भारतीय सेना द्वारा इंसानियत के दुश्मनों के खिलाफ अंजाम दिए गए बहादुरी के कारनामे से हम सभी न केबल गद-गद हैं बल्कि ‘जयति भारत’ की गूँज हमारे मन में उठ रही है और हमारे कानों को सुनाई भी दे रही है | और शायद यही समय भी है महान भारतीय परम्परा की जीवन्तता के साथ एक ऐसे भारत का सपना देखने का जहाँ न केवल जांवाजों की बहादुरी हो बल्कि काल्पनिक स्वर्गीय इंसानी जीवन भी भारतीय महानता के साथ साकार हो उठे……. कौन करेगा या सोचेगा यह सब, यह शायद हमारे और आपके लिए सवाल हो सकता है, और जवाब मिले तो हम उनसे पूछ भी सकते हैं कि हमारी महान भारतीय परम्परा का यह इंसानी सपना कब साकार होगा ? फिलहाल तो ऐसे सपने से भरी ‘संध्या नवोदिता’ की कविता पढ़ते हैं और फिर से एक बार ‘जयति भारत’ बोलते हैं |…. संपादक

जयति जय जय , जयति भारत 

संध्या नवोदिता

संध्या नवोदिता

जिए भारत जिए भारत
जिए भारत देश की जनता
हँसे भारत हँसे भारत
हँसे भारत देश की जनता

हो तरक्की, भूख न हो
लाचार कोई, रसूख न हो
हर हाथ को हो काम
मजदूर को आराम भी हो

जयति जय जय जयति भारत
जिए भारत जिए भारत

बेटियों से रेप न हो
बेटों के संग खेल न हो
रास्ते सब हों सुरक्षित
रात और दिन हों सुरक्षित

धर्म की दीवार न हो
जाति की तकरार न हो
ऊँच न हो, नीच न हो
झगड़ा अपने बीच न हो

आदमी औरत बराबर
एक दूजे के हों पूरक
कोई भाला कोई ताना
अब न आपस में चलाना

मेहनती की लूट न हो
पूँजी को कोई छूट न हो
कोई सोये झोंपड़ी में
किसी को एंटिला की भूख न हो

आदमी की कद्र सबसे ज्यादा हो
आदमीयत का ही बस लबादा हो

हो दंगों से मुक्त भारत
धर्म जाति मुक्त भारत
अरबपतियों से मुक्त भारत
घोर गरीबी से मुक्त भारत

शांत भारत, साम्य भारत
हम बनाएं काम्य भारत
जयति भारत जयति भारत
जिए भारत जिए भारत

One Response

  1. अनीता चौधरी

    शानदार कविता । लेखिका को बधाइयाँ।

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