सामाजिक बुनावट से त्रिस्कृत  और अछूत जिन्दगी के मानवीय पहलुओं को रेखांकित करती, कथित सभ्य समाज को खुद का विद्रूप चेहरा दिखाती एवं वर्तमान व्यवस्थाओं पर प्रश्न चिन्ह खडा करती डॉ मोहसिन खान की बेहतरीन कवितायें …. संपादक

जिस्म की गिरफ़्त

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

दास्ताँ ऐसी के कभी ख़त्म न हो,

ज़ख़्म ऐसे कि कभी भर न सके,

ज़िन्दगी किराए की

और साँसे उधार की।

किससे कहें हम,

और कैसे कहें हम,

सुन न सकेगा कोई लरज़ती आवाज़ हमारी।

रोज़ नए छाले हो जाते हैं,

जिस्म और ज़हन में

और फूटकर रिसते रहते हैं,

आँसुओं की शक़्ल में,

कोई मरहम भी काम नहीं आता।

सब सहने की आदत बन गई है,

दर्द सारा पीना ज़रूरत बन गई है।

अब फ़र्क भी नहीं पड़ता,

कौन किस नज़र से देखता है,

कौन किस तरह नोचता है,

खरोंचे कितनी बदन पर पड़ गईं हैं न मालूम,

लेकिन वक़्त सबको भर दिया करता है।

इस भरे बाज़ार में हैं बहोत तनहा,

रोज़ बिकते हैं, रोज़ ख़रीदे जाते हैं,

रोज़ मरते हैं, रोज़ जीते हैं,

कोई मिल जाता है तो

अपना दिल मसोसकर,

उसका दिल बहलाते हैं,

ग़म इसका नहीं के

वो छोड़कर चल देता है,

रंज ये है कि किसी ने हमें चाहा नहीं,

किसी ने हाथ थाम ही नहीं।

हम अपने आपसे भी कतराते हैं,

जब कभी सामना होता है ख़ुद से

तो आँख नहीं मिला पाते हैं ख़ुद से,

जब अचानक मुलाक़ात हो जाती है ख़ुद से तो,

अपने आप से मिलकर बेज़ार हो जाते हैं,

हम इसीलिये ज़्यादा आईना नहीं देखते हैं,

हमें पता है के कोई हमें घूर रहा है।

जिस दुनिया में हैं

वो दुनिया भी अपनी नहीं,

यहाँ इंसान कम

और मशीनें ज़्यादा हैं,

छह बाय चार की खोली में,

मशीन बनकर लेट जाते हैं

और डिपॉज़िट कर देता है कस्टमर पैसा,

कस्टमर टिप दे जाता है

तो छुपा लेते हैं गुप्त अंगों में कहीं,

बाक़ी का हिसाब देना पड़ता है।

रोज़ टूट जाती हैं काँच की चूड़ियाँ,

सस्ती और महँगी सब।

बिस्तर काँटों की सेज है,

धँसते हैं जब काँटे बदन में तो

रूह तक छेद जाते हैं।

सजते हैं, सँवरते हैं तो सब देखते हैं,

जब टूटते हैं, बिखरते हैं तो कोई नहीं देखता,

मैं टूटी और बिखरी हुई हूँ,

जिसे समेटना भी अब मुमकिन नहीं,

लेकिन नज़र नहीं आती न तुम्हें टूटी हुई,

तुम्हें तो मैं साबुत लग रही हूँ,

बदन की कशिश को निहार रहे हो,

हरेक अंग का कसाव कर रहे हो महसूस,

दरअसल ये रेत के ज़र्रों का महल है,

जिस दिन गिरा उस दिन

एक ग़ुबार उड़ेगा दूर तक

और सबकुछ ढह जाएगा।

सच कहूँ तो ये बदन

एक बद्दुआ बन चुका है,

इसकी क़ैद में गिरफ़्त हूँ,

मुझे ख़ुदको मारना है ताकि

मैं जी सकूँ।

ये हुनर ज़रा मुश्किल है,

लेकिन आज़माइश ने सब सिख दिया।

बस ये अहसान यूँ ही करते रहना,

तुम दोबारा आओ न आओ लेकिन

किसी और कस्टमर को ज़रूर भेजना।

मैं अकेली भी रहना नहीं चाहती,

क्योकि, अकेले में घुटन होती है,

मन ख़ुदकुशी के इरादों में मुब्तिला हो जाता है,

मशीन हूँ, चलती रही तो चलती रहूंगी,

रुक गई तो ज़ंग लग जाएगा अंदर और बाहर।

बस इतना अब ख्याल रखना,

महँगाई बहोत बढ़ गई है,

मेरे रेट सुनकर चले न जाना,

मैं बहोत डरती हूँ रुसवाई से,

ये रुसवाई मेरी कमाई खा जाती है।

मैं ख़ुद मालकिन नहीं अपने बदन की,

गिरवीं रखा है मैंने इसे

इस चाल की मालकिन के पास,

मुझे पता है कभी छुड़ा न पाऊँगी इसे।

कभी आज़ाद न हो पाऊँगी

इस जिस्मफ़रोशी के जाल से!

डर लगता है,

ढल गया अगर बदन मेरा

तो कहाँ जाऊँगी,

कैसे जी पाऊँगी?

अभी दो महीने पहले

बूढ़ी रज्जो माँ का इन्तिकाल हुआ,

कितने दिन उनके भरी जवानी के क़िस्से

चलते रहे इस मनहूस चाल में,

रज्जो माँ के आख़िरी वक़्त की कोफ़्त की बातों से

सब कतराते रहे!

एक कमरे में अकेली पड़ी रही बरसों रज्जो माँ,

बीमार हो गई थी,

कोई जाता नहीं था उसके पास,

एड्स ने ले ली जान!

जितनी ख़ूबसूरत थी,

उतनी बदसूरत होकर मरी,

जाने कैसी बद्दुआओं की मार है हमें,

फिटमार बरसती है हमपर

और कस्टमर ढूँढ़ता है हममें,

झलक किसी हीरोइन की!!!

 

नदी कभी मरती नहीं

नदी कभी मरा नहीं करती है,

रीत जाता है जब सारा निर्मल जल

तब भी बहा करती है,

कहीं न कहीं।

भीतर बहुत भीतर उसका प्रवाह

निरंतर वेगवान रहता है,

दरारों से रिसकर

उतर आता है जल

पाताल की शुष्कता को भिगोने को।

नदी कभी मरती नहीं,

कहीं किसी पोखर में रहती है ज़िन्दा,

कहीं ठहर जाती है ख़ामोश तनहा,

कहीं मुड़कर हो जाती है अदृश्य,

कहीं बदल लेती है अपना रूप,

सिमट जाती है अपने आँचल में,

छुपा लेती है तपन को भीतर,

सोख लेती है सारी कड़ी धूप

और बहा देती है अपना रूप।

नदी कभी मरती नहीं है!!!

रहती है ज़िन्दा बादलों में,

चलती है नींदों में, ख़यालों में,

कभी घर के बर्तन में,

तो कभी कपड़ों की ख़ुशबुओं में,

कभी लोगों की पहचान बनकर।

कभी घाटों की पंक्तियों में,

कभी पक्षियों को आँखों में,

कभी मछलियों की साँसों में,

तो कभी दरख़्तों के सीनों में,

कभी सावन के महीनों में,

कभी कश्ती की तलहटी में,

कभी रेत के बंजरपन में,

जाने कहाँ-कहाँ,

कैसे-कैसे,

रखती है ख़ुदको बचाकर क्योंकि

नदी कभी मरा नहीं करती!!!

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