जीवन अनुभवों का सफ़र कहानी तक

मैं पीछे क्यों रहूँ

अनीता चौधरी

वर्तमान समय में जिन्दगी के व्यवहारिक धरातल पर वर्गीय संघर्ष, साम्प्रदायाकता, धार्मिक कट्टरता, जातीय दंश और सामाजिक राजनैतिक एवं पारिवारिक सूक्ष्म ताने-बाने व स्थाई पारस्परिक प्रतिमान के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समाहित करता हनीफ मदार का यह पहला ही कहानी संग्रह “बंद कमरे की रोशनी” पूरी तरह से परिपक्व और संभावनाओं से परिपूर्ण है | इसमें   पात्रों द्वारा मानव स्वाभाव के अंतर मन को टटोलते हुए जमीनी स्तर पर चरित्रों के माध्यम से जीवन के अनेक पहलुओं पर चर्चा की गई है | संग्रह की ज्यादातर कहानियों के दृश्य ग्रामीण अंचल द्वारा संजोये गए है जो इस संग्रह की विशेषता है |

भाषा इतनी सरल सहज और मनमोहक है कि पाठक जिस तल्लीनता के साथ कहानी पढ़ते-पढ़ते कब उसके अंत पर पहुँच जाता है उसे पता ही नहीं चलता | मदार की लेखनी की यह खूबी है कि वह कहानियाँ लिखते नहीं है, लगता है जैसे कहानियाँ कह रहे हो उनका कहानी कहने का कौशल अदभुत है | लेखक का नाटय कर्म से जुड़े रहने का यह सकारात्मक अनुभव भी हो सकता है | मदार की कहानियों के पात्र अपनी क्षेत्रीय भाषा और आर्थिक स्थिति के तौर पर  समुदायिक क्षेत्र की स्वाभाविक भाव-भंगिमाएं के साथ प्रस्तुत होते हैं |

संग्रह की पहली कहानी ‘पदचाप’ को ही लें | इसमें एक छोटी जाति के गरीब किसान के पास अपना खेत जोतने के लिए पर्याप्त धन का अभाव व् निचली जाति का होने के कारण उसे ट्रैक्टर नहीं मिल पाता है | जिससे उसका बेटा उससे से सवाल करता है “चाचा भूदेव शास्त्री पे तौ हमतेऊ कम खेत ऐ फिर उनै तौ ट्रैक्टर मिल गयौ |” इस वाक्य में  पात्र के द्वारा बोली गई भाषा एक़दम स्वाभाविक है जो कि बृजभाषा में है यह कोई थोपी हुई भाषा नहीं लगती | मदार की कहानियां जीवन की वास्तविक पृष्ठभूमि से आती है | और वहीँ पर धीरे धीरे उसी पृष्ठभूमि में समाती जाती है और उस भूमि से पोषित पल्लवित होती हुई वे लहलाहती वृक्षरुपी शाखाओं की तरह फैलकर पाठक को अपनी छाँव में समेटकर अपना बना लेती है |

कहानी ‘पदचाप’ एक ऐसे जरुरतमंद किसान की कथा है जिसके पास पर्याप्त धन न होने के कारण खेत की जुताई आधुनिक उपकरण के माध्यम से नहीं कर सकता है | जिस कारण वह अपने दोनों बच्चों को भी खेत में काम पर लगा लेता है | जिससे गाँव का ज़मीदार बालश्रम क़ानून की आड़ में पुलिस का डर दिखाकर उसकी जमीन को हड़पने की मंशा रखता है |

वर्तमान समय में संविधान द्वारा समानता के अधिकार देने के बावजूद भी समाज में आज भी निचली जातियों के साथ भेदभाव कम नही है | अब भी उन्हें अनपढ़, गंवार रखने की कवायद जारी है जो कि कहानी ‘पदचाप’ में दिए गए व्यक्तव्य से जाहिर होती है “तुमसे कितनी बार कहा है कि एस जमीन को हमें बेच दे और बच्चों को स्कूल भेजने की बजाय मजदूरी में डाल | मैं तो कह रहा हूँ खेत बेचकर भी तुम तीनों बाप बेटे उसी में काम करते रहो अपना समझकर और मजदूरी भी मिलती रहेगी |” दलित शोषण का हजारों सालों का इतिहास आजादी के इन साठ वर्षों में भी बदल नहीं पाया है | इस सामाजिक त्रासदी के चित्र इन कहानियों में बखूबी चित्रित किए गए है | इसलिए के० पी० सिंह को समर्पित संग्रह की कहानियों का विचार वास्तव में डॉ० कुंवरपाल सिंह के व्यक्तित्व के करीब तक ले जाता है |

संग्रह की दूसरी कहानी ‘तुम चुनाव लड़ोगे’ वर्तमान राजनैतिक़ हालातों  के एक भौडे स्वरूप को प्रदर्शित करती है | जिसमें एक ईमानदार व्याक्ति को भी सत्ता का लालच किसी भी हद तक जाने लिए विवश करता है | आज हमारे बीच मौजूद राजनैतिक और सामाजिक समीकरण, वे लम्हें, स्पंदन, व धड़कन और मानवीय रिश्ते है जो इन सब के साथ इन कहानियों में रूबरू होते है |

वहीँ कहानी ‘दूसरा पड़ाव’ कहती है कि औरत को अपने अधिकारों और अस्तित्व की लड़ाई स्वयं लड़नी होगी| वरना ये दुनिया उसे दया का पात्र बनाये रखेगी |  जिससे वह उनके सामने हाथ फैलाती रहे या फिर दुत्कार कर अपनी शर्तों पर जीवन जीने के लिए मजबूर होती रहे | वह समाज द्वारा बनाए गए मापदंडों का उल्लंघन कर, स्वच्छंद जीने की सहज मानवीय लालसाओं से भरी इस कथा की नायिका शालिनी स्त्री जीवन के अनेक सहज अनुभवों के साथ तमाम वर्जनाओं की चार दीवारों को लांघकर, अपने जीवित होने के एहसास के लिए संघर्ष करती आधुनिक स्त्री है | जो अपने कलाकर्म के लिए अपना घर व् पति को छोड़ देती है |

‘बंद कमरे की रोशनी’ , संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है जिसे लेखक ने अपने कहानी संग्रह के नाम के रूप में भी इस्तेमाल किया है | एक समुदाय विशेष के द्वारा किसी भी भाषा पर अपनी बपौती समझ, समाज में साम्प्रदायिक लड़ाई- झगड़े करवाकर लोगों के अन्दर अनचाहा भय पैदाकर समाज की शान्ति भंग करके अपनी राजनैतिक रोटियां सेकते है | इस कहानी के मास्टर अल्लादीन का घर सिर्फ इसलिए जला दिया जाता है क्योंकि वह कॉलेज में संस्कृत पढाता था | कहानी ‘एक और रिहाना नही’ में घर में शारीरिक और मानसिक हिंसा की शिकार होती महिलायें है | जो शराबी पति द्वारा पीटी जाती हैं | पति और पिता के रूप में एक पुरूष का पारिवारिक और सामाजिक सरोकारों से मुहँ मोड़ लेना या गैर जिम्मेदार हो जाने के कारण ही एक महिला टी० वी० जैसी भयंकर बीमारी की शिकार हो जाती है और उसी परिवार की दूसरी महिला रिहाना अपना सारा बचपन अन्य बच्चों के पेट भरने के लिए खाना जुटाने में ही खो देती है | वह अपने शराबी बाप की गैर जिम्मेदाराना हरकत का गुबार बच्चों पर इस प्रकार खीझ निकालकर करती है | “दारिकेऔ एकऊ ने आवाज निकारी तौ मौह तोड़ दूंगी, कुनबा वा बाप ते नाय रोय सकतु जा नरिऐ भरिवे कूँ……….?

आज भी जिस समाज में पुरषों का इधर उधर मुहँ मारना उनकी पुरुषीय काबलियत माना जाता है और औरत के इंसान होने के हक़ की बात करना भी उसके चरित्रहीन होने का प्रमाण घोषित हो जाता हो उस समाज में औरत की अस्मिता से जुड़े सवाल शायद ही कभी ख़त्म हो सके | ऐसे समय में महिलाओं को प्रेरणा देती कहानी ‘चरित्रहीन’ समाज में उस पुरुषरुपी प्रेमी की रूढीवादी मानसिकता को उजागर करती है| जो सिर्फ एक शब्द द्वारा ही उसके इंसानी स्वरूप में जीवन जीने के सारे रास्ते बंद करना चाहता है | वहीँ दूसरी तरफ पिता जैसे पुरूष भी है जो अपनी बेटी को जिन्दगी की तमाम इच्छाओं को जानते हुए भी बार बार अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की दुहाई देते हुए सब कुछ चुपचाप सहन करने की नसीहतें देते है |

संग्रह के केंद्र में एक छोटी व् मार्मिक कहानी है | ‘रोजा’ जो कि समाज में फ़ैली धार्मिक कट्टरता व् आडम्बरों पर तीखा प्रहार करती हुई नजर आती है | भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में अल्पसंख्यक होना किसी भी भयानक दंश से कम नहीं है |चाहे कानून या हमारा भारतीय संविधान हम सब को समान होने की इजाजत देता हो | लेकिन समाज में जहर  फ़ैलाने वाली साम्प्रादायिक ताकतें अपने पूरे सबाब पर है | इसी साम्प्रदायिकता के दर्द को बयां करती है इस संग्रह की कहानी ‘उद्घाटन’ कहानी में चाय की दुकान का मालिक पहलवान एक लड़के को दुकान पर काम इसलिए नहीं देता है कि वह नाम से पहचान नहीं पा रहा है कि वह हिन्दू है या मुस्लिम | कहानी में असंवेदनाओं की पराकाष्ठा तो तब होती है | जब वह उस लड़के को काम देने से पहले नंगा करके देखता है कि वह मुस्लिम तो नहीं है | जो उस पहलवान के रूप में समाज ऐसे बहुतेरे लोगों की धार्मिकता व् रूढ़ीवादिता को उजागर करती है | जब डॉ० नरेन्द्र दाभोलकर जैसे लोगों को गोली मार दी जा रही है | साम्प्रदायक ताकतें अपना हमला और ज्यादा ताकतें लगाकर कर रही है | ऐसे में ये कहानी आना अपने आप में चुनौती है |

हनीफ जी की कहानियों के रूप में वंचित लोग है | उत्पीड़ित समाज का वर्ग है | इसीलिए आज के परिपेक्ष्य में ये कहानियाँ अपना दखल रखती है | हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायकता पर चोट करना आज भी उतना ही चुनौती भरा काम है जितना कि रही मासूम रजा के लिए था | और उस चुनौती को स्वीकारते हुए मदार की ये कहानियाँ समाज में एक नया उदाहरण पेश करती है |

इसके साथ ही संग्रह की अन्य कहानी ‘चिंदी चिंदी ख्वाब’ गाँव के एक टेलर मास्टर आनन्दी के रूप में एक पिता की व्यथा है जो दिन रात मेहनत करके अपने इकलौते बेटे दीपक को डॉक्टर बनाता है | जिससे गाँव में कोई भी व्यक्ति बिना इलाज के दम न तोड़े | लेकिन शहर की चमक दमक और पूंजी का प्रभाव, बेटे के भीतर इस कदर भर चुका है कि वह अपने पिता से कहता है “बापू यहाँ केवल मरीज है, पैसा नहीं है | और मैं एक बड़ा डॉक्टर बनाना चाहता हूँ और बड़ा डॉक्टर आज मरीजों से नहीं, पैसों से बनता है | मुझे केवल मरीज नहीं, धन भी चाहिए……….| जो कि बेटे की बाजार से प्रभावित पूंजी के प्रति गहरा लगाव व भौतिकवादी जीवन की लालसा को व्यक्त करती है | कहानी के अंत में बीमार पिता को लेकर आये गाँव के गणेसी और रामसनेही हैरान रह जाते है | तब उन्हें पता चलता है कि आनंदी मास्टर का बेटा अपने जीवित पिता की बरसी एक साल पहले मनाकर उनकी याद में तब से अपने घर पर मरीजों को सप्ताह में एक दिन फ्री  देखता है | कहानी का अंत बहुत ही मार्मिक है | बाजारवाद के प्रभाव में मानवीय रिश्तों के पतन को बयां करती है ये कहानी |

कहा जाता है कि बिना प्रेम के मानव जीवन संभव नहीं होता क्योंकि प्रेम से ही जीवन को नई ऊर्जा, संघर्ष करने की क्षमता और जीवन के रंगों की पहचान होती है | ऐसा ही उदाहरण पेश करती है संग्रह की कहानी ‘अनुप्राणित’ | यह एक अदभुत प्रतीकात्मक प्रेम कहानी है | जिसमें प्रेमी प्रेमिका विपरीत धर्मों के होने के बावजूद भी एक दूसरे को बेइंतहा प्रेम करते है | लेकिन वे इस समाज में व्याप्त खाप पंचायतों के फरमान व कट्टरपंथी मुल्लाओं के फतवों की परवाह किए बगैर एक दूसरे के साथ जीना चाहते है | इसके बावजूद मन के किसी कोने में साम्प्रदायक ताकतों द्वारा समाज में फैलाया गया वह डर भी है जो कहानी की नायिका आस्था के इस कथन से व्यक्त होता है | “इन हवाओं का कोई भरोसा नहीं है सुरेन्द्र, कब कौनसी हवा हमारे बीच एक और बम का धमाका कर देगी और हमारी जुडी हुई कल्पनाओं के पंख उखड़ जायेगें……….| प्रेम एक खूबसूरत इंसानीय व मानवीय जीवन्तता का एहसास है | जो किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय से बढ़कर होता है जिस किसी भी तरह की बंदिशे नहीं लगाई जा सकती |

आज के संदर्भ में कहे तो इनकी कहानियाँ प्रेम कहानियाँ है लेकिन यौन कहानियाँ नहीं है | इनकी कहानियों में प्रेम के साथ साम्प्रदायकता विरोध, व्यवस्था विरोध है| कहानी लेखन का तरीका पूर्ण यथार्थवादी है |यथार्थ भी ज्यों का त्यों नहीं बल्कि संघर्ष की चेतना को शामिल करते है | कहानी लिखना और अपने समय से मुठभेड़ करना यह बहुत आसान नहीं होता | एक निश्चित लक्ष्य के साथ लेखन करना आसान यूँ भी नहीं रहा है | समाज को पीछे ले जाने वाली समाज में हलचल पैदा करने वाली ताकतों के खिलाफ खड़े होकर लिखना बहुत ही साहस की बात होती है | और यह साहस हनीफ मदार की लेखनी में है |

संग्रह की अंतिम कहानी ‘अब खतरे से बाहर है’ एक ऐसे दबंग जमींदार खां साहब के चरित्र को उजागर करती है | जो धर्म का ठेकेदार बन गाँव के हर व्यक्ति को धर्म की आड़ में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की वजह से गाँव के किसी भी व्यक्ति के शिक्षित हो जाने के खिलाफ है | जो इस कथन से स्पष्ट होता है | “अरे भाई इशाक मियाँ ! तुम्हारा बेटा शहर से पढ़कर वापस आ गया, लेकिन नमाज में दिखाई नहीं देता | हमने तुमसे पहले ही कहा था कि इसे पढ़ने को शहर मत भेजो, वहां अंगरेजी और विज्ञान जैसी किताबें पढेगा तो दीन से भटक जाएगा लेकिन तुमने हमारी बात कहाँ मानी……….|” यह कहानी समाज के उन धार्मिक ठेकेदारों की कट्टरपंथी पुरूषवादी मानसिकता को उजागर करती है |जो महिलाओं को उनके मूल अधिकारों से वंचित करना चाहते है |वे नहीं चाहते कि ये पढ़ लिखकर पंख फैलाए इस खुले आसमां में स्वंतत्र रूप में विचरणकर और अपनी इच्छानुसार प्रेम विवाह करें | यह कथा खाप जैसी समस्याओं का पूर्ण रूप से रचनात्मक विश्लेषण करती हैं |

इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह कि आज हमारे सामने जो सबसे बड़ा ख़तरा है वह समाज को विभाजित करने वाली शक्तियां हैं | साम्प्रदायाकता का ख़तरा है उसको संबोधित करके कहानियाँ लिखना और उस यथार्थ के साथ जो प्रेमचंद या यशपाल या अन्य बुजुर्गों ने दिया उसे अपने समय और समाज के वर्तमान संदर्भों में संघर्षीय चेतना के साथ रखना मदार की कहानियों में मिलता है | और यही उन्हें हिंदी साहित्य में एक प्रतिबद्ध साहित्यकार के रूप में स्थापित करता है |

इस संग्रह कहानियों की यह भी विशेषता रही है कि सभी कहानियों में समस्या का समाधान मुखरित होती एक स्त्री द्वारा ही किया गया है | ये सारी कहानियाँ लेखकीय जीवन के अनुभव की कहानियाँ है | कहानियों में स्त्री समानताएं, जाति असमानता वर्तमान समय के संदर्भों के साथ प्रस्तुत होते है जो अति महत्वपूर्ण है | अपने इस पहले कहानी संग्रह के रूप में हनीफ मदार ने खुद को एक परिपक्व कहानीकार होने का परिचय दिया है | रचनाओं में उनकी दृष्टि एकदम साफ़ व स्पष्ट है | शब्द, भाषा व बिम्बों का चयन भी लेखकीय प्रौड़ता को दर्शाता है |

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