दुनिया की प्रगतिशील चेतना के अग्रणी संवाहक वर्ग को केंद्र में रखकर बुनी गई ‘संजीव चंदन’ की यह कहानी आधुनिक समय और समाज का एक नया विमर्श रचती है | प्रस्तुति का अनूठापन कहानी विस्तार पर भारी है जो  इस कहानी को महत्वपूर्ण बनाता है | .. – संपादक 

जिन दिनों 

संजीव चंदन

संजीव चंदन
जन्म : बिहार के जहानाबाद जिले में, कर्तिक पूर्णिमा , 1977
कहानियां, साक्षात्कार , कथादेश , पाखी , संवेद, समालोचन सहित विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित
बी बी सी सहित विभिन्न हिन्दी समाचार पत्रों के लिए सामयिक विषयों पर लेखन
कहानी संग्रह ‘ 546 सीट की स्त्री’ और आलोचनात्मक लेखों का संग्रह ‘ स्त्री –दृष्टि’ शीघ्र प्रकाश्य .
स्त्रीवादी पत्रिका ‘ स्त्रीकाल’ के संपादक,

इनबॉक्स में रानी सारंगा : धइले मरदवा के भेस हो

जिन दिनों खाप पंचायतें इनसानी रिश्तों के लिए कोड ऑफ़ कंडक्ट बना रही थीं , जिन दिनों किसानों की आत्महत्या के प्रति बेफिक्र समाज को देश के बड़े चिकित्सा संस्थान में एक डाक्टर की आत्महत्या चौका गया था- डाक्टर ने अपने गे पति की प्रताड़ना से पीड़ित होकर आत्महत्या का रास्ता चुना था, जिन दिनों देश के प्रधानमंत्री ने बहु और सास की भूमिका निभा चुकी अभिनेत्री को देश की शिक्षा की बागडौर सौप दी थी और अपने राज्य में हुए सांप्रदायिक दंगे में मारे गये लोगों की ओर से लड़ने वाली महिला के नेल पोलिश और आई ब्रो कटिंग के खर्चे पर जांच बैठवा दी थी, जिन दिनों  सोशल मीडिया में ‘ चालीस साल की औरत ’ और ‘ माहवारी’ पर कविताओं ने हलचल पैदा कर रखी थी, उन्हीं दिनों की बात है कि हर रात की तरह उस रात मैंने उसे एक कहानी और सुनाई . वह रात दूसरी रातों से अलग थी , क्योंकि उस दिन हम वहां नहीं थे , जहाँ पिछले तीन महीने से रह रहे थे , अपनी घुमक्कड़ी की जिन्दगी में- हम ट्रेन में थे , दिल्ली से मुंबई की ओर .

तो यह कहानी ट्रेन में कही गई कहानी है . मैं कई बार अपने श्रोताओं को बता चुका हूँ कि कहानी और खर्राटे मुझे अपनी नानी से विरासत में मिले हैं. तो क्या नानी ने भी मेरे साथ यूं ही सफ़र किया होता तो मुझे ऐसे ही कहानी सुनाई होती ! नानी मायके और ससुराल छोड़कर कहीं गई नहीं . और उस  वक्त, ट्रेन में , वह जो मेरे साथ थी , उसे मैं नानू कहता हूँ , नानी जितना ही प्यार है उससे मुझे . नानी की कहानियों में प्यार के कितने किस्से होते थे – एक कहानी की नायिका विवाहित ‘रानी सारंगा’  अपने प्रेमी से मिलने न जाने कितने जतन और कितनी वेश भूषाओं में जाती थी.  उस दिन मेरी कहानी की पात्र ‘रानी सारंगा’ थी भी और नहीं भी थी , क्योंकि मूलतः यह रूमी की कहानी है – रूमी यानी रानी सारंगा- खूबसूरत और आकर्षक व्यक्तिव की धनी , शिवानी की नायिकाओं से कम नहीं !

अथ श्री सारंगा  कथा

नानू की हुंकारियो के बीच मैंने कहानी की डोर थाम ली….

उस रात न जाने क्या हुआ , जुकरबर्ग की कृपा हुई या कोई जादू – अचनाक फेसबुक -लोक के अन्तःपुरों में वह विचरने लगा – तब रात के १२ बजे थे, न जाने कितने इनबॉक्स उसके सामने खुलने लगे – उसने तुलसीदास के रामचरित मानस में हनुमान का लंका प्रवेश ‘ रामयानी आचार्य’ से सुन रखा था – ‘ब्रह्मचारी हनुमान’ के सामने लंका का रनिवास, शयनकक्ष में तांक -झाँक सा कुछ , निजी का अतिक्रमण – सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥ आधी रात को कोई इनबॉक्स साहित्य की चर्चा में मशगूल था , कोई प्रेम  कविता का आदान -प्रदान कर रहा था , कोई भविष्य की योजनाओं के खांके बना रहा था तो कोई यू ट्यूब से गाने भेजे जा रहा था।

वह चौका , मिल गई वैदेही – साफ़ इनबॉक्स वाली वैदेही – उसने सोचा क्या सचमुच अशोक वाटिका की वैदेही का इनबॉक्स इतना ही साफ़ था ! वह दुबारा चौका , ‘ अरे यह तो रूमी का इनबॉक्स है , इसके इनबॉक्स से मेरे मेसेज कहाँ गायब है – ‘ओह ! मिटा देती होगी !’ तभी रूमी की बत्ती हरी हो गई और थोड़ी ही देर में मैसेजेज से इनबॉक्स भर गया – सारे संवाद उसके सामने थे , इधर से वह रो रही थी , लेकिन आंसू उसके लिए नहीं थे , उसके आंसूओं , उसके सारे शब्दों और हाँ कविताओं को भी उसके के अलावा कोई और मिल गया था – मोहित घबड़ाकर इनबॉक्स से बाहर निकला!

उन दिनों फेसबुक पर भांति- भांति के शिकारी और प्रेमी जन भी विचरते थे- उनकी उम्र की कोइ सीमा नहीं थी , १६ -१७ वर्ष के लड़के से लेकर ७० वर्ष के बुजुर्ग तक , पेशा कोई भी , लेखक , पत्रकार , शिक्षक , ठेकदार कोई भी. वे महिलाओं का प्रोफाईल देखते , स्टेटस पढ़ते , फेसबुक पर विचरने का उनका समय देखते और इनबॉक्स में दिल हथेली पर लिये उपस्थित होते. कम उम्र के लड़के अपनी माँ की उम्र की महिलाओं के इनबॉक्स में हाय –हैलो से शुरू होकर मरने –मिटने लगते, मोबाइल नंबर  तक पहुंचते और फिर …. कुछ की कहानी आगे बढ़ती वन डे या वन नाइट स्टैंड तक, तो कई बार वे झिडकियां भी खा जाते, ब्लाक हो जाते. तरीका भी मजेदार, कई अपने पिछले प्रेम में धोखा खाने , प्रेम टूट जाने की कथा के साथ उपस्थित होते तो कई अपने एक अदद दोस्त की तलाश लिए. लेखक किस्म के प्राणियों की कल्पनाशीलता तो और उफान पर थी , वे भी हर उम्र में विचरण करते , बुजुर्ग लेखक अपनी बेटी की उम्र की लड़कियों की ओर भी – इनबॉक्स में मच्छर से भी इर्ष्या करते, जो उनके अनुसार इतना खुशनसीब होता कि उन लड़कियों के जिस्म को जहां मन वहां छू सकता था- काट सकता था.

रूमी के इनबॉक्स में भी लोग यूं ही टपकते थे , उसके बेटे के उम्र के प्रेमी भी . वह कुछ दिन तो उनसे उनके मनोविज्ञान को समझने के लिए बातचीत करती, फोन नंबर का आदान –प्रदान भी कर लेती और फिर उनके उम्र के हवाले से उन्हें समझा जाती. रूमी का प्रोफाइल भी कम भ्रम पैदा करने वाला नहीं था और कभी –कभी उसके स्टेट्स शुभानाल्लाह – एक अकेली , उदास , दोस्ती के लिए समर्पित, विवाहित स्त्री के स्टेटस होते ! फैज , खुसरो की पंक्तियाँ मुहब्बत के रंग बिखेरते वहां, या फिर उसकी कवितायें और तस्वीरें— इनबॉक्स में वह भी कम विचरण नहीं करती थी, पर एक सीमा तक.

लेकिन इस बार !  इस बार तो वह सचमुच घायल थी ….  उसके सपनों को एक और ठौर मिल गया था फर्नांडिस – उसकी कविता और प्रेम का का एक नया पड़ाव !!  जुकरबर्ग के अंतःलोक में विचरते हुए मोहित  को इसी सच का पता चला था और वह बेचैन हो गया, घंटों रोता रहा यह याद करते हुए कि उन पलों में ,उन घंटों में और उन अवसरों पर सारंग उसके साथ कैसे पेश आ रही थी , जब वह इस नए प्रेम में बह रही थी – तब उसे वह कुछ ज्यादा ही दुलारने लगी थी, अतिरिक्त प्यार !

मोहित की आँखों के सामने फ्लैश बैक में रीलें घूमने लगीं . शादी –शुदा रूमी उसे तब मिली थी, जब वह अपनी उम्र के ४५वें पड़ाव पर पहुँच चुकी थी, २० साल की एक लड़की मां हो चुकी थी. मोहित को भी फेरे लिये 5-6  साल गुजर चुके थे और वह भी एक पिता और पति की भूमिका में सफल वैवाहिक जीवन जीते हुए उम्र के ३४ वे पड़ाव तक पहुँच चुका था. पिछले ५ साल से सामाजिक मुद्दों पर काम करते हुए वे एक दूसरे को जानते थे , उन्हें एक दूसरे का साथ पसंद आने लगा था – गप्पें करना , निरुद्देश्य घूमना , काम के अलावा एक –दूसरे का साथ इस या उस बहाने खोजना,  उनके रूटीन में शामिल हो गया था. रूमी कवितायें लिखती थी , जिसका पहला श्रोता मोहित होता. लेकिन यह प्यार जैसा कुछ है , दोनो ही यह मानने को तैयार नहीं थे , दोनो अपनी –अपनी शादीशुदा जिन्दगी में खुश भी थे.

ऐसा भी नहीं था कि यह रूमी  के जीवन का पहला प्रेम था . इसके पहले भी आये थे सारंगा  यानी रूमी के जीवन में कई –कई सदाबृज – इसके पहले कि जब वह कालेज की पढाई करते हुए शीतांशु से मुहब्बत और फिर शादी न कर बैठी.  स्कूल से भाग –भाग कर किशोर होते सारंगा  और सदाबृज पास के बागीचे में एक दूसरे की आँखों में डूब जाते थे.

सातवीं में पढ़ती रूमी यानी सारंगा के जीवन में पहला सदाबृज आया. इस पहले प्रेम के बाद फिर नवमी में, १२ वीं में और ग्रैजुएशन करते हुए शीतांशु के सदाबृज होने तक घर वालों ने जुमला बना लिया था – रूमी अपने नाना पर गई है – प्रेम में अपादमस्तक डूबी हुई. शीतांशु से प्रेम, विवाह, बच्चे , घर गृहस्थी और सामाजिक –कार्यों में उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर दिन –रात को एक करने के बीच उसे पता ही नहीं चला कि कब उसके जीवन का यह चुनाव एक रूटीन में तब्दील हो चुका था – दोनो एक दूसरे को गढ़ते हुए , एक दूसरे की जरूरत होते गये, दोनों ने एक –दूसरे को इतना प्यार किया कि उम्र के चौथे दशक तक आते –आते यह प्यार एक रूटीन बन चुका था . उम्र के चौथे दशक में मोहित के आने के बाद रूमी ने पीछे मुड़ कर देखा तो उसे कई –कई आँखों में अपने लिए चाह , स्नेह , प्रशंसा और मर मिटने की ख्वाहिश याद आई. शीतांशु के साथ होते हुए उन आँखों को रूमी नजरअंदाज करती रही , लेकिन मोहित की आँखों में वे आंखें हजार –हजार हो गईं – रूमी , खिल –खिल गई , विवाह के बाद , उम्र के चौथे दशक में उसे एक और सदाबृज मिल गया. रूमी के भीतर की सारंगा  मोहित के साथ अतीत के सारे सदाबृजों की आकांक्षाओं , प्यार , स्नेह , वासना और मुहब्बत को जीने के उमंग से भर गई.

इनबॉक्स में अंकुराया प्रेम

रूमी और मोहित सामाजिक –साहित्यिक गतिविधियों में एक दूसरे से अक्सर मिलते ही थे , पार्कों में , घर पर या किसी रेस्तरां में एक दूसरे के साथ घंटों बैठते , बातें  करते – बातों का क्या , कभी ख़त्म न होने वाली बातों का सिलसिला जारी रहता , साहित्य , राजानीति,  प्रेम , स्त्री जीवन के संघर्ष तो कभी साहित्य के अवांतर प्रसंग – लेकिन दिल है कि मानता नहीं !

वे फेसबुक पर भी सक्रिय थे ! बात उन्हीं दिनों की है , जब सुनंदा और शशि थरूर के प्रेम के किस्से , लैला –मजनू प्रेम- कहानी को पीछे छोड़ रहे थे, भारत के होने वाले प्रधानमंत्री का ‘ ५० करोड़ की प्रेमिका’ वाला जुमला सबकी जुबान पर था, मोहित और रूमी फेसबुक पर भी एक दूसरे से बातचीत का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते थे .  बातों के अलग –अलग डीटेल थे.  लेकिन इन दिनों वे सुनंदा –शशि के प्रेम से शुरू होकर विवाहेत्तर प्रेम और ‘ देह प्रसंगों’ पर  ज्यादा मुखातिब होते. रूमी अपनी कई सहेलियों की भी कहानियां सुनाती , किसने किसे बुलाकर उम्मीदों और हसरतों के साथ ‘जनाब’ को विदा कर दिया , तो कौन अधेड़ उम्र में ‘मेरा नाम जोकर के ऋषिकपूर ’ को पागल किये जा रही है तो कौन वन नाईट स्टैंड में यकीन रखती है और कौन नहीं :

‘ मैं भी अब मानने लगी हूँ मोहित कि प्रेम में देह को अलग नहीं रखा जा सकता , जिससे आप प्रेम करते हैं , उसके साथ दैहिक होना भी प्रेम का ही हिस्सा है .’

‘ तो क्या आपको नहीं लगता कि आपके किस्सों की आपकी सहेलियां विवाहित जीवन में किसी के साथ धोखा भी कर रही हैं .’

‘ हिन्दुस्तान में यदि कोई विवाहित स्त्री प्यार में पड़ेगी तो उसे अपने पति को धोखा देना ही होगा , वह सबकुछ उसे बता नहीं सकती , अपने लिए प्राप्त सुरक्षा घेरे को वह क्योंकर छोड़ना चाहेगी  भला .’

‘ और पुरुष ?’

‘ वह तो धोखा देने को अभ्यस्त होता है , उसके लिए यह धोखा किसी सुरक्षा या मर्यादा के सवाल से ज्यादा उसकी फितरत में शामिल अनिवार्य हिस्सा है . वह विवाह के बाहर जाते हुए बहुत उधेड़ –बुन की स्थिति में नहीं होता . वन नाईट स्टैंड पुरुषों के लिए खेल या रोमांच का विषय होता रहा है , जबकि इस खेल और रोमांच के भाव में वन नाईट स्टैंड तक आने में अभी भी स्त्रियों को वक्त लगेगा .’

‘ लेकिन अब तो स्त्रियों की नई पीढी इसमें कोई कुंठा नहीं देखती’

कभी –कभी बातों में एक –दूसरे को समझने की कोशिश करते .

‘ क्या तुम्हें उम्र का अहसास हो चला है रूमी’

‘ नहीं मैं उम्र के हर कतरे को संजीदगी से जीने में यकीन करती हूँ , बीतते उम्र का कोई मलाल नहीं है मुझे.’

‘ लेकिन मुझे तुम्हारी बातों से ऐसा लगता है कि अपने पीछे छूट चुके युवा दिनों को बार –बार जीना चाह रही हो , तुम एक साथ पीछे के अपने कई उम्र –पडावों में जी रही हो.’

‘ और तुम्हें क्या लगता है , तुम पुरुषों को बीतते उम्र की कसक नहीं होती.’

‘ होती है , रूमी , मुझे भी है,  इसलिए ही तो पूछ रहा हूँ तुमसे कि क्या तुम भी उम्र बीतने के अहसास में जीती हो ! ’

रूमी ने इन्हीं बातचीत के क्रम में यह भी बताया था कि कैसे वह अपनी हमउम्र सहेलियों के साथ घूमती है तो उसकी कई सहेलियां युवा होते किशोर लड़कों को अपनी अदा से लुभाने की कोशिश करती हैं . अपने ऊपर दीवानी आँखों में उन्हें सुकून मिलता है.

और एक शाम …… ! उस शाम दोनो एक दूसरे की आँखों में देखते हुए मौन बैठे थे, पास में धीमा संगीत चल रहा था – ‘अभी न जाओ छोड़कर, दिल अभी भरा नहीं’ – मौन मोहित की आँखों में देखती हुई अचानक  रूमी ने कहा – ‘ मोहित क्या तुम्हें नहीं लगता कि हम दोस्त से ज्यादा एक दूसरे के लिए जरूरी हो गये हैं ?’ मोहित की आँखें फ़ैल गईं लेकिन वह चुप बैठा रहा .

 रूमी उसके पास आ गई.  ‘ क्या हम एक दूसरे को चाहने लगे हैं मोहित !’

‘ मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या कुछ ही देर में मैं भी ऐसा ही कुछ कहने वाला था या नहीं.’

मोहित ने उसके हाथ अपने हाथों में लेते हुए हथेलियों को सहलाना शुरू किया , रूमी की आँखें बह चलीं, उसे लगा कि कुछ भंग हो गया उसके जीवन में , कुछ पिघला . मोहित ने उसके गालों पर ढलक आये आंसुओं को अपनी हथेलियों में कैद` सोख लेना चाहा. पता ही नहीं चला कब रूमी ने पास के कमरे में बेड के सामने लगे आईने में मोहित के कंधो पर टिके अपने चहरे के सुकून को देखा. दूसरी बार आईने में अपने को पूरी हडबडाहट में देखा कपडे समेटते हुए, शीतांशु और उसकी बेटी आने ही वाले थे . मोहित बेड पर ही लेटे –लेटे अभी थोड़ी देर पहले के उसके सुकून और फिर हडबडाहट को निहारे जा रहा था , रूमी ने उसकी पलकों पर चूमा , कहा, ‘ कपड़े पहन लो’ और वह खुद कपडे समेटते हुए बाथरूम में चली गई.

मोहित और रूमी अब ज्यादा सावधान रहने लगे ,वे इस रिश्ते को शीतांशु पर जाहिर होने देने से बच रहे थे और मोहित की पत्नी पर भी- रूमी अपने इस हासिल को किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. ‘ रूमी कहती हम दोनो दोस्ती से आगे बढ़ते तो गये हैं मोहित, लेकिन मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती – हम उम्र भर एक –दूसरे के दोस्त बने रहें – एक दूसरे के सुख- दुःख के साथी. लेकिन कहाँ छुपता है प्यार !  शीतांशु को लगने लगा था कि कुछ ख़ास है रूमी और मोहित के बीच , उस ख़ास को वह कोई नाम देकर समझ नहीं पा रहा था, इसलिए वह इस रिश्ते पर ज्यादा सवाल करने से बचता , निगाहें जरूर तेज कर ली थी उसने , जिसे रूमी को अहसास था .

इधर रूमी और मोहित ज्यादा से ज्यादा मिलने की कोशिश करते . अलग होते ही कोशिश होती कि वे ऑनलाइन हों और एक दूसरे को फेसबुक की हरी बत्तियों के बीच तलाशते. देर रात तक बातें. वक्त बीतने के साथ रूमी ज्यादा से ज्यादा समय फेसबुक पर बिताने लगी . अब तो वह अपनी हर बात , हर खुशी और गम दुनिया को बता देना चाहती थी. मोहित को रूमी और शीतांशु के बीच आये तनाव का पता था. उधर रूमी अपने फेसबुक स्टेटस में उस तनाव के जाहिर होने से कतई परहेज नहीं करती .

उन दिनों मीडिया में सुनंदा –शशि –मेहर के किस्से छाये थे. सुनंदा और पाकिस्तानी पत्रकार मेहर में ट्वीटर युद्ध चल रहा था. लोगों के पास किस्सों और कल्पना के स्पेस ही स्पेस थे. रूमी और मोहित भी इस रोमांस त्रिकोण पर क्यों भला चुप रहते ! उनके इनबॉक्स में भी प्रेम –त्रिकोण, विवाह ,विवाहेत्तर, धोखा, विश्वासघात जैसे शब्द बिखरे पड़े थे :

‘ हम प्रेम और संबंधों के उस दौर से गुजर रहे हैं , जिससे यूरोप सात –आठ दशक पहले गुजर चुका है . वहां भी इतनी ही टूटन , इतने ही किस्से और इतने ही बिखराव से गुजरे हैं संबंध.’ मोहित था

‘ लेकिन यह स्त्री के अपने स्वायत्त निर्णय के पहले चरण के अनिवार्य परिणाम भर हैं. फिर रिश्तों का लोकतंत्र एक हकीकत बन जाता है.’ रूमी का जवाब

जिस दिन सुनंदा की मौत की खबर टी वी चैनलों के प्राइम टाइम पर छा गई थी , उस रात मोहित ने लिखा : ‘ हम आज भी रिश्तों के लोकतंत्र को विकसित नहीं कर पाये हैं.’ रूमी ने भी लिखा , ‘ आज भी हम रिश्तों में ह्त्या और आत्महत्या के सामंती सिलसिलों को ज़िंदा रख रहे हैं.’

फेसबुक के इन दो स्टेटस के चंद मिनट बाद ही  मोहित के आगे इनबॉक्स के पन्ने खुलते चले गये, जब उसने रूमी के इनबॉक्स के संवादों को देखा , जो आते और जल्दी –जल्दी गायब हो जाते . उसकी आँखों के आगे अन्धेरा सा छा गया .

अभी –अभी वे एक साहत्यिक गोष्ठी से वापस आये थे , यानी रूमी और मोहित . वहीं मिला था वह फर्नांडिस से.  रूमी के हर शब्द उसे नश्तर की तरह चुभ रहे थे. इनबॉक्स से गुजरते हुए गोष्ठी में बीते दो दिन –दो रात का हर पल कौंध गया था. उसे याद आया कि एक ही होटल में ठहरे फर्नांडिस  के कमरे से निकलते रूमी की आँखें मोहित से टकराई तो वह अचानक से सफाई की मुद्रा में आ गई , ‘ मैं सर दर्द की दवा लेने गई थी , उसके पास है .’ फिर वह मोहित को अपने कमरे में खींच कर ले गई और उसके होठों पर दो चुम्बन जड़ दिए थे उसने .

रूमी ने अहसास दिया था कि गोवा में रहने वाले इस नए शख्स से, जो  कविता में हाथ आजमा रहा है , अच्छा गाता भी है, पहली बार वह इसी गोष्ठी में मिली थी. लेकिन यहाँ तो इनबॉक्स में फेसबुक परिचय के कई महीने बताये जा रहे थे .

 इनबॉक्स के शब्द उभरे :

‘ और मोहित मोहित तो आप पर लट्टू हुआ जा रहा था साथी.’

इधर से रूमी का जवाब ‘ हाँ जनाब , वह भी आपका एक कॉम्पीटीटर है सक्सेना की तरह’

सक्सेना यानी एक साहित्यिक पत्रिका का संपादक. मोहित के लिए यह एक झन्नाटेदार तमाचा था , ‘कॉम्पीटीटर !’

वह आपा खो बैठा . उसने रूमी को मेसेज किया ‘ क्या कर रही हो’

                                        कोई जवाब नहीं .

                                         ‘ कहाँ बत्ती ऑन है’

                                          ………..

                                       ‘ फर्नांडिस से बात हो रही है क्या.’

                                       ‘ नहीं यार कविता लिख रही थी , फेसबुक बस यूं ही ऑन कर रखा है’

                                       ‘ रूमी झूठ मत बोलो’ , वह बिफर पडा .

                                       ‘ झूठ क्यों बोलूंगी तुमसे भला.’

                                       ‘ झूठ बोल रही हो, सच –सच बताओ , तुम्हें उससे से प्यार हो गया है.’

                                       ‘ तुम मेरे मालिक की तरह व्यवहार कर रहे हो’

                                       ‘ एक साथ कितने झूठ खड़ी करोगी यार’

                                       ‘ कल मिलो 11 बजे घर पर , तुम्हें गलतफहमी हो गयी है .

दूसरे दिन रूमी के घर पहुंचते ही मोहित तड़प उठा , ‘ क्यों –क्यों रूमी , क्यों कर रही हो तुम यह सब, तुमने एक बार कहा होता तो मैं तुम्हारे रास्ते से हट जाता.

रूमी की भावमुद्रा कठोर थी,  ‘तुम पजेसिव हो रहे हो.’

‘ मुझे उसी समय सब फरेब सा लगा था, जब तुमने उसके कमरे से निकलकर के मुझे चूमा था.’

‘ मैंने क्या पहली बार कोई अपराध किया था.’

‘ हाँ, पहली बार तुम्हारे उन चुम्बनों के साथ मुझे तुम्हारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व भरभरा कर गिरते दिखा था, क्यों, क्यों किया तुमने यह सब रूमी….’ वह फफक पडा.

“ मोहित वह तुम्हीं हो , जिसके पास मुझे पनाह मिलती है , लेकिन क्या करूं मुझे तुम्हारे अलावा कोई और भी पसंद है तो ! मैं ऐसी ही हूँ मोहित  , मुझे यूं ही स्वीकार करो,’’ रूमी ने उसके रोते चहरे को अपनी हथेलियों से थामते हुए कहा .

‘किसी मर्द को उसकी प्रेमिका से यह सुनना कि उसके ( मर्द के ) कई कॉम्पीटिटर हैं , जिनमें से प्रेम वह सिर्फ उसी को करती है , मर्द को एक गहरे सुख और उन्माद से भर देता है. तुमने मुझे भी उसके सामने उसका एक कॉम्पीटिटर ही पेश किया है, ‘ बस एक बार उसे सच बता दो कि मैं किसी का ‘कॉम्पीटीटर’ नहीं , तुम्हारे प्रेम का पात्र रहा हूँ , बल्कि हूँ , तुम्हारे अनुसार जहां तुम्हें पनाह मिलती है , फिर देखो जन्नत की हकीकत.’  लेकिन मोहित को तब तक यह पता नहीं था, रूमी के कान बंद हो चुके थे तब तक , तब तक वह अन्ना कैरेनिना और इजाडोरा डंकन से होड़ ले रही थी. रूमी  मोहित की भी तो ऐसे ही हुई थी – अपने पति शीतांशु को मुहब्बत करते हुए मोहित की मुहब्बत में पगती गई.

दूसरे दिन फेसबुक पर रूमी ने अपना स्टेटस लिखा.

मैं बहुत से ऐसे प्रगतिशील मित्रों को जानती हूँ , जो अपनी पत्नी या महिला मित्र के व्यक्तित्व के स्वयं आकार लेने के पूर्व तक तो स्त्रीवादी बने रहते हैं , लेकिन जैसे ही वह अपने निर्णय लेने लगती है , हाँ प्रेम के निर्णय भी तो , वे उसके हितैषी अभिभावक की तरह प्रकट होते हैं .

मोहित ने जवाबी स्टेट्स लिखा

भारत में सिमोन, अन्ना कैरेनीना , इजाडोरा डंकन से होड़ लेती स्त्रियाँ पति और विवाह का सुरक्षित घेरा क्यों चाहती हैं ! प्रेम करना साहस की मांग भी करता है . आत्मनिर्भर स्त्रियाँ यदि विवाह से बाहर प्रेम कर रही हैं तो उन्हें इसे स्वीकार करने का साहस रखना चाहिए, स्त्री होने की रियायत लेकर वे वही नहीं कर सकती जिसके लिए वे पुरुष को बेवफा , स्त्री उत्पीड़क या धोखेबाज कहती हैं . स्वीकार के साहस के साथ जिन्दगी की जोखिम उठाने का उत्साह रखने वाली स्त्री ही सिमोन, अन्ना कैरेनीना और इजाडोरा डंकन हो सकती है – चाहे वह यूरोप में हो या भारत में !

केतबर होयब बदनाम हो

प्रेम तो रूमी को नाना से विरासत में मिला था , वह कहाँ ठहरने वाली थी , वह निकल चुकी थी एक निश्चित राह पर – न उम्र की सीमा , न जन्म का बंधन . नानी की कहानी के सदावृज का पिता दुनियादारी समझता था , नीची माने जाने वाली जाति के सदावृज की मुहब्बत गाँव के दबंग ऊंची जाति की विवाहित  लडकी से…… तौबा , तौबा !

बदनामी का यह भय रूमी को भी सताता है , तब भी जब वह मोहित के प्रेम में पगी और अब भी जब फर्नांडिस उसके सपनों में शामिल हो गया है. भीतर से बदनामी का भय और शीतांशु की नाराजगी का भय उसे बार –बार आतंकित कर रहा था. वह जानती थी कि शीतांशु ही वह शख्स है , जिससे वह सबसे ज्यादा मुहब्बत करती है , लेकिन मोहित और अब यह नया प्रेम , यह भी कोई बेईमान अनुभूति नहीं है. वह शीतांशु को खोना नहीं चाहती थी और नये मुहब्बत को जीना भी चाहती थी. इधर मोहित भी उससे छूट रहा था , वह रस्सी संतुलन के खेल में उलझने लगी. फर्नांडीज से वह रात के सन्नाटे में मिलती, काफी देर तक ऑनलाइन चैट और फिर फोन पर बातों का अंतहीन सिलसिला . मिलन की आकांक्षा भी होती . लेकिन इस मिलन पर अब दो नहीं चार आँखों का पहरा था , चार आँखों से डर – दो शीतांशु की आँखें , जो उसके भीतर से भी झांकती थीं , उसे सचेत करती थीं और दो मोहित की आँखें , जो उसे बेवफा होने का अहसास देना चाहती थीं .

इस नए प्रेम में रूमी बिछ जाना चाहती थी. वह फिर से ग्रैजुएशन के दिनों की रूमी हो चली थी. मोहित सच ही कहता था , रूमी अपने युवा दिनों में ही ठहरी हुई थी. उसे बीतते उम्र का अहसास  हो रहा था, कहीं गहरे भीतर , जिसे वह स्वीकारती नहीं थी . घर गृहस्थी और बेटी के साथ जीती रूमी को पता ही नहीं चला कि कब वह उम्र के पांचवे दशक में पहुँचने लगी थी , वह फिर से अपने कालेज के दिनों के शीतांशु के साथ जीना चाहती थी , शीतांशु बदल चुका था दुनियादारी ने उसके कानों के पास के बालों के साथ –साथ उसे भी पका डाला था . रूमी को मोहित मिला और अब फर्नांडिस .

रूमी भी अपने फर्नांडिस से मिलने में सावधानी बरतती फेसबुक के चैटबॉक्स को साफ़ करना नहीं भूलती , देर रात के फोन काल के रिकार्ड मिटा देती , दूसरे शहरों के रेस्तरां , होटल और सिनेमा घरों के बिल , जो उसके और फर्नांडीज के मिलन के प्रमाण थे , अपने शहर की सीमा के बाहर ही दफना देती – उस पर चार निगाहों का पहरा था , और रूमी फर्नांडिस के साथ चौकन्ना थी . लेकिन कबतक !

रूमी के जीवन में  अचानक तूफान दाखिल हुआ- सबकुछ उड़ा ले जाने वाला-सुनामी :

वह बैठी गप्प कर रही थी उससे , आज छुट्टी थी – शीतांशु सुबह से ही पी रहा था .

‘शीतांशु –शीतांशु देखो न कितनी सुंदर पंक्तियाँ हैं उसकी कविता के ..’

‘ तड़ाक’, शीतांशु अब शीतू नहीं था और रूमी का चेहरा अब लाल तवे से तप रहा था –गुस्से और अपमान से लाल .’

वह उसी वक्त उसी हालत में घर छोड़ कर निकल गई , पीछे से आवाज आती रही , ‘ जाओ –जाओ यार खड़ा है बाहर .’ सबकुछ अप्रत्याशित था .

रूमी घंटों सड़क पर भटकती रही , हताश , निराश ….. यह कैसे हो गया . शीतांशु तो ऐसा नहीं था?  तो क्या शीतांशु ऐसा ही था , शेष सब ओढा हुआ आवरण . उसके साथ रहते हुए भी २५ साल हो गए थे . उनकी बेटी भी अब २० साल की हो गई है , पुणे में कोर्स कर रही है .

वह हताश घूमती रही .उसके सामने पिछले कुछ दिन-कुछ साल रील की तरह थे. शीतांशु ने कभी उसके सामने कोई पाबंदी नहीं लगाई . उसके व्यवहार में कभी पतियों वाली कोई बात नहीं थी . रूमी का जीवन सार्वजनिक था , दर्जनों पुरुष दोस्त थे उसके , उनके साथ घूमना , खाना –पीना –शीतांशु को कभी कोई परेशानी नहीं हुई . दोनो छात्र जीवन से ही सक्रिय भी थे , शीतांशु हीरो था- युवाओं के बीच अपना सुनहरा करिअर छोड़ कर पार्टी में होलटाइमर हो गया . अब भी लड़ने –भीड़ने वाले संगठन में ही काम करता था , पर्यावरण के मुद्दे पर एक लड़ाकू एन जी ओ में  . उसी ने रूमी को एक हद तक आज की रूमी बनाया . आज भी महिला संगठनो में वह जाना –पहचाना नाम है और उतना ही जाना –पहचाना नाम साहित्य का. उसके शीतू का यह अप्रत्याशित व्यवहार !

उसे लग रहा था कि वह शीतांशु को फर्नांडिस के बारे में बता कर उसके प्रति सहज कर लिया है . यह रूमी के द्वारा मोहित और शीतांशु के बीच बनाई गई सहजता ही थी कि वह उनके रिश्तों पर यकीन के साथ शक नहीं कर पा रहा था- अपने इन मित्रों के प्रति शीताशु को सहज करने में उसे काफी मशक्कत भी करनी पड़ती थी. लेकिन आज ! आज तो शीतांशु आक्रामक था .

‘ यदि मुझे भी किसी से इश्क हो जाये तो ,’ उसने पूछ था एक बार शीतांशु से. उसने छूटते ही कहा , ‘ मुझे गर्व होगा की मेरी रूमी के आशिकों की कमी नहीं है.’

‘तुम्हें बर्दाश्त नहीं होगा शीतू , तुम्हारे भीतर का पुरुष उसे बर्दाश्त ही नहीं कर पायेगा. इसीलिए स्त्रियाँ अपने प्यार को छिपा ले जाती हैं .’

‘पर छिपता कहाँ है !’ शीतांशु ने उसे रानी की कहानी सुनाई . एक अमरफल रानी को राजा ने दिया , राजा उसे बे इन्तिहाँ प्यार करता था . रानी को मंत्री से प्यार था , मंत्री को वेश्या से और वेश्या को राजा से . सबने अपने –अपने प्रेमी को अमरफल खिलाना चाहा . अंततः  वह फल राजा के पास ही पहुँच गया . सारी कहानी राजा के सामने थी –रानी का सच उसके सामने नंगा था . रानी को सजा हुई , मौत की सजा. स्त्रियों का प्यार छिप नहीं पाता’

रूमी ने छिपाया भी तो नहीं  कुछ . इसके पहले भी अपनी ओर आशिक निगाहों की चर्चा वह शीतांशु से करती और आशिकों की बेचारगी पर हंसती थी, लेकिन इन दिनों मोहित और फर्नांडिस के बारे में कुछ भी बताने से वह परहेज जरूर कर गई थी .

घंटों घूमने के बाद रूमी दरवाजे पर खड़ी थी . कई बार काल –बेल बजाने के बाद दरवाजा नशे में धुत्त शीतांशु ने खोला . शीतांशु ने कहा , ‘आ गईं महारानी .’ वह सीधे बेडरूम में चली गई और पेट के बल निढाल गिर गई . पीछे से शीतांशु भी आया . और उसके बगल में लेट गया , बडबडाता रहा .

थोड़ी देर बाद रूमी फ्रीज़ के पास गई ठंढा पानी लाने और वही ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी रही . उसे शीतांशु के सुबकने की आवाज आई . काफी देर तक आवाज आती रही , जो लगातार तेज होती जा रही थी . रूमी अब बर्दाश्त नहीं कर सकती थी , उसने जाकर शीतांशु का सर अपनी गोद में रखा और बाल सहलाने लगी . वह रोये जा रहा था और बोले जा रहा था , ‘ मुझमें क्या कमी है …! रोते –रोते उसके सर का दवाब बढ़ने लगा . उसने उसकी नाभियों के नीचे सर का दवाब बढाया . उसके दवाब का अहसास हिंसक था . और अगले ही पल उसने रूमी के कपडे फाड़ दिए . रूमी और उसकी आत्मा अगले आधे घंटे तक कुचलती रही . अपना मनमानापन कर लेने के बाद शीतांशु निढाल गिर गया . रूमी भुच्च नंगी वैसे ही बेसुध पड़ी रही .

सुबह शीतांशु चाय के प्याले के साथ उसे जगाने आया . दिन काफी चढ़ गया था . वह चुप्प रही . शीतांशु भी चुप्प था , उसका चेहरा शर्मिंदा भी था . चाय पीते हुए वह एक ही शब्द बोल पाया ‘सॉरी.’ और दफ्तर चला गया . रूमी बहुत देर तक किमकर्तव्य विमूढ़ बैठी रही . फिर उठी, बैग पैक किया और सीधे माँ के घर पहुंची . माँ को देखते ही भीतर दबी उसकी रुलाई बाहर आ गई , वह घुटनों के बल बैठ कर फूट –फूट कर रोती रही . माँ आवाक् ! जी भर कर रो लेने के बाद वह नहाने गयी और काफी देर तक नहाती रही –रात का सारा अहसास उतार फेंकना चाह रही थी . दफ्तर से शीतांशु का कई बार फोन और सॉरी के मेसेज थे . शाम को वह सीधे उसके माँ के घर ही पहुंचा , उसे अहसास था कि वह कहाँ होगी . आकर उससे वह घर चलने का जिद्द करता रहा , दूसरे दिन हास्टल से बेटी आने वाली थी .

‘उसे भी सबकुछ जान लेना चाहिए .’

‘ हाँ, लेकिन यह वक्त नहीं है , वह कुछ दिनों  के लिए आ रही है . मुझे वक्त दो फिर हम उसे सब बतायेंगे .’

 ‘ तुम्हें पता है , तुम्हारे भीतर हो रहे बदलाव को मैं हर पल महसूस कर रहा था रूमी, फिर भी मैं अपने शक पर यकीन नहीं करना चाहता था . पता नहीं क्या हुआ मैं तुम्हारा काल डीटेल निकलवा लाया था कई महीने पहले , मेरा शक और बढ़ गया था उसे देख कर . तुम पर फिर मेरी निगाहें रहने लगीं – मैं तुम्हारी प्राइवेसी भंग करने का दोषी हूँ रूमी . लेकिन मैं अभी तक समझ नहीं पा रहा हूँ कि ऐसा क्या किया मैंने कि तुम मुझसे छिप कर एक अलग राह पर निकल पड़ी- मैं अपने ऊपर तुम्हारा विशवास पैदा नहीं कर पाया, है न !

सारंगा अभी ज़िंदा है

रूमी और शीतांशु के जीवन में आई कड़वाहट को मोहित बहुत दिनों तक जान नहीं पाया था, वह तो रूमी से भरसक दूर होता चला गया था . बातचीत पूरी तरह बंद,  फेसबुक से भी वह डिएक्टिवेट हो गया. जब कभी किसी कार्यक्रम या गोष्ठी या धरना प्रदर्शन में वह उससे मिलता तो बहुत ठंढे रिस्पांस के साथ- न वह उसका निजी छेडता और न ही वह बताती . शीतांशु अपने किये पर शर्मिंदा तो था ही लेकिन वह यह गुत्थी नहीं सुलझा पा रहा था कि पूरी आजादी , प्यार और सम्मान देने के बावजूद उससे क्या छूट गया,  जो रूमी दूसरों के साथ हासिल करने निकल पडी. सारी कहानियों का अंत एक सा नहीं होता , नानी की सारंगा की कहानी तब घटती हुई बतायी जाती है , जब कहारों के कंधे पर डोलियों में दुल्हनें  ससुराल जाती थीं और खेतों को रेहट से पटाया जाता था. अब तो ज़माना बुलेट ट्रेन की बात कर रहा था , मन से पहले प्रेमिका अपने प्रेमी के पास सदेह पहुँचने की सुविधा जी रही थी. नानी की विवाहित सारंगा के प्रेमी की ह्त्या हो जाती है , सारंगा भी मारी जाती है – दोनो का हत्यारा पति . आज भी प्रेम में क़त्ल , सामूहिक क़त्ल की खबरें छपती रहती हैं . लेकिन सारंगा और शीतांशु के जीवन में सबकुछ कहानियों जैसा नहीं घटित हुआ .

सारंगा तो उस दिन मरती –जीती रही , जब शीतांशु का आक्रोश उसकी देह पर प्रकट हुआ था , वह अपमानित महसूस करती रही . यद्यपि वह अपने कृत्य पर बाद में ग्लानि महसूस करने लगा था  , लेकिन साथ रहते हुए कभी –कभी वह ताने भी दे जाता , कभी भी , हाँ कभी भी, अंतरंग क्षणों में भी – ‘ मैं तो तुम्हें उतना संतुष्ट नहीं कर पाता हूँ न , जितना मोहित और फर्नांडिस ने किया होगा? ’ रूमी तब बिना भाव के उसके चहरे पर अपनी नजरें टिकाये रखती. इधर मोहित , जिसे वह अपना सबसे अच्छा दोस्त समझती थी , अपनी सखा , वह भी तिलमिलाया  और उससे दूर होता चला गया , जब वह फर्नांडिस से भी प्रेम करने लगी थी. फर्नांडिस से भी वह अब नहीं मिल पाती थी , उसे डर लगता मोहित के आक्रोश भरे ताने  को याद कर – ‘ बस एक बार उसे सच बता दो कि मैं किसी का ‘कॉम्पीटीटर’ नहीं , तुम्हारे प्रेम का पात्र रहा हूँ , बल्कि हूँ , तुम्हारे अनुसार जहां तुम्हें पनाह मिलती है , फिर देखो जन्नत की हकीकत.’  कहीं फर्नांडीस भी मोहित और शीतांशु की तरह बौखला उठा तो ! तो वह अपना विश्वास खो देगी , उन दावों पर से, जो पुरुष को एक स्त्री के अन्तरंग सखा होने का विश्वास दिलाते हैं .

छुट्टियों में पुणे से आई बेटी वाणी ने माँ और पिता के बीच तनाव महसूस किया . उसने यह भी नोटिस किया कि मां और मोहित, जो पिछले कुछ सालों से ज्यादा अलग नहीं रह सकते थे , या तो दो –एक दिन पर मिल लेते या रोज सुबह –शाम रूटीन से एक दूसरे को फोन करते थे, आजकल एकदम बातचीत नहीं करते हैं . इन्हीं छुट्टियों में उसने एक –दो साहित्यिक –सामाजिक आयोजनों में मोहित और अपनी माँ को एक –दूसरे से बचते देखा. वह समझ रही थी मां इन दिनों वह नहीं रही, जो हुआ करती थी, हमेशा खुशदिल और बिंदास .

जल्द ही उसे माजरा समझ में आने लगा . वह आश्चर्यचकित और दुखी दोनो थी – जिन्हें वह बचपन से अपना आदर्श मानती आई थी , जिन्होंने परम्पराओं से हमेशा अलग लकीरें खींची , अंतरजातीय विवाह के उनके निर्णय से लेकर हर मामलों में उसने उन्हें प्रगतिशील आचरण करते देखा है , लेकिन आज वे अपने  ही प्रगतिशील विचारों से अलग आचरण कर रहे थे. वह सबसे अलग –अलग मिली . वह एक नये नाम फर्नांडिस से चौकी जरूर , लेकिन उसे मां का यह नया प्रेम भी स्वभाविक लगा- पूरी तरह फेसबुक से पैदा प्रेम.  वह अपने मित्रों से कहा करती थी , नये सोशल माध्यमों ने स्त्री के लिए आकाश खोल दिये हैं , बंद खिडकियों के बावजूद ताजा हवा उनके कमरों में प्रवेश कर चुका है – परिवारों की दीवारों में दरार ऐसे ही माध्यमों  के भूकंप से पैदा हुए हैं.

‘ बाबा, आप यहाँ भूल कर रहे हो मां यद्यपि तुमसे प्यार करती है , लेकिन उसे कोई और भी अच्छा लगा है तो स्वीकार करो, तुम्हीं तो कहा करते थे , जीवन एक ही मिला है,’ वाणी अपने पिता को बाबा ही कहती थी.

शीतांशु अपनी बेटी के सामने फूट –फूट कर रोया , ‘ क्या हमारे आदर्शों पर हमारा माहौल , हमारी परवरिश हावी होते हैं वाणी . मैं खुद भी वह आचरण नहीं करना चाहता , जो कर रहा हूँ. मुझे याद है मैंने अपनी माँ को बिखरते देखा है . तुम्हारी ही उम्र में मैं उससे आख़िरी बार मिला , जब वह मुझे छोड़ कर गई  , काश, पिता ने उसकी भावनाओं को समझा होता. क्या मैं अपने पिता की तरह ही आचरण तो नहीं कर रहा !’

‘ उसे जी लेने दो बाबा,’ वह अपने पिता को समझा पाई थी.

मोहित से भी मिली वह , ‘ पता है अंकल , माँ बिखर गई है , आपसे अलग होकर , उसे लगता था कि कोई तो है उसका सखा, जो उसे हर हाल में स्वीकार करता है , उसकी गलतियों के साथ भी. वह आपके लिए कृष्ण की द्रौपदी की तरह महसूस करती थी. उसने खुद को जीने और समझने की कोशिश ही तो की है न अंकल और आप उससे दूर हो गये, वह आज भी आपमें अपना दोस्त ढूंढ रही है.’

‘ वाणी , मैंने भी कभी उसे सामान्य से अलग पाया है , हमेशा अपनी शर्तों पर जीने वाली खुदमुख्तार, इसलिए वह जिद्दी भी है एक हद तक. लेकिन मैं बिफर पडा , जब उसने मुझे अपने अतिरिक्त प्यार से बहलाना चाहा , एक बार भी उसने मुझे कहा होता वाणी, शायद मैं दुखी तो जरूर होता , लेकिन उसकी छवि खंडित नहीं होती मेरे मन में, वह मुझे पजेसिव कहती रही , शायद यही उसका ढाल था , लेकिन एक बार भी मुझे समझने की कोशिश नहीं की उसने.’

‘ वह झूठ बोलती रही और मुझे सबकुछ पता था. होता यही है, स्त्रियों को अपना प्यार जीने के लिए झूठ रचने की विवशता होती है , लेकिन कम से कम रूमी को आम स्त्रियों से अलग होना था , हाँ , कम से कम मेरे मामले में. हालांकि उससे अलग होकर मैं उसे और शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ , मैं  इस स्वीकार भाव में हूँ कि मैं पजेसिव हुआ , लेकिन सिर्फ पजेसिव और मेल इगो में होने भर का मामला नहीं है यह, बस उसे सच का सामना करना चाहिए वाणी  ’

‘ और हाँ, एक बात और गहरे स्तर तक सालती रही मुझे , मैं तड़पता रहा हूँ . यहाँ कोई भी तड़प सकता है कोई भी –स्त्री या पुरुष, मुझे बहलाने की उसकी नाकाम कोशिश के बाद उसका आक्रामक रुख तक तो ठीक है , मुझे पजेसिव कहना भी,  लेकिन धीरे –धीरे मेरी उपेक्षा और मेरे लिये नियत समय का एकदम से कहीं और शिफ्ट हो जाना , मनोवैज्ञानिक रूप से मुझे बेधता गया – मैं बहुत मुश्किल से अचानक घिर आये अपने हीनता-बोध से उबरा हूँ. वह मुझे ‘अमृता –इमरोज’ की कहानी कहती थी, लेकिन वह तो निकल गई नये ‘इमरोज’ के साथ लेकिन क्या वह खुद अमृता हो सकी , हो पायेगी !’

वाणी को लगा सारी समस्या स्वीकार का है . पापा और अंकल जैसे लोग अपनी पीढी के प्रगतिशील लोग तो जरूर हैं , लेकिन उनकी अपनी ही कल्पना की मुक्त स्त्री, अपने जीवन को अपनी मर्जी से जीने को निकली स्त्री को वे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं और उधर माँ भी ‘स्वीकार’ का साहस नहीं बना पा रही है .

रूमी तो वाणी के सामने बच्ची बन गई, ‘ मैंने कोई गुनाह नहीं किया है मेरे बच्चे.’

‘ माँ मुझे भी नहीं लगता कि तुमने कोई गुनाह किया है , तुम बस खुद को जीने निकली हो , लेकिन इतना साहस तो पैदा करना होगा कि सारे सच तुम अपने पति और मित्रों पर जाहिर करो, शेष उनपर छोड़ दो , तुम्हें अपना जीवन जीना है और इसके लिए इन सबसे अलग जीने का हौसला भी रखना होगा. तुम रास्सी संतुलन के खेल में फंस गई हो !’

‘ हम जिस समाज में जीते हैं, वह प्रेम का स्वभावतः विरोधी है , झूठ और कुछ हद तक धोखा प्रेम में पगी स्त्री के लिए अनिवार्य पहलू हैं, अपने प्रेम की हिफाजत के लिए , चाहे वह विवाह पूर्व का प्रेम हो या विवाहेत्तर. पिता, भाई , पति और प्रेमी , कोई भी अपनी बेटी , बहन , पत्नी या प्रेमिका के प्रेम को सहजता से नहीं ले पाता है .’

‘ पर मां संयोग से तुम्हारा समाज वह नहीं है. तुम खापों के दायरे में नहीं जीती हो .’

वाणी की छुट्टियां ख़त्म होते –होते शीतांशु ने तय किया कि रूमी चाहे तो अपने प्यार को हासिल करने फर्नांडिस के साथ जा सकती है और चाहे तो वह उसका चुनाव कर सकती है , वह अपने किये पर शर्मिन्दा था और उसने इस बार रूमी को इसका अहसास भी दिला दिया था.

मोहित को भी लगाने लगा था कि यह रूमी का हक़ है कि वह किसे प्यार करे और कहाँ जाये.

ट्रेन सुबह मुम्बई पहुँचाने वाली थी, मुझे नींद आ रही थी , शायद कहानी सुनाते –सुनाते मैं खर्राटे लेने लगा था.

नानू ने पूछा,  ‘सो गये क्या, कहानी ख़त्म तो हुई नहीं.’

मैंने नींद में ही जवाब दिया , ‘ख़त्म तो हो गई और क्या है इस कहानी में.’

‘रूमी का निर्णय .’

‘कल चलो चलते हैं , मिलवा ही देते हैं उससे’ . नानूं इस प्रस्ताव पर खुश हो गई.

‘जुहू बीच’ पर मिले हम, रूमी ने अपनी बेटी को बुला लिया था. नानू बहुत खुश थी उससे मिलकर . रूमी बड़े बिंदास अंदाज में थी , खुश –खुश .

शायद कहानी का अंत जानने के लिए नानू ने उससे  पूछ ही लिया , ‘ शीतांशु नहीं आया ! ’

‘ मैं अब सबसे अलग रहती हूँ ,’ कह कर ठहाके लगाये उसने , वाणी भी मेरे साथ नहीं रहती. यह पुणे में ही  है , कभी –कभी चली आती है मिलने.

‘और फर्नांडिस !’, नानू कहानी का अंत जानने को बेताब थी.

इस बार वाणी मुसकुराई, ‘मां वहां भी अकेली ही रही.’

 फर्नांडिस न तो मोहित का सच पचाने को तैयार दिखा और न ही इसके लिए भी कि रूमी पूरी तरह अपने पति को छोड़ दे. फिर भी आई हुई रूमी को वह वापस जाने देना भी नहीं चाहता था. गोवा में ही अलग रहने का प्रस्ताव मिला रूमी को , जहाँ फर्नांडिस , यानी ‘रूमी का प्यार’ , जब चाहे उसके पास आता रहता .

चलते –चलते रूमी ने सूचित किया , ‘ फिर से प्यार में हूँ मैं , आशु वायलीन बढ़िया बजाता है ,’ और वह खिलखिला पड़ी, आँखों में आंसू भी थे – खुशी के शायद ! जाते –जाते उसने कहा कि फेसबुक पर मेरा अकाउंट आज भी है लेकिन कम ही समय निकाल पाती हूँ .

लौटते –लटते नानू ने मेरी आंखों में देखा और एक मौन सवाल उछाल दिया , ‘ कहीं मोहित तुम ही तो न थे !’

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