एक

जेनेरेशन गैप

निधि जैन

निधि जैन

हमारा ज़माना

“अम्मा… अम्मा..मैं पास हो गया”
“तो का करूँ हो गया पास तो..अब फिर जान खायेगा..नई किताबें मांगेगा..चल अब छुट्टियों में बापू के साथ काम पर जइयो तभी किताबें मिलेंगी..”
“अम्मा एक साइकिल तो दिला दे”
“बापू की है न उसी को चला..”
“अम्मा वो बहुत बड़ी है”
“तो तू भी तो बड़ा होगा.. जा यहाँ से..चलाना हो तो चला.. नखरे मत दिखा..”

हमारे बच्चों का ज़माना

मम्मी चिंतित है बेटे का रिजल्ट आने वाला है और बेटे से पहले माँ को खबर बेटे की 99.9% बनी है। माँ बेटे के कमरे में आती है..माथा चूमती है..चॉकलेट खिलाती है..
बेटा- “मॉम अब मुझे बाइक दिला दो…”
“हाँ जरूर दिलाउंगी..आज ही चलते हैं”
“फिर मैं पूरी छुट्टियां मौज करूँगा”
“अरे नही बेटा… अब तो तुझे और भी ज्यादा मेहनत करनी होगी..ये ट्यूशन वो ट्यूशन ये क्लास वो क्लास..”
बेटा मन ही मन -‘बाइक लेकर ट्यूशनों के चक्कर ही काटने होंगे — इससे अच्छा होता मैं फेल ही हो जाता फिर वही सब पढ़ने में मेहनत तो न लगती..

दो

प्रकाश

“सुनती नही है…कितनी बार कहा है, बाद की रोटियां बिना घी की रखा कर। बच जाएँ तो बाई को देने में दुःख तो न लगे।” ठाकुर जी के आगे शुद्ध घी का दीपक मिलकाती अम्मा जी अपनी दुल्हन को डाँट पिलाती बोली।
दुल्हन प्रकाश से भरे हुए कमरे में दीपक मिलकाने का औचित्य सोचती हुई , सारी रोटियां घी से चुपड़ कर अपने मन के प्रकाश से रसोई और धर्म को फिर से प्रकाशित कर देती है।

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