धूसर एकांत में समय से टकराती मानवीय व्याकुलता से टूटते दर्प और निरीह वीरान में सहमी खड़ी इंसानियत के अवशेषों के साथ चलती जिन्दगी की कल्पना बेहद खतरनाक होती है | वक़्त के चहरे पर और गाढी होती धुंध भरी परत को चीर कर आंशिक ही सही तीक्षण रौशनी की और इशारा भर जीवन का आधार बनने लगता है, इसी दृष्टि और अपने अनूठे बितान के साथ उतरती हैं संध्या नवोदिताकी कवितायें जो महज़ विद्रूपताओं का संजाल ही नहीं है बल्कि संध्या की अपनी पहचान भी है साथ में साहस और उर्जा के साथ बढ़ते रहने का |.. संपादक    

जब उम्मीदें मरती हैं 

संध्या नवोदिता

जब सब उम्मीदें मरती हैं,
तब मरघट शोक उभरता है,
दिल खाली बेदम फिरता है

जब केवल आहें बचती हैं
शामें अंधेर उगलती हैं
हर तरफ कराहें और चीखें
ऐसे दिन रातें कटती हैं

है अभी तो कोई युद्ध नहीं
यह शांत समय कहलाता है
पर उफ़न रहा भीतर सब कुछ
ज्यों युद्ध चला ही आता है

जो कातर है जो है निरीह
वह हर पल कुचला जाता है
जो पूँजी का अधिनायक है
वह सौ सौ नाच नचाता है

सब कुछ फीका फीका सा है
न प्रेम , मित्रता का कुछ हल
अब इंसानो की वकत कहाँ
किसको फुर्सत बैठे दो पल

सब भाग रहे हैं इधर उधर
बस चूहा दौड़ जीतने को
यह उनकी भी मजबूरी है
कि आकुल चूहा बनने को

ऐसे में ढूँढना प्यार मधुर
ऐसे में खोजना एक साथी
यह जीवन एक समंदर है
तो खोज हमारी एक मोती

किस ओर जायेगी यह दुनिया
इस मार काट से अगर बची
पूँजी के प्रेत की बाधा से
रह जाए अगर यह बिना नुची

सब नदी, समन्दर, जंगल, जन
सब पर इस प्रेत का साया है
सब सम्मोहन सब कुटिल क्रूर
हथियार यह लेकर आया है

हम कितने बेबस, कितने अधीर
छोटा सा जीवन लिए चले
छोटी छोटी सी इच्छाएं
बस फूलों जैसी आस पले

हम गीत उदासी के गाएं
जुगनू जैसे जलते बुझते
मुट्ठी में खुशियाँ बन्द किये
गम के अंगारों पर चलते

कुछ दूर तुम्हारा साथ रहे
कुछ देर तो यह एहसास रहे
कुछ उम्मीदों की रौनक हो
इस साथ में नरम हरारत हो

हम खुशियाँ जीत भी सकते हैं
बस साथ में जुड़ते जाएं तो
बेशक यह लूट विनाशक है
पर मिल के इसे हराएं तो

साथ तो आना ही होगा
जीवन का अगर यह अंत नहीं
पतझड़ के वीराने से डर
रुक सकता कभी वसंत नहीं

एक दिन जब हम नही रहेंगे

एक दिन जब हम नही रहेंगे
किताबों की ये अलमारी खोलेगा कोई और
किसी और के हाथ छुएंगे इस घर की दीवारों को
कोई खोलेगा खिडकी
और हमारा रोपा इन्द्रबेला मुस्कुराएगा.
हो सकता है किसी और की उंगलियां नृत्य करें इस कंप्यूटर कीबोर्ड पर
कोई और उठाये फोन का रिसीवर

एक दिन
जब नही रहेंगे हम
कुछ भी नही बदला होगा
वैसे ही निकलेगा सूरज ,होगी शाम
छायेगे घने बादल
बंधेगी बारिश की लंबी-लंबी डोरियाँ
नाव तैरायेंगे बच्चे .. छई छप करते हुए..

हमारे जाने के बहुत बहुत बाद तक रहेगा हमारा घर हो चुका यह मकान
यह अलमारी, बरसो बरती गयी यह मेज़,
मेले से चुन कर लाया गया यह गुलदस्ता,
बेहतरीन कारीगर के बनाए चमड़े के बने घोड़े,
शिल्प-हाट से बहुत मन से लिए गए कांच के बगुले, टेराकोटा का घना पेड़,
लिखने की इटैलियन मोल्डेड टेबल ,
पहनी हुई चप्पलें, टूथ ब्रश ,ढेर सारे नए कपडे भी ,जो कभी पहने नही गए,

हारमोनियम, कांच की चूडी, यहाँ तक कि आइना भी
और हाँ ,दूसरे मुल्क की सैर कराने वाला पासपोर्ट
और वे सभी कागज़-पत्तर जो हमारे जीवित होने तक पहचान पत्र बने रहे
सब कुछ बच रहेगा बहुत समय तक
बिना हमारे किसी निशान के

जिस पल ये सब कुछ होगा
बस हमारी गंध नही होगी इन सब पर ,
हमारी मौजूदगी का कोई चिन्ह नही
उस दिन भी सब कुछ चलेगा ऐसे ही
कुछ आपाधापी, कुछ मौज मस्ती

लौट-लौट के आती है इन सब के बीच होने की ख्वाहिश
कहाँ से बरसती हैं ऐसी हसीन इच्छाएं

एक दिन
जब जायेंगे हम फिर कभी न लौटने के लिए
नही ही तो लौट पायेंगे सचमुच .

Leave a Reply

Your email address will not be published.