‘हनीफ मदार’ की छोटी किन्तु बेहद मार्मिक और संवेदनशील कहानी ‘जश्न-ए-आज़ादी’ हाल ही में आउटलुक हिंदी के जनवरी २०१६ के अंक में प्रकाशित हुई जिसे देश भर के पाठकों की बेहद सराहना मिली | इस कहानी पर पाठकों के अनगिनत फ़ोन और संदेश मिलते रहे | भारतीय ‘गणतंत्र’ की 67 वीं वर्षगाँठ पर प्रसंगवश यह कहानी अति महत्वपूर्ण जान पड़ी इस लिए आज आप सब के लिए इस कहानी को हमरंग पर प्रकाशित कर रहे हैं …… आपकी प्रतिक्रियाएं अपेक्षित हैं …. गणतंत्र दिवस की अनेक बधाइयों के साथ …..| – अनीता चौधरी 

जश्न-ए-आज़ादी 

हनीफ मदार

हनीफ मदार
जन्म – 1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश
कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- देश भर की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
कहानी संग्रह – “बंद कमरे की रोशनी”
फिल्म – जन सिनेमा की फिल्म ‘कैद’ के लिए पटकथा, संवाद लेखन
पूर्व सचिव – संकेत रंग टोली
सह सचिव – जनवादी लेखक संघ, मथुरा
कार्यकारिणी सदस्य – जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)
संप्रति – संपादक – हमरंग
संपर्क – 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१
phone- 08439244335
email- [email protected]

उसका घर इन नवधनाड्य और विकसित, अविकसित कॉलोनियों से दूर बंजर ज़मीन पर बसे उस मुहल्ले में था जो अभी तक किसी ग्राम पंचायत या टाउन में शामिल नहीं हो पाया था | उसकी बस्ती का कोई नामकरण भले ही न हो पाया था लेकिन शहर में आने-जाने वालों को वह दूर से ही नज़र आती थी | एक दूसरे से सटी हुई प्लास्टिक के तिरपाल से बनी सैकड़ों झोपड़ियों को मानो आसमान ने तरस खाकर अपने एक टुकड़े से छत बना कर ढँक लिया हो | उस बस्ती से रोजाना ही सुबह, फटी बिबाइयों के साथ कंधे पर खाली प्लास्टिक की बड़ी सी बोरी लटकाए कई जोड़ी पैर बाहर जाते और शहर भर के कचड़े को अपनी पीठ पर लादे शाम तक वापस आते | बस्ती के बाहर-भीतर लगे उसी कूड़े के ढेर से ही निकलता था उसका खाना और नाश्ता | रात के गहराते अँधेरे में वही कूड़े का ढेर उसके मुलायम बिस्तर में तब्दील हो जाता |

वहाँ से निकलते हुए लोग अक्सर ही उस बस्ती पर चर्चा करते “अब देखो, ये भी तो भारतीय जन हैं… देश को कितने साल हो गए आज़ाद हुए लेकिन इनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं हो सका | यह हमारे देश के विकसित और डिजिटल होने पर कितना बड़ा प्रश्न चिन्ह हैं |” और न जाने क्या-क्या कहते-सुनते | उनके रहन-सहन को नाक-मुंह सिकोड़ कर देखते और निकलते रहते | सिकन्दर ने उसी कूड़े के ढेर पर ही अपनी आँखें खोलीं थीं | माँ का सूखा आँचल खींचते और सभ्य घरों से फिंके हुए ब्रैड और टोस्ट के टुकड़ों को खाते-पीते कब नौ साल का हो गया, इसे वह खुद भी नहीं जानता | न जाने क्यों सिकन्दर को बस्ती के अन्य बच्चों के साथ ताश पीटने या अन्य उठा-पटक जैसे खेलों में आनंद नहीं आता | वह सूरज की पहली किरण के साथ ही बस्ती से बाहर की सड़क पर, नींद से बोझिल आँखों को मलता आ बैठता | दूर से उड़ कर आती फ़िल्मी गानों की आवाज़ के साथ आवाज़ मिलाकर गाने गुनगुनाता | सड़क से होकर गुज़रते स्कूली बच्चों को, स्कूल जाते हुए अजीब कौतूहल और निरीहता से देखता | फिर शांत हो जाता जैसे खुद से कुछ अनसुलझे सवाल-जबाव कर रहा हो |

एक दिन वह अंडरवियर के ऊपर बड़ी और ढीली-ढमली सी शर्ट पहने स्कूल जाते बच्चों के पीछे-पीछे चलकर स्कूल तक जा पहुंचा | यह सभ्य कही जाने वाली कॉलोनी का एक प्राइवेट स्कूल था जिसमें कोई भी यूं ही प्रवेश नहीं कर सकता था फिर सिकन्दर तो उनके लिए किसी पागल से कम नहीं था | सिकन्दर बिना कुछ बोले स्कूल के पीछे दीवार से सटकर जा खड़ा हुआ | वह कभी स्कूल की दीवार से अपना कान सटाता | तो कभी स्कूल के इस कोने से उस कोने पर जाता | छुट्टी होने तक वह स्कूल के भीतर से आती बच्चों की किलकारियों के साथ उनके हंसने-ठटाने, अ-आ, इ-ई, ए-बी-सी-डी की आवाज़ों को सुनने की सफल-असफल कोशिश करता रहा | वह बच्चों की हंसने की आवाज़ों के साथ कभी खुद भी हंसता और कभी-कभी ख़ुशी में जोर-जोर से गाने लगता |

सिकंदर की यह रोजाना कि दिनचर्या बन गई थी मानो उसे भी कोई काम मिल गया हो | अब वह सड़क पर लगे हैण्ड पम्प पर अपना मुंह धोता और बेसब्री से बच्चों के आने का इंतज़ार करता | बच्चों को आता देख ख़ुश होता और बच्चों के साथ स्कूल तक जाता | बच्चे अन्दर चले जाते और वह स्कूल के चारों ओर घूमता या फिर बंद फाटक की झिरियों से झांकता, ख़ुश होता, थक जाता तो वहीँ बैठ जाता | मानो उसका शरीर स्कूल के बाहर हो और वह स्कूल के बच्चों के साथ पढ़, खेल और हंस रहा हो | अब वह, सुबह स्कूल की प्रार्थना और राष्ट्रगान भी स्कूली बच्चों के साथ स्कूल के बाहर रहकर ही गाने और गुनगुनाने लगा था |

हनीफ मदार

बच्चे भी उसे अब पहचानने लगे थे | वे रास्ते में उसे कभी-कभी छेड़ते, गाना, गाने को कहते तो सिकन्दर शरमा जाता लेकिन कुछ कह नहीं पाता |  स्कूल के बाहर खड़े हुए कभी किसी ने उस से  पूछा भी ‘पढ़ेगा स्कूल में..?’ तो वह नज़रें झुका लेता और खुद को देखता फिर वहाँ से हट कर स्कूल के दूसरे कोने पर जा खड़ा होता | कई बार स्कूल के कर्मचारियों ने उसे स्कूल के गेट से डाट-डपट कर दूर भगा भी दिया लेकिन छुट्टी के समय स्कूल से निकलते बच्चों को वह दरवाजे पर ही खड़ा मिलता और बच्चों की भीड़ में शामिल होकर, खुद में ही हँसता मुस्कराता वापस जाता |

एक दिन स्कूल की प्रार्थना और राष्ट्रगान गाने के बाद भी उसे स्कूल से बच्चों की रोजाना की सी आवाजें नहीं आईं | इस अजीब शान्ति से बाहर खड़ा सिकन्दर कुछ बैचेन सा हो उठा | वह कुछ और सोचता कि अन्दर से किसी आदमी के बोलने की आवाज़ आई | सिकन्दर समझ गया यह सर जी की आवाज़ थी | बच्चों के साथ आते-जाते सिकंदर को कुछ ऐसे शब्द, रट गए थे | सिकन्दर फाटक की झिरी से कान लगा कर सर जी की बातें सुनने लगा | “बच्चो ! छब्बीस जनवरी को गोरे अंग्रेज की गुलामी से आज़ाद होकर हमारा देश पूर्ण गणतंत्र हुआ | यानी हमारे देश में हमारा अपना संविधान लागू हुआ | अपनी सरकार बनी और हम अपने घर में कहीं भी बिना रोक-टोक आने-जाने, खाने पीने, पढने-लिखने, हंसने-गाने को आज़ाद हुए |” हालांकि सर जी देर तक ना जाने क्या-क्या बोलते रहे वह सब कुछ सिकंदर के लिए और दिनों से कुछ नया और अजीब था | और उसकी समझ से दूर भी |

दूसरे दिन उसने देखा स्कूल के बाहर चूना डाला जा रहा है | तेज आवाज़ में गाने बज रहे हैं बच्चे भी और दिनों से कुछ ज्यादा ही चमक रहे हैं | कुछ हाथों में झंडे लेकर आ रहे हैं | यह सब देखकर सिकंदर के भीतर भी कुछ अनजानी उथल-पुथल मची था | वह जानना चाहता था कि यह सब क्या हो रहा है | लेकिन, वह किसी से भी कुछ पूछ पाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था | कुछ देर में ही उसने एक बड़ा सा झंडा स्कूल पर हवा में उड़ते हुए देखा और जयकारों के साथ ही बच्चों के द्वारा गाना-बजाना शुरू हो गया | सिकंदर का मन, अब बहुत जोरों से मचलने लगा | वह बाहर सड़क पर ही जोर-जोर से गाता हुआ घूमने लगा | मानो ख़ुद से कोई जंग लड़ रहा हो |

 छुट्टी के समय बच्चों के हाथों में मिठाइयां और टाफी देख कर उसका मन भी ललचाने लगा | किसी बच्चे ने उसे एक टाफी दे दी तो वह खुश होते हुए विवशता में पूछ ही बैठा “आज का पांत भई ..?” उसकी बात सुनकर बच्चे ठठाकर हंस पड़े | सिकंदर तनिक सहम गया | बच्चे उसकी अज्ञानता की खिल्ली उड़ाते हुए बताने लगे “अबे ! आज छब्बीस जनवरी है यानी गणतंत्र दिवस.. आज स्कूल में झंडा लगता है फिर लड्डू और टाफी मिलती हैं, पता है, सर जी कहते हैं ‘आज के दिन पर, हम भारत बासियों को गर्व करना चाहिए… |” सिकंदर बीच में ही बोल पड़ा “मोय भी …?” सुनकर बच्चे कुछ सकते में आ गये फिर अचानक बोले “हाँ तो… तू भी तो भारती है |” सिकंदर की चाल कुछ मध्यम हो गई और धीरे से बोला “लेकिन…|” बच्चे जैसे उसका आशय समझ गए थे “हाँ…., तेरा नाम तो स्कूल में लिखा ही नहीं…?” इतने पर दूसरा बच्चा बोल पड़ा, “तू अपने घर पर झंडा लगा लिया कर इस निसार की तरह, इसके यहाँ तो हर बार झंडा लगता है और मिठाई भी मिलती है |”

सिकंदर को जैसे सब समझ में आ गया था और बस एक ही सवाल शेष था मिठाई पाने के लिए “झंडा कहाँ मिलैगो…?” एक बच्चे ने अपने हाथ में लगा हुआ कागज़ का झंडा उसे थमा दिया “यह ले झंडा |” सिकंदर उसे ले कर तेजी से घर की तरफ दौड़ा | हड़बड़ी में ठोकर खाकर वह गिर गया जिससे उसके हाथ में लगा कागज़ भी फट गया | हाँ कागज़ के टुकड़े में दिखाई देते झंडे के रंगों को लेकर ही वह अपनी बस्ती में पहुंचा | आनन्-फानन में उसने साथ के बच्चों को जो सीखा-समझा था वह सब बता दिया | आज़ादी और आज़ादी की मिठाई की बात सुनकर जैसे सबके चेहरे खिले फिर मुरझा गए, सवाल था, झंडा कहाँ है…?  अचानक एक युक्ति सूझी और तमाम झोपड़ियों में तलाश होने लगी, कुछ ही देर में तीन रंगों के कपड़ों के टुकड़े खोज निकाले गए | कागज़ के टुकड़े में रंगों का क्रम देखकर उन्हें गाँठ लगाकर जोड़ा गया |

अगले ही पल बस्ती में भी तिरंगा उड़ रहा था | बच्चे ख़ुशी से चिल्ला रहे थे | अब यहाँ भी अपने तरह से आज़ाद गणतंत्र का जश्न था | सिकन्दर स्कूल पर सीखे हुए जयकारे लगा रहा था ‘तिरंगे झंडे की … जय ..’देश के अमर शहीदों की… जय, भारत माता की …जय….. लेकिन, नारे लगाते बच्चे, आँखों ही आँखों में एक दूसरे से पूछ रहे थे ‘कब पहुंचेगी यहाँ आज़ाद गणतंत्र की मिठाई…..?

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