युवा छात्र, संस्कृत कर्मियों की बनती यह सामाजिक दृष्टि अपने दौर की एक सुखद छाँव की अनिभूति से भर देती है, कुछ यही एहसास कराती हिन्दू कॉलेज में बी.ए.(आनर्स) सैकंड इयर के छात्र ‘अनुपम त्रिपाठी’ की यह कविता …..|संपादक 

‘जपते रहो 

अनुपम त्रिपाठी

अनुपम त्रिपाठी

जाग गए
तो देख लेंगे

कि कैसे कल रात
गिरा दिया था जिसने
वर्षों पुरानी इस मस्जिद को, अब तैयार कर रहा है भाषण जिसमें लिखा है , वही
पुराना शाश्वत मन्त्र-
‘मित्रों हम सब एक हैं’

जाग गए
तो देख लेंगे
उन हजारों की मौत
जिनके अनाज तो पहुंच जाते है संसदीय जुआरियों की जेबों में पर नहीं पहुंच पाती है
उनके भूखे बर्तनों की आवाजें’
लोकतन्त्र के सबसे बड़े मन्दिर में।

कहीं देख न लें,
दिन के उजाले में
राष्ट्र के नाम पर
पनपते अँधेरे और
आतंक को।

इस आत्म मुग्ध राष्ट्र में कीचड़ की सड़ांध में
जानवरों और जानवरों के साथ लोग सड़ रहे है
हम जप रहे हैं
‘भारत माता की जय’,
‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।

‘उस पार क्या’

साभार google से

साभार google से

ओ मन ,
उस पार जाकर क्या करूँ?
जब हृदय के हर ठिकों में
अनन्त काल से हिल रही
अनन्त उँगलियों और स्पर्शों को
दारुण हो
ठहर ही जाना है,
तब पार जाकर क्या करूँ?
मन
तुम चाँदनी चौक की गलियों के
पुरातन नक्शे वाले घर तो नहीं?
जिनमें सटे रेत और ईंट
भुरभुरा रहे है
कहीं पसर जाने को,
जिन्हें सिर्फ
थके फेफड़ों को छुआती
किसी चलताऊ बीड़ी का धुँआ,
मटमैले एनकों से झांकती
भूरी आँखे,
ठिकों की चौखटों पर
वर्षों से बैठकर
करती आ रही हैं नजरअंदाज
क्योंकि निश्चिन्त हैं
जानती हैं,
कि तुममें और भी पुश्तें
करती चली जाएंगी निवास।
और एक दिन
छू नही पाएँगी
चलताऊ बीड़ी का धुआँ
थके फेफड़ों को,
झाँकना बन्द कर ही देंगी
भूरी आँखे
मटमैले ऐनकों से।
पसर ही जाएँगी
चाँदनी चौक की ये इमारतें
जहाँ वर्षों तक होता रहा निवास।

तब
क्यूँ बनाएँगे वे लोग
मेरे ईंटों से ,ठहरीले ठिके
जब लम्बे अंतराल तक ठहरकर
इन्हें भी पसर ही जाना है,तब
रे छूटन
बह रही नालियों की धार में
पसर कर क्या करुँ
उस पार जाकर क्या करुँ?

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