रंग मंच कि दुनिया में प्रवेश करने से पहले आपने ‘दिलशाद सैदानपुरी’ के नाम से गज़लें लिखना शुरू किया और यह लेखन का सफ़र आज भी जारी है | हमरंग के मंच से कुछ गज़लें आप सभी पाठकों के लिए, हमरंग पर आगे भी यह सफ़र जारी रहेगा ….| – संपादक 

जरूर देखा है 

जरूर देखा है: ग़ज़ल (दिलशाद सैदानपुरी)

मृत्युंजय प्रभाकर
Mrityunjay Prabhakar*
Assistant Professor
Drama and Theatre Art
Sangit Bhavan
Visva-Bharati
Santiniketan-731235
m-8170097507

ख़ुशी को आसमानों से कभी बरसते नहीं देखा
बात-बात पर धरती को उजड़ते जरूर देखा है

किसी हुक्मरान को सभ्यता बसाते नहीं देखा
हाँ उन्हें आज भी इन्हें उजाड़ते जरूर देखा है

लहरों के जोर से कभी किस्तियाँ डूबते नहीं देखा
यारों के दिए घाव से उन्हें डूबते जरूर देखा है

हवाओं में कहाँ इतना जोर कि उड़ा दें आशियाँ
रकीबों के रहम से इनको उजड़ते खूब देखा है

ऊपर वाले के रोके गलत काम रुकते नहीं देखा
नीचे वालों की नीचताओं का असर खूब देखा है

वो जो हमारा नाम लेकर बन गया शहंशाह
उसकी नीयत का खोटापन हमने खूब देखा है

गर्मियों में भले झुलसते देखीं हैं हमने जिंदगियां
बारिश में धरती को मुस्कराते बारंबार देखा है

बदलती नहीं कभी भी लाठियों से संस्कृतियाँ
हमने लाठियों में घास उगते जरूर देखा है

दुनिया को जो आजमाते हैं हमेशा हथियारों से
हमने उन्हें अपनी चिता सजाते जरूर देखा है।

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