायं….।

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