ये कवितायें एक तरफ जीवन से रूप,रंग गंध लेती हैं तो दूसरी तरफ समाज की नब्ज़ पर भी हाथ रखती हैं। पितृसत्ता के आवरण में चलने वाले शोषण और फरेब के अनेक रूपों को अनावृत्त करती हैं, सवाल उठती हैं। रूपाली सिन्हाकी  आकार में छोटी इन कविताओं में  गहरे भाव अभिव्यक्त होते हैं |… 

घर वापसी 

रुपाली सिंहा

रुपाली सिंहा

एक

बहरूपिया घर लौट आया है
चलेंगे अब आत्मस्वीकृतियों के दौर
बहेंगे कुछ आँसू
अंततः
घर दे देगा उसे पनाह।

दो

उसका लौटना
कायरता है उसकी
शायद धूर्तता और मक्कारी भी
‘सुबह का भूला’ कह घर ने
बचाई दोनों की लाज।

तीन 

घर का गूंगा होना
अच्छा है दोनों के लिए
आखिरकार
घर को भी बचाए रखना है
अपना पुरुषत्व।

चार 

वापसी हुई है उसकी
चैन की सांस ली है घर ने
अब चूल्हा नहीं रहेगा ठंडा
बच्चे भी जा पाएँगे स्कूल
इस तरह एक बार फिर
आज़माई उसने अपनी ताक़त।

पाँच 

लौटा है इस बार खाली हाथ
पराजित सा मानो
किया हो उसने कोई संगीन अपराध
घर के चेहरे पर दुःख
चिपक गया है
स्थाई भाव की तरह।

आत्मा का सूरज  

साभार google से

साभार google से

जब डूबता है आत्मा का सूरज
नीयत की रौशनी गुल हो जाती है
सच चला जाता है नीम बेहोशी में और
झूठ बैठ जाता है दिल के सिंहासन पर
सच का स्वांग करते-करते
खुद को सच ही समझने लगता है
लोग तो लोग ठहरे आखिर
खा ही जाते हैं धोखा !

प्यार 

तुम आये तो वे
गलबहियाँ डाले लिपटी थीं
तुम्हारे जाते ही
उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम हो गईं।

वापसी 

रात मुँह अँधेरे ही लौट गयी
चाँद से मिलकर
आकाश के बीचोंबीच खड़ा वह
देखता ही रह गया उसे जाते
सूरज के आने का वक़्त हो चला था
थके कदमो से बादलों पर
पाँव घसीटता चला गया।

बसंत -एक

google से

google से

मेरी आत्मा ने पहन लिया है तुम्हें
होठों ने पी लिया तुम्हारा रस
आँखों ने भर लिया तुम्हारा रंग
साँसों ने बसा ली तुम्हारी सुगंध
आ भी जाओ कि
पतझड़ सामान बांधकर
जाने को बैठा है तैयार।

बसंत-दो 

पलाश!
तुम डालियों पर ही ठीक हो
तुममे कहाँ वो कुव्वत कि
उतर पाओ ज़िन्दगी में!
मगन रहो अपने एक ही रंग में
ज़िन्दगी के रंग तो
अनगिनत अनूठे हैं।

बसंत -तीन 

वसंत ने
दस्तक दी
दरख्तों के दरवाज़ों पर
पत्तियाँ
शर्म से लाल हुईं।

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