जीविका की जद्दो-जहद में  लगातार क्षीण होती हमारी संवेदनाएं , अपना जीना भूलकर दूसरों के  जीवन को ही अपना जीना समझने की स्त्री मन की कोमलता, प्राकृतिक और वास्तविक रंगों के साथ जिन्दगी की कला को समझने की कोशिश करतीं तरसेम कौर की कवितायें |… सम्पादक 

चाँद की आँखों में

तरसेम कौर

तरसेम कौर

चाँद की आँखों में

भरा हुआ है
चाँद का सारा पानी
पृथ्वी का एक
अकेला चाँद
देखता है
पूरी पृथ्वी का
पानी सूख गया है
और इकठ्ठा हो गया है
यहां के लोगों की
आँखों में
पूरे ब्रह्मांड का
महासागर भी
कम पड़ गया है
पृथ्वी की नदियों
और समन्दरों
को भरने के लिए..
अब पृथ्वी के
लोगों का दिल
सूख गया है
बंजर हो गया है..!!

 

नारी जीवन….

 

आँखों से
रूठी नींद
बोझिल सी
पलकें
पहाड़ सी
ज़िम्मेदारियां
ढोती ,
कभी
गिरतीं
कभी
सम्भलतीं ,
सूरज के
जगने से
पहले
बहुत पहले ,
होती शुरू
यात्रा
लम्बे सफर की ,
कई
मंज़िलें ,
कई
रुकावटें ,
कभी
उड़तीं ,
कभी
लड़खड़ातीं ,
नारी जीवन
कभी निर्जन
कभी उपवन..!!

डल झील का सूरज

 

डल झील का सूरज
थक कर सोने चला है
सफ़ेद चाँदी सी चमकती
पहाड़ियाँ के पैरों में खड़े
चिनार के तने लम्बे होने लगे हैं
चिनार के  दहकते लाल पत्ते
झील को घर बनाने लगे हैं
थमने सी लगी है ज़िन्दगी वादियों में
सुस्ताने लगी हैं कश्तियाँ भी झील पर बैठी हुई ..!!

2 Responses

  1. रमेश शर्मा

    तरसेम की ये कविताएं आश्वस्त करती हैं कि आने वाले दिनाें में उनकी कुछ अच्छी कविताएं हमें पढ़ने काे मिलेंगी !

    Reply

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