अविभाजित भारत के सियालकोट (जो कि अब पाकिस्तान में है) में साल 1917 में जन्मे अवतार विनीत कृष्ण हंगल उर्फ ए. के. हंगल की शुरूआती जिंदगी, काफी हंगामेदार रही। उनका बचपन और पूरी जवानी संघर्षमय गुजरी। अपने स्कूली दिनों से ही वे नाटक के अलावा क्रांतिकारी कार्यों में भी हिस्सा लेने लगे थे।

1938 या 1939 के दरमियानी साल में उन्होंने अपना पहला नाटक ‘जुल्म-ए-कंस’ खेला। जो कि उर्दू में था। इस नाटक में उन्होंने नारद की भूमिका निभाई और कुछ गाने भी गाए। आगे चलकर उन्होंने ‘हार्मोनिका’ क्लब बनाया, जो जल्द ही पूरे कराची शहर में लोकप्रिय हो गया। हंगल प्रत्येक बुधवार को क्लब में संगीत सभाएं आयोजित करते। इन सभाओं में बड़े गुलाम अली, छोटे गुलाम अली जैसे बड़े कलाकार शामिल होते। इसी दौरान उन्होंने अपना पहला नाटक ‘प्रायश्चित’ लिखा। जो महात्मा गांधी की छुआछूत के खिलाफ चलाई मुहिम से प्रेरित था।

‘जाहिद खान’ की इस आलेखीय सिलसिले की पांचवीं क़िस्त में आज मुलाक़ात करते हैं अपने रहीम चाचा ‘ए० के० हंगल’  से ……

जीव अनन्त है, मात्र जीवनकाल ही सीमित है 

जाहिद खान

ए. के. हंगल का नाम जैसे ही तसव्वुर करो, तुरंत हमारी आंखों के सामने एक ऐसी शख्सियत आ जाती है जो सौम्य है, शिष्ट है, सहृदय है, सभ्य है, गरिमामय है, हंसमुख है और इस सबसे बढ़कर एक अच्छा इंसान। भला आदमी। हिंदी सिनेमा का भला आदमी। आधी सदी से फिल्मों में लगातार भले मानुष का किरदार निभाते आए, चरित्र अभिनेता ए. के. हंगल अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने भी अब हमसे आखिरकार विदाई ले ही ली। अब यह भला आदमी, हिंदी सिनेमा में दोबारा कभी नहीं दिखेगा। अलबत्ता, उनके द्वारा की गई 200 से ज्यादा फिल्में, हिंदी रंगमंच, भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) और भारत की आजादी में किया गया काम, हमेशा उनकी याद दिलायेगा। ए. के. हंगल को संगीत और नाटक का शौक बचपन से ही था। इसके लिए उन्होने बकायदा उस्ताद खुदाबख्श से संगीत और महाराज बिशिनदास से तबला बजाने का हुनर सीखा। उनके घर के ही बगल में एक संगीत और नाटक का क्लब ‘श्री संगीत मंडल’ था। जिसके वे सदस्य बन गए। 1938 या 1939 के दरमियानी साल में उन्होंने अपना पहला नाटक ‘जुल्म-ए-कंस’ खेला। जो कि उर्दू में था। इस नाटक में उन्होंने नारद की भूमिका निभाई और कुछ गाने भी गाए। आगे चलकर उन्होंने ‘हार्मोनिका’ क्लब बनाया, जो जल्द ही पूरे कराची शहर में लोकप्रिय हो गया। हंगल प्रत्येक बुधवार को क्लब में संगीत सभाएं आयोजित करते। इन सभाओं में बड़े गुलाम अली, छोटे गुलाम अली जैसे बड़े कलाकार शामिल होते। इसी दौरान उन्होंने अपना पहला नाटक ‘प्रायश्चित’ लिखा। जो महात्मा गांधी की छुआछूत के खिलाफ चलाई मुहिम से प्रेरित था। स्वभाविक है कि नाटक में उन्होंने अभिनय भी किया और यहीं से उनका अभिनय में लगाव बढ़ता चला गया।

ए0 के0 हंगल

अविभाजित भारत के सियालकोट (जो कि अब पाकिस्तान में है) में साल 1917 में जन्मे अवतार विनीत कृष्ण हंगल उर्फ ए. के. हंगल की शुरूआती जिंदगी, काफी हंगामेदार रही। उनका बचपन और पूरी जवानी संघर्षमय गुजरी। अपने स्कूली दिनों से ही वे नाटक के अलावा क्रांतिकारी कार्यों में भी हिस्सा लेने लगे थे। पेशावर में किस्सा ख्वानी बाजार में अंग्रेजो ने जो नरसंहार किया, हंगल उस नरसंहार के चश्मदीद गवाह थे। उन्होंने भी इस नरसंहार के प्रतिरोध में अंग्रेजों पर भीड़ से पत्थर बरसाए थे। यही नहीं, क्रांतिकारी भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव तथा राजगुरू की शहादत का भी किशोर हंगल के दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ा। इन क्रांतिकारियों को बचाने के लिए उस वक्त वायसराय को दिये गए, मर्सी पिटीशन पर हस्ताक्षर करने वालों में वे भी शामिल थे। बहरहाल बचपन में घटी इन घटनाओं का हंगल के पूरे जीवन पर बड़ा प्रभाव रहा। अपनी जिंदगी के आखिर तक वे बराबर शोषण, अत्याचार और असमानता के खिलाफ लड़ते रहे। उन्हें फिल्मी कलाकार के रूप में जानने वाले ज्यादातर लोगों को शायद ही यह बात मालूम हो कि ए. के. हंगल भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे। आजादी के पहले से ही उन्होंने पार्टी और यूनियनों की गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था। इन गतिविधियों का ही नतीजा था कि आजादी के बाद उन्हें पाकिस्तान की जेलों में रहना पड़ा। पाकिस्तानी जेलों में दो साल काटने के बाद साल 1949 में वे हमेशा के लिए भारत आ गए। मायानगरी मुंबई को उन्होंने अपनी कर्मस्थली के रूप में चुना और अपने परिवार के जीवनयापन के लिए टेलरिंग शुरू कर दी।

भारत आने के बाद भी ए. के. हंगल का पार्टी और यूनियनों की राजनीति से लगाव नहीं छूटा। वे बंबई की चालों मे कई साल तक रहे। चाल में रहने वाले किरायेदारों की समस्याओं से जब उनका साबका पड़ा, तो इनसे निपटने के लिए उन्होंने किरायेदारों का एक संघ बनाया। बाद में वे दर्जियों के अधिकारों की लड़ाई में कूद गए। उन्होंने बंबई में टेलरिंग वर्कर्स यूनियन का गठन किया और उनकी लड़ाई लड़ी। जब संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की शुरूआत हुई, तो उन्होंने आचार्य अत्रे, कॉमरेड एसएम जोशी, कॉमरेड एसए डांगे, एनजी गोरे जैसे शीर्षस्थ नेताओं के इस आंदोलन में साथ हिस्सेदारी की। फिर गोवा मुक्ति आंदोलनकारियों में भी शामिल रहे। बाहर से हमेशा शांत और सहज दिखलाई देने वाले हंगल, अंदर से पूरे आंदोलनकारी थे। जहां भी कहीं कुछ गलत होता, वे उसके खिलाफ आवाज जरूर उठाते। उनका आत्मबल कितना मजबूत था, उसे सिर्फ एक उदाहरण से जाना जा सकता है। अभिनय सम्राट दिलीप कुमार को जब पाकिस्तानी सरकार ने ‘निशाने इम्तियाज’ सम्मान देने का एलान किया, तो शिवसेना ने इसका पुरजोर विरोध किया। पार्टी के सुप्रीमो बाल ठाकरे ने दिलीप कुमार से कहा कि वे यह सम्मान लेने पाकिस्तान नहीं जाएं। बाल ठाकरे के इस फरमान से पूरी फिल्मी दुनिया में सांप सूंघ गया। ऐसे माहौल में वे ए. के. हंगल ही थे, जो दिलीप कुमार के समर्थन में खुलकर सामने आए और उन्होंने कहा कि ‘‘दिलीप कुमार को यह सम्मान लेने पाकिस्तान जरूर जाना चाहिए। इससे भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में मधुरता आएगी।’’ इस बयान के बाद दिलीप कुमार के साथ हंगल भी शिवसेना के निशाने पर आ गए। बाल ठाकरे ने फतवा जारी कर दिया कि ए. के. हंगल को फिल्मों में कोई काम न दे। उन्हें काम मिलना बंद हो गया और यह सिलसिला कोई दो साल तक चला। फिल्मों में काम मिलना बंद हुआ, तो वे फिर टेलरिंग करने लगे, पर वे अन्याय के आगे बिल्कुल नहीं झुके।

आजादी के बाद जब ‘भारतीय जन नाट्य’ संघ यानी इप्टा लगभग टूट रहा था, तब वे ए. के. हंगल ही थे, जिन्होंने इप्टा को पुनर्जीवन दिया। आर. एम. सिंह और रामाराव जैसे साथियों को साथ लेकर उन्होंने इप्टा को फिर खड़ा कर दिया। ए. के. हंगल ने उन सभी कलाकारों से संपर्क स्थापित किया, जिन्होंने विभिन्न कारणों से इप्टा छोड़ दी थी। उनकी कोशिशें रंग लाईं और इप्टा एक बार फिर पहले की तरह काम करने लगा। देखते-देखते कवि शैलेन्द्र, संगीतकार सलिल चैधरी, केन घोष, बलराज साहनी, रमेश तलवार, सागर सरहदी, एम.एस. सथ्यु, शमा जैदी, राजी सेठी, नितिन सेठी, शशि शर्मा, मोहन शर्मा जैसे प्रतिभाशाली कलाकार इप्टा से जुड़ गए। ए. के. हंगल ने आगे चलकर इप्टा के कई नाटकों में निर्देशन व अभिनय किया। इप्टा में वे इस कदर रम गए कि उन्होंने अपने आप को पूरी तरह से नाटकों में डुबो लिया। ‘बाबू’, ‘इनामदार’, ‘अफ्रीका जवान परेशान’, ‘इलेक्शन का टिकिट’, ‘आजर का ख्वाब’, ‘अतीत की परछाईंया’, ‘जवाबी हमला’, ‘सूरज’, ‘मुसाफिरों के लिए’, ‘भगत सिंह’, ‘आखिरी शमां’ आदि चर्चित नाटकों में उन्होंने अभिनय किया।

रंगमंच से उनके अभिनय की लोकप्रियता धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया तक पहुंची। साल 1962 में बासु भट्टाचार्य ने अपनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ में उन्हें एक छोटी सी भूमिका दी और इस फिल्म के साथ ही उनका फिल्मी कैरियर शुरू हो गया। अपने फिल्मी कैरियर में ए. के. हंगल ने ख्वाजा अहमद अब्बास, एम. एस. सथ्यु, ऋषिकेश मुखर्जी, राज कपूर, देवानंद, गुलजार, रमेश सिप्पी और के. बालाचन्दर जैसे प्रतिभाशाली और प्रयोगशील निर्देशकों के साथ काम किया। इनकी फिल्मों में उन्होंने कई यादगार किरदार निभाये। ‘शोले’, ‘सु राज’, ‘शौकीन’, ‘नमक हराम’, ‘गुड्डी’, ‘परिचय’, ‘आंधी’, ‘गरम हवा’, ‘एक चादर मैली सी’, ‘अभिमान’, ‘कोरा कागज’, ‘सागर’, इश्क-इश्क-इश्क, ‘बाबर्ची’, ‘जुर्माना’, ‘नौकरी’ और ‘माउण्टबैट्टिन-अंतिम वायसराय’ उनकी उल्लेखनीय फिल्में हैं। सितारा कलाकारों से सजी इन फिल्मों में ए. के. हंगल ने अपनी अदाकारी से एक अलग ही प्रभाव छोड़ा। फिल्म ‘शोले’ में निभाया उनका नेत्रहीन ‘रहीम चाचा’ का किरदार, तो हिंदी सिनेमा का कालजयी किरदार है।

फिल्मी दुनिया में ए. के. हंगल ने एक्टिंग की एक जुदा राह अपनाई। उनका झुकाव यथार्थवादी अभिनय की ओर था। फिल्मों में यथार्थवादी अभिनय के लिए उन्होंने अनवीक्षा तथा विभ्रम पद्धति का सहारा लिया। जो कि आगे चलकर बहुत कामयाब हुआ। उनका कहना था कि ‘‘एक अच्छे कलाकार को अभिनय में अपने दिमाग का इस्तेमाल करना आना चाहिए। अंधे व्यक्ति के किरदार में अगर हम आंखों की महत्ता नहीं समझेंगे, तब तक अंधे की साइकोलजी को भी नहीं समझ पाएंगे। फिर एक बार यदि किसी किरदार की साइकोलजी समझ ली, तो समझो कलाकार के अभिनय में स्वाभाविकता अपने आप आ जाएगी।’’ ए. के. हंगल की यह बात फिल्म ‘शोले’ देखकर आसानी से समझी जा सकती है। इस फिल्म में उनका किरदार न सिर्फ अपनी आंखे ढ़ूंढ़ता है, बल्कि डायलॉग भी ढूंढता है। गोया कि अभिनय में डबल एक्शन क्या होता है ? यह ए. के. हंगल ने अपनी एक्टिंग से हमें बतलाया। अपनी एक्टिंग के बारे में खुद ए. के. हंगल का कहना था कि ‘‘मैं एक्टिंग के अंदर डायलॉग याद नहीं करता, बल्कि डायलॉग के बीच में जो खाली गैप होता है, उसे महसूस करता हूं। लेखक के मन में डायलॉग लिखते समय क्या बात है और वह अपने किरदार से क्या करवाना चाहता है ? यह बात नोट करता हूं। मैं लेखक की सोच को अभिव्यक्त करने की कोशिश करता हूं। यही मेरी एक्टिंग का स्टाईल है।’’

ए. के. हंगल की पूरी अभिनय यात्रा को यदि देखें, तो अभिनय में उनका विस्तृत अनुभव साफ दिखलाई देता है। जिंदगी की पाठशाला से जो कुछ उन्होंने सीखा, उसका इस्तेमाल अपने नाटकों और फिल्मों में किया। इसलिए उनकी एक्टिंग दूसरे अभिनेताओं की बनिस्बत ज्यादा स्वाभाविक और सहज दिखाई देती है। फिल्मों में काम करने के दौरान भी वे बराबर रंगमंच करते रहे। रंगमंच से जुड़े होने के कारण हंगल के अभिनय में सहजता थी। जिसकी वजह से वे हर किरदार में आसानी से ढल जाया करते थे। वे इप्टा के नाटकों में बराबर काम करते रहे। इप्टा के सांगठनिक कार्यों में भी वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। उन्होंने इप्टा में कई सांगठनिक पदों पर काम किया। अपने अंतिम समय में भी वे इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में मुंबई इप्टा एक महत्वपूर्ण गैर व्यावसायिक रंगमंचीय दल के रूप में उभरा। ए. के. हंगल का चले जाना न सिर्फ हिंदी सिनेमा से एक भले आदमी का जाना है, बल्कि एक ऐसे आदमी का जाना है, जो लगातार अपने कामों से इंसानी जिंदगी को बेहतर बनाने का जतन करता रहा। ए. के. हंगल का जिंदगी के बारे में क्या फलसफा था ? यह उनकी आत्मकथा ‘पेशावर से बंबई तक’ के अंत की चंद लाईनों से जाना जा सकता है-‘‘प्रत्येक फिल्मी और रंगमंचीय मृत्यु के बाद, मैं फिर से उठ खड़ा हुआ, किन्तु इस बार यदि यथार्थ में ही मृत्यु का अभिनय संपन्न हो तो ? क्यों नहीं ? जैसा कि अज्ञात वचन है, जीव अनन्त है, मात्र जीवनकाल ही सीमित है।’’

(सभी इमेज google से साभार )

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    By: जाहिद खान

    लेखक, पत्रकार जाहिद खान साल 2003 से लगातार बिना रुके अखबारी और गंभीर लेखन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के छोटे से शहर शिवपुरी में रहकर, सम-सामयिक मसलों पर देश भर की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनके पांच सौ से ज्यादा आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। प्रगतिशील और जनवादी साहित्यकारों के लेखन और उनकी सोहबत से उन्होंने लिखने का शऊर सीखा है। उनका पहला प्यार साहित्य है। लिहाजा अखबारी लेखन से जब भी उन्हें कुछ फुर्सत मिलती है, तो साहित्यिक आलेख और समीक्षाएं लिखने की कोशिश करते हैं। प्रस्तुत किताब भी इन्हीं साहित्यिक आलेखों का संकलन है, जो उन्होंने समय-समय पर लिखे थे। इस किताब के अलावा सम-सामयिक मसलों पर केन्द्रित उनकी दो किताब ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘संघ का हिंदुस्तान’ अभी तलक प्रकाशित हो चुकी हैं।
    लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ठ लेखन के लिए मुंबई की एक सामाजिक संस्था ‘पापुलेशन फस्र्ट’ और यूएनएफपीए (यूनेस्को) उन्हें दो बार, साल 2011-12 और 2013-14 में ‘लाड़ली मीडिया अवार्ड फॉर जेंडर सेंसिटिव्हिटी’ से सम्मानित कर चुकी है। ‘टर्निग इंडिया सम्मान’ उन्हें मिला दीगर सम्मान है। साहित्यकार मित्र और पाठक उन्हें इस पते, मोबाइल और ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं-जाहिद खान, महल कॉलौनी, शिवपुरी मध्य प्रदेश, पिन कोड-473551, मोबाइल-94254 89944, [email protected]

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