जीवन की अभिव्यक्ति का साहित्य भी एक माध्यम है और फिल्म भी, अंतर केवल इतना है कि फ़िल्म अपनी बात दृश्यात्मक विधान द्वारा दर्शक और समाज के सामने आती है, वहीं साहित्य पुस्तकों में अभिव्यक्त भाषा के माध्यम से अपनी गहरी छाप पाठकों के मन पर अंकित करता है। जब विशुद्ध साहित्य को लेकर ही फिल्म का निर्माण हो तो बात कुछ ख़ास हो जाती है…….|

जीवन की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है फिल्म

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं शोध निर्देशक
जे. एस. एम. महाविद्यालय,
त्रितय उपन्यास , सैलाब ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित 201, सिद्धान्त गृह निर्माण संस्था, विद्या नगर, अलीबाग – ज़िला रायगढ़ (महाराष्ट्र)
पिन- 402 201
मोबाइल- 09860657970
Khanhind01@gmail.com

साहित्य जगत और फ़िल्म जगत में यूँ तो कई कृतियों का सृजन एक-दूसरे के पारस्परिक सहयोग, सरोकार और समायोजन के लिए वर्षों से होता चला आरहा है और दोनों के आपसी अनुशासन ने गहरे तक एक-दूसरे को बेहतर तौर पर पचाते हुए कई नायाब कला कृतियाँ तथा सिनेमा की रचनाएँ समाज के सम्मुख प्रस्तुत की हैं। सिनेमा के प्रारम्भिक काल से साहित्य के साथ फ़िल्म का एक गहरा रिश्ता रहा है, साहित्य और सिनेमा के अपने आतंरिक गठन, प्रक्रिया और संवेदना अत्यंत सक्रिय और सजग हैं, इसी कारण इन दोनों अनुशासनों का समाज से गहरा और सीधा सम्बन्ध है। जीवन की अभिव्यक्ति का साहित्य भी एक माध्यम है और फिल्म भी एक माध्यम है, अंतर केवल इतना है कि फ़िल्म अपनी बात दृश्यात्मक विधान द्वारा दर्शक और समाज के सामने आती है, वहीं साहित्य पुस्तकों में अभिव्यक्त भाषा के माध्यम से अपनी गहरी छाप पाठकों के मन पर अंकित करता है। जब विशुद्ध साहित्य को लेकर ही फिल्म का निर्माण हो तो बात कुछ ख़ास हो जाती है, क्योंकि साहित्य के आधार पर बनी फिल्मों ने अपना प्रभाव समाज में इस प्रकार बनाया है, जैसे कि वह फिल्म केवल फिल्म न होकर एक विशेष समय के समाज का वास्तविक चित्रण हो। जब दो कलाओं का संगम इस प्रकार हो कि एक कला दूसरी कला का आधार पाकर एक-दूसरे को श्रेष्ठ बना दे, तो वास्तव में कला के साथ समाज का भी हित सध जाता है।
कुछ ऐसा ही रचनात्मक प्रयास शोधात्मक दृष्टि से हमारे सम्मुख आया है, ‘हिंदी साहित्य और फ़िल्मांकन’ पुस्तक 248 पृष्ठों की आलोचनात्मक पुस्तक है, जो हिंदी साहित्य की कृतियों पर निर्मित फ़िल्मों और साहित्य तथा फ़िल्म के अंतःसंबंधों को रेखांकित करती अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। इस पुस्तक के केंद्र में हिंदी साहित्य कृतियाँ और फिल्मांकन के अन्तरावलंबन को बहुत ही सटीक और साफ़गोई से परिलक्षित, विश्लेषित और शोध किया गया है। यह पुस्तक जहाँ हिंदी सिनेमा के विकासक्रम को रेखांकित करती है, वहीं यह पुस्तक साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों की विशेषता को भी दर्शाती है साथ ही टेक्निक पर दृष्टि विसरण करती है। पुस्तक में 7 अध्यायों का विभाजन है, जिसके तहत सिनेमा का स्वरूप, उद्भव और विकास, सिनेमा और समाज का सम्बन्ध, हिंदी साहित्य और फिल्मांकन, साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मांकन की समस्या, समस्याओं का समाधान इत्यादि के माध्यम से साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों की गहरी पड़ताल की गई है। यह कृति एक उपयोगी और पठनीय कृति है, जो कि कई नई चीज़ें पाठकों के सामने लाती है। लेखक ने सिनेमा और समाज के अंतर्संबंधों के विश्लेषण को गंभीरता के साथ तथा गहरे से प्रस्तुत करते हुए पिछली शताब्दी के चालीस के दशक से लेकर वर्त्तमान इक्कीसवीं शताब्दी तक के सामाजिक संबंधों का विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इस विश्लेषण में लेखक ने फिल्मों के निर्माण में अलग-अलग विषयों को दर्शाते हुए फिल्म का प्रवृत्तिपरक ब्यौरा प्रस्तुत किया है। जाति व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली, भ्रष्टाचार, राजनीति, अपराध, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, किसान-जीवन, भ्रूण-हत्या, वैश्यावृत्ति, बलात्कार, समलैंगिकता, और विवाहेत्तर संबंधों के विषय में फिल्मों के दायित्व का निर्वाह दर्शाते हुए उसके समस्त सरोकारों को समाज से जोड़ते हुए कला निर्वहण को दर्शाया है। लेखक ने उन समस्त हिंदी साहित्य की कृतियों का अध्ययन शोधात्मक रूप से प्रस्तुत किया है, जिसके आधार पर महत्वपूर्ण फिल्मों और धारावाहिकों का निर्माण संभव हो पाया है, जिनमें- गोदान, सेवासदन, रंगभूमि, गबन, डाक बंगला, काली आंधी, आपका बंटी, एक सड़क सत्तावन गलियां, सारा आकाश, चित्रलेखा, धर्मपुत्र, त्यागपत्र, अठारह सूरज के पौधे, कोहबर की शर्त, तमस, सूरज का सातवाँ घोड़ा, नौकर की कमीज़, शतरंज के खिलाड़ी इत्यादि कई हिंदी साहित्य की कृतियों को फिल्मों के निर्माण के आधार रूप को दर्शाते हुए आपसी अंतर्संबंधों की पड़ताल की गई है। इस कृति की ख़ास विशेषता यह है कि लेखक ने प्रमुख फिल्मकारों से साक्षातकार लिया है जिसमें- श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, बासु चटर्जी जैसे दिग्गज और प्रतिष्ठित निर्देशक शामिल हैं।

डॉ. रामदास नारायण

हिंदी साहित्य और फ़िल्मांकन’
लेखक- डॉ. रामदास नारायण तोंडे
प्रकाशन- लोकवाणी संसथान
डी-58 ए, गली नंबर 3
अशोक नगर, नई दिल्ली-93
प्रकाशन वर्ष-2016
मूल्य- 500 ₹

लेखक डॉ. रामदास नारायण तोंडे द्वारा लिए गए साक्षात्कार से कई नई परतें निर्देशकों की खुलती हैं और ऐसी रोचक बातें, तथ्य तथा संकेत सामने आते हैं, जिन्हें पहले कभी समाज के सामने निर्देशकों ने इतने व्यापक रूप में न रखा होगा। एक प्रशंसा लेखक की अवश्य होनी चाहिए कि लेखक ने बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न अपने साक्षात्कार में श्रेष्ठ निर्देशकों से पूछे हैं, जिससे कृति में जिज्ञासा के साथ रोचकता निरंतर बढ़ती है। अपनी पुस्तक में लेखक ने उन समस्त हिंदी साहित्य की कृतियों को सूचीबद्ध किया है, जिसके आधार पर फ़िल्म और धारावाहिक अबतक बनाए गए हैं। न केवल हिंदी साहित्य की कृतियों का उल्लेख किया है, बल्कि उर्दू, मराठी, कन्नड़, संस्कृत, राजस्थानी, पंजाबी, उड़िया और अंग्रेज़ी इत्यादि भाषाओं की कृतियों को भी लेखक ने सूचीबद्ध कर फिल्मांकन की वृहत परंपरा को दर्शा दिया है। कुलमिलाकर पुस्तक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण है, क्योंकि बहुत सी फिल्मों पर केंद्रित पुस्तकों और साहित्यिक कृतियों के बीच यह एक पुल बनाने का कार्य करती है, साथ ही इस प्रकार के विषयों से जुड़ी पुस्तकों की ख़ानापूर्ति भी करती है। फ़िल्मांकन के लिए साहित्यिक कृतियों की हिमायत करते हुए उनसे जुड़ी समस्याओं को दर्शाते हुए, समाधान प्रस्तुत करती है। जहाँ सिनेमा का शताब्दीवर्ष मनाया गया और हिंदी साहित्य के सिनेमा में योगदान की ख़ूब चर्चा की गई है, यह पुस्तक सिनेमा और हिंदी साहित्य की दीर्घ परंपरा को अपने भीतर समेटे हुए है। हिंदी साहित्य और फ़िल्म जिज्ञासुओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी ही नहीं, बल्कि कारगर सिद्ध होगी, क्योंकि जिस तरह के सरोकारों की आवश्यकता है, यह पुस्तक उसकी कई स्तरों पर आपूर्ति कराती है।

 


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