आज की मृगतृष्णा जीवन पद्धति में मानसिक एवं भावनात्मक असामंजस्य से नारकीय होते पारिवारिक जीवन से त्रस्त लोग आभासी दुनिया में सुख-शांति और जन्नत की तलाश कर रहे हैं. फ्रेंडशिप क्लबों आदि के सहारे जिंदगी को नए रूप में परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं. लोग रिश्तों के दरारों में व्यापार की एक सम्भावना देख अपना दिल और जेब भर रहे हैं. ‘गीताश्री’ के कहानी संग्रह ‘स्वप्न, साजिश और स्त्री’ की समीक्षा ‘सुशील कुमार भारद्वाज’ की कलम से …..

चकाचौंध, भौतिकवादी जीवन का स्याह पक्ष 

पुस्तक – स्वप्न, साजिश और स्त्री लेखक – गीताश्री मूल्य – ३०० रुपए पृष्ठ -१४४ प्रकाशक – सामयिक बुक्स नई दिल्ली

पुस्तक – स्वप्न, साजिश और स्त्री
लेखक – गीताश्री
मूल्य – ३०० रुपए
पृष्ठ -१४४
प्रकाशक – सामयिक बुक्स नई दिल्ली

समकालीन कथाकारों में गीताश्री एक महत्वपूर्ण लेखिका हैं जो यथार्थवाद को अपनी कहानियों में तवज्जो देती हैं जिसमें संवेदना और मानवीय चिंतन का संचार होता है. “स्वप्न, साजिश और स्त्री” गीताश्री का नया कथा-संग्रह है जो कि आज के भौतिकवादी परिवेश में चारदीवारी के अंदर और बाहर दरकते हुए मानवीय रिश्ते, उन्मुक्त सपनों की उड़ान और साजिश की शिकार होती स्त्रियों के संघर्ष की कहानी है.

आज की मृगतृष्णा जीवन पद्धति में मानसिक एवं भावनात्मक असामंजस्य से नारकीय होते पारिवारिक जीवन से त्रस्त लोग आभासी दुनिया में सुख-शांति और जन्नत की तलाश कर रहे हैं. फ्रेंडशिप क्लबों आदि के सहारे जिंदगी को नए रूप में परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं. लोग रिश्तों के दरारों में व्यापार की एक सम्भावना देख अपना दिल और जेब भर रहे हैं. व्यस्तता और इगो के कारण काम और झगड़े इतने हैं कि लोगों को प्रभावित होते बच्चों के भविष्य के बारें में भी सोचने की फुर्सत नहीं है तो किसी की भावना के लिए कहाँ से इज्जत आएगी ? मनुष्य के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही चेहरे नज़र आने लगते हैं. असहिष्णुता इतना अधिक है कि किसी के पास सामंजस्य और समझौते का विचार तक नहीं है. जिंदगी की तलाश में लोग भटकते जा रहे हैं. कभी-कभी कुछ लोग सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर जलालत की जिंदगी जरूर झेल लेते हैं लेकिन वे भी मौके की ही ताक में रहते हैं. जिसका जीता जागता सबूत है “डायरी आकाश और चिडियां”, “उजड़े दयार में”, “आवाजों के पीछे-पीछे”, और “बदन देवी की मेंहदी का मनडोला” जैसी कहानियां, जहाँ चकाचौंध भौतिकवादी जीवन का स्याह पक्ष है.
“रिटर्न गिफ्ट” बिखड़ी जिंदगी का निराश अंत है तो “भूत खेली” और “माई री मैं टोना करिहों” वैज्ञानिक युग में भी अन्धविश्वास के नाम पर होने वाले आर्थिक, मानसिक और शारीरिक शोषण का विभत्स रूप.

सुशील कुमार भारद्वाज

सुशील कुमार भारद्वाज

“कहाँ तक भागोगी” समाज से धर्म–परिवर्तन पर एक सवाल है कि पितृसत्तात्मक समाज में किस धर्म में स्त्रियां सुरक्षित हैं? कहाँ स्त्रियों को दोयम दर्जे की जिंदगी नहीं गुजारनी पड़ती है? “लकीरें” स्पष्ट करती हैं कि भावनात्मक रूप से पीड़ित सारी महिलाओं की कहानी कमोबेश एक ही है, तो “सुरताली के सपने” बालश्रम की वजह से भावनात्मक एवं मानसिक रूप से बर्बाद होते बचपन की ओर इशारा है. “मेकिंग आफ बबीता सोलंकी” में परिवार और इज्जत की कीमत पर आगे बढ़ने की ललक और बदनामी के अन्तर्द्वन्द्व के बीच उभरते दर्द की ओर ध्यानाकर्षित किया गया है जबकि “ड्रिम्स अनलिमिटेड” में प्रतिभा और प्रेम के नाम पर भावनात्मक शोषण की ओर.

संग्रह की सभी बारह कहानियां स्त्री-केंद्रित हैं लेकिन इन्हें स्त्री-विमर्श मात्र के दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता. इन कहानियों में न उपदेश है न आदर्श, बल्कि परिस्थितियों और समस्याओं को ज्यों का त्यों रखा गया है जिससे सीख लेते हुए स्वयं में सुधार करने की जरूरत है. देशी और विदेशी शब्दों में जहाँ भाषा सहज बोलचाल की है वहीं शिल्प बांधे रखने में और कथ्य चौंकानें में सफल है.

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