दो दिवसीय नाटक ‘माई’ (जिस लाहौर नहीं वेख्या …) का  सफलता पूर्वक मंचन …….. |

जिस लाहौर नई वेख्या ओ जन्म्या ई नई उर्फ़ माई…

शक्ति प्रकाश

कल मदार बंधुओं, हनीफ साहब, गनी साहब और सनीफ साहब के आमन्त्रण पर कालजयी नाटक देखने का अवसर मिला, सीमित संसाधन, सीमित स्थान, सीमित दर्शकों और मथुरा जैसी अपेक्षाकृत छोटी जगह पर ऐसे नाटकों का होना और उसका दर्शक बनना निश्चय सुखकर है.
पहले बात ‘उर्फ़’ की, असगर वजाहत साहब ने तो ‘जिस लाहौर नई वेख्या…’ ही लिखा था, तब इस बेहतरीन नाटक को माई के नाम से प्रस्तुत करना अपने कलाधर्म को समय की विवशता के साथ निभाना अधिक लगा, नाम बदलने के पीछे सीधा सन्देश जो मुझे लगा वह ये कि लेखक असगर, निर्देशक सनीफ़ ,उद्घोषक गनी, परदे के पीछे के व्यवस्थापक हनीफ और बात लाहौर की मने पाकिस्तान की, इस निर्बुद्धि काल में व्यवधान के लिए इतने फैक्टर काफी हैं।
इसलिए यहां स्पष्ट करना आवश्यक है कि ‘जिस  लाहौर नई वेख्या..’ का शाब्दिक अर्थ जो भी हो, निहितार्थ अपनी धरती से प्यार, अपनी जमीन से जुड़ाव है, इसमें हिन्दू मुसलमान का कोई भेद नहीं । लाहौर वाले को लाहौर प्यारा, लखनऊ वाले को लखनऊ ,भले ही आप बिना मर्जी  से खदेड़े भी गए हों। आप जब भी बात करेंगे अपने शहर का नाम लेते ही जो प्रेम और गर्व चेहरे पर झलकता है उसका नाम है जिस  लाहौर नई वेख्या…इसके अलावा ये बात है इंसानियत की, धर्म निरपेक्षता की (जो कि हर तरफ से होनी चाहिए, लेकिन नहीं हो रही) ऐसे में अल्पमत वाले लोगों को अपनी बात भी कहनी होती है और समय के चरित्र का भी ध्यान रखना होता है, क्या पता एक अच्छी कोशिश को कब राजनैतिक संकटों का सामना करना पड जाय. लेकिन ये कोशिशें होती रहनी चाहिए और लगातार होनी चाहिए यही समय के चरित्र से लड़ने का उपाय है.
जो भी हो प्रतिकूल परिस्थितियों सीमित संसाधनों के बावजूद एक अच्छी प्रस्तुति के लिए मदार बंधु बधाई के पात्र हैं.
बात कहानी की, हजारों मर्तबा खेले जा चुके इस नाटक की कहानी बताना या उसकी तारीफ करना कोई नई बात नहीं फिर भी आज़ादी के बाद हुए बंटवारे की पृष्ठभूमि वाली इस कहानी में इंसानियत और धार्मिक कट्टरता के बीच न खत्म होने वाला संघर्ष है, जिसमें जीत न किसी की होना थी न हुई लेकिन जो भुगता इंसानियत ने भुगता. मुख्य पात्र माई है जो लाहौर की एक हिन्दू बुजुर्ग महिला है, दंगों के बीच उसके परिवार का कोई अता पता नहीं, उसकी हवेली लखनऊ से विस्थापित मिर्जा साहब को अलॉट हो जाती है, शुरू में मिर्जा भी चाहते हैं कि बुढ़िया मर खप जाये और पूरी हवेली उन्हें मिल जाये लेकिन नेकदिल मिर्जा इस भावना को बहुत दिनों तक दिल में नहीं रख पाते |
माई का उनके साथ, उनके परिवार के साथ व्यवहार उन्हें भी माई को माँ मानने पर मजबूर कर देता है। मुहल्ले में कई और लोग भी हैं जो माई को सम्मान देते हैं, जिनमें  शायर काज़मी, हलीम चायवाला आदि हैं। लेकिन वहीं मुहल्ले में साम्प्रदायिक और लालची ताकतें भी एक पहलवान (शायद रज़ाक) और उसके चेले के रूप में हैं जिन्हें शक है कि बुढ़िया के पास खासा माल है, हवेली का वह हिस्सा तो है ही जिसमें माई रहती है, वे अपने चिर-परिचित हथियारों कुफ्र, काफिर, इस्लाम आदि से माई को मार कर कब्जा करना चाहते हैं, लेकिन मुहल्ले के नेकदिल लोग उनके सामने खड़े हो जाते हैं। कट्टर लोग धर्म की मुहर लगवाने के लिए मौलाना को शामिल करना चाहते हैं। लेकिन नेकदिल मौलाना भी माई के पक्ष में खड़ा हो जाता है, यहाँ कट्टरवादियों के हारने की खीज बड़ी ख़ूबसूरती से वजाहत साहब ने उकेरी है , जब पहलवान मौलाना से कहता है –
‘ मुझे सब पता है तेरा बाप बकरियाँ चराता था, मुहल्ले वालों ने तुझे चन्दा करके पढ़ाया था’
एक दिन माई मर जाती है, मुहल्ले वाले इकट्ठे होते हैं, इकलौती हिन्दू महिला का अंतिम संस्कार कैसे हो, इस पर विचार होता है क्योंकि न वहां श्मशान बचे हैं न हिन्दू रीति रिवाज के मानने वाले । मौलाना तय करते हैं कि शव को रावी के किनारे जलाया जाय और मुखाग्नि के लिए बड़े बेटे के रूप में मिर्जा का नाम पारित होता है। वहां एक सवाल ये भी होता है कि क्या शव यात्रा में ‘राम नाम सत्य है’ का भी उदघोष होगा तब मौलाना कहते हैं -‘ बिलकुल, माई हिन्दू थी’
शवयात्रा निकलती है, कट्टर लोग मन्तव्य में असफल रहने पर कमजोर हलीम चाय वाले की पिटाई् कर देते हैं और नमाज पढ़ते मौलाना का कत्ल कर देते हैं। यहीं नाटक विराम लेता है।
यहां तक की बात मैं अधिकार से कर सकता था , नाटक में मेरा कोई दखल नहीं, खासी मुश्किल विधा है कम से कम लेखन से अधिक मुश्किल, वो भी उस दौर में जहां नाटक का मतलब सिर्फ जूनून है, हासिल कुछ नहीं। खैर दर्शक की हैसियत से एक अच्छा नाटक लगा, कमियां सब जगह होती हैं यहां भी थीं, एक दो फम्बल भी हुए ( जो अधिकांश लोग नहीं पकड़ पाये) लेकिन अधिकांश कलाकार प्रोफेशनल नहीं थे इसलिए वे फम्बल भी हम्बल थे।
अभिनय की दृष्टि से व्यक्तिगत रूप से मुझे मिर्ज़ा साहब ने अधिक प्रभावित किया । काज़मी साहब, हलीम, माई, पहलवान, मौलाना, मिर्ज़ा की बेगम जो मुख्य भूमिकाओं में थे अच्छे थे। मौलाना की संवाद अदायगी उनके भावों से अधिक सशक्त लगी, संवाद कमाल बोल रहे थे जिस गम्भीरता की उम्मीद उस चरित्र से थी वह संवाद में तो थी, बाकी भाव पक्ष पर उन्हें काम करना है। पहलवान को गुस्से में होना चाहिये , थे भी, पर धूर्तता नहीं दिखी जिसकी मैं उम्मीद कर रहा था। हालाँकि लाहौर मेनू भी नई वेख्या पर पहलवान मुझे लाहौरी पहलवान नहीं लगे। हालाँकि ये निर्देशकीय कमी भी हो सकती है। माई ने कई जगह बहुत अच्छा किया, दो चार दर्शकों को रुलाया भी, यदि एकाध जगह ओवर भी हुई हों तो भी जवानी में अस्सी साल की बुढ़िया का किरदार करना चुनौती का काम है।
परिकल्पना और निर्देशन के लिये सनीफ मदार की तारीफ बनती है। तीस पैंतीस लोगों को डेढ़ घण्टे के शो के लिए महीने भर संभालना, उनसे मन मुताबिक काम लेना, डेढ घण्टे कोई गलती न हो सुनिश्चित करना, सैट, लाइट आदि का संयोजन देखना खासा मेहनत तलब काम है। दृश्यों के अंतराल में शेर और फ़िल्मी गाने खास प्रभाव छोड़ रहे थे ये सम्भवतः ओरिजिनल स्क्रिप्ट में नहीं होंगे ये भी खास निर्देशकीय कर्म था बल्कि सुकर्म था।
नाटक बहुत अच्छा लगा, अच्छे,बुरे, औसत से इतर महत्वपूर्ण यह कि नाटक हुआ और वह नाटक हुआ जो समय के चरित्र को चुनौती दे, यही होना भी चाहिए था और आगे भी होते रहना चाहिए।
सलाम मदार ब्रदर्स।

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