समाज, स्थितियों, परिस्थितियों या राजनीति में समय के साथ क्या वाकई कुछ बदलाव हुआ …… या महज़ नाम और स्वरूप ही बदले यह तो देखना और सोचना हमें खुद को…….. | ‘कभी’ सामंती व्यवस्था ‘थी’ और आज……कॉर्पोरेट या कॉर्पोरेट के पैरोकार जो अच्छे दिनों की चमक दिखाकर अंगूठे का ठप्पा ले रहे हैं…… यदि इन्हीं बदलावों की आत्ममुग्धता में हम खुश हैं तो शायद अपनी धरती से बहुत दूर हो रहे हैं ……| खैर…. आइये आज पढ़ते हैं अपनी धरती, मिटटी और संस्कृति से बहुत गहरे जुड़े कथाकार “सुभाष चन्द्र कुशवाह”  की कहानी ……| – संपादक 

“नये बीज, खाद, कीटनाशक और बाजार नीति ने गांव के परदेशी जैसों को न खेत का, न कारखाने का रहने दिया था । मसलन पहले जब परदेशी का गन्ना चीनी मिल पर जाता, दो-तीन महीने में उसका पैसा हाथ पर आ जाता। नगदी आती तो खाद-पानी का जुगाड़ हो जाता । कपड़े-लत्ते बन जाते । सरकारी मिल थे तो हर गांव के एकाध लोगों को काम मिला हुआ था। देशी हुक्मरानों ने सरकारी चीनी मिलों को कौड़ियों के भाव बेच दिया और निजी मिल मालिकों के लिए लाल कालीन बिछा दी। अब उन्हीं निजी चीनी मिलों के मालिक, गन्ना मूल्य भुगतान न करने के सौ-सौ बहाने ढूंढ लिए थे। पर साल के गन्ने का दाम अभी नहीं मिला था परदेशी को ।” (कहानी से)

टुअर होते वक्त में 

भटकुंइयां इनार का खजाना: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

परदेशी और जितेन्दर में कई दिनों तक तकरार जारी रही। परदेशी ने बहुत समझाया, ‘बाबू, गोंयड़े के खेत से ही घर चलता है। गन्ने के भुगतान की कोई गारंटी नहीं ? कम से कम सब्जी उगाने-बेचने से नून-तेल, कपड़ा-लत्ता, खाद-बीज, खरीद लिया जाता है। वह हाथ से निकल जायेगा तो हम टुअर हो जायेंगे।’ वह बोलते-बोलते हताश हो गये थे। जितेन्दर पर परदेशी की बातों का असर नहीं हुआ। ‘दो-तीन महीने में रुपयों की व्यवस्था न हुई तो आप मेरी लाश देखेंगे।’ जितेन्दर ने अंतिम पासा भी फेंक दिया था।परदेशी जिस आर्यावर्त के जमीनी संतान थे, वहां उनका जवान बेटा जितेन्दर, परदेशी बनने की चाहत में, देशी को तिलांजलि देना चाहता था। कुछ को दे भी चुका था, मसलन दारू से लेकर मोबाइल तक, खेती-बारी से लेकर बाजार तक । उसे अपना जीवन, बाजारू सपनों-सा सजाना था । अपने तौर-तरीकों से गुजारना था। इसके लिए वह सिर्फ अनुरोध नहीं करना चाहता, छीना-झपटी करना जानता था। बाहर वालों से ही नहीं, माई-बाबूजी से भी । उसे मार-पीट पर उतर आने में परहेज न था। उसके दोस्त, प्रताप ठाकुर का उसे बदमाश बनाने में योगदान था। दुर्गापूजा या लक्ष्मी पूजा के मूर्ति विसर्जन में सड़क पर हाकी डंडा थामे, माथे पर अबीर मले, अंग्रेजी दारू पर झूमता जितेन्दर, खतरनाक लगता था। अभी वह छुट्टा था। कुंवारा भी । तभी वह प्रताप सिंह के काम का था, अपने अपनढ़ बाबूजी की तुलना में कहीं ज्यादा ।
जितेन्दर का परदेशी से छत्तीस का आंकड़ा था। बेहाल होती खेती-किसानी देख, वह बेहाल नहीं होता। जैसे वह माई-बाबूजी के नाम लिखा हो । गांव में ट्रैक्टर आने के बाद, जानवरों के नाम पर गाय-भैंसें बची थीं । उसकी छोटे सींग वाली भैंस का छांटी-पानी, माई राजमती या बहन मुनिया के जिम्मे था । माई के कहने पर कभी-कभार जितेन्दर, चाराकल चला देता पर चारे को उठाकर नांद में डालना पाप समझता । जैसे नाद का गंध नथुनों में समाता हो । ‘ऐ मुनिया! चारा डाल।’ जोर से चिल्लाता जितेन्दर । छोटी बहन मुनिया चौके से भाग कर बाहर आती । खैंची में चारे को भरती फिर भाई को घूरते हुए आगे बढ़ जाती। गोबर, नाद और घारी की सफाई, भैंस को नाद से घारी और घारी से नाद पर बांधने का काम भी मुनिया के जिम्मे था।
जितेन्दर ने कभी सिर पर टोकरी नहीं उठाई थी। गड़हे से गोबर खाद को उठाकर खेत में नहीं डाला था। पर साल कुदाल लेकर गड़हे में उतरा तो बाप-बेटे में लड़ाई की नौबत आ गई । वह बेपरवाही से टोकरी में खाद भरता, फिर माई और बहन के सिर पर उठा देता। जेठ में गन्ने की गुड़ाई करने गया तो भी बाप से बकझक हो गया । परदेशी ने समझाया था, ‘पैरों में पुराना पायजामा पहन लो, इससे गन्ने की पत्तियां का चीरा नहीं लगेगा ।’ पर जितेन्दर को वह सूझा नहीं। कुछ देर बाद पैर छनछनाने लगे तो कुदाल लेकर घर लौट आया ।
आसाढ़ में धान की रोपनी का लेवा लगाते समय भी बाप-बेटे में तकरार हुई थी। परदेशी चाहते थे, जितेन्दर बीया उखाड़ने में मदद करे । एक साथ रोपाई शुरू हो जाने से मजदूरों का अकाल पड़ गया था पर जितेन्दर मेड़ पर बैठा, मोबाइल से गाना सुनता रहा ।
परदेशी ने ब्लैक में डी.ए.पी. और यूरिया खरीद कर धान रोपा मगर समय पर पानी न बरसने से संकट गहरा गया। । बोरिंग और ट्यूबेल से थोड़ी बहुत सिंचाई हुई मगर पर्याप्त नहीं । एक दिन भी जितेन्दर पानी लगाने खेतों में नहीं गया। परदेशी ने सुखार देख स्वर्ण सिंह की हवेली के सामने स्थित अपने गोयड़े के खेत में हाईब्रीड गोभी लगा दी । सोचा, गोभी तो साथ देगी ही । गोबर का खाद तो अपना था मगर डी.ए.पी. और यूरिया में चार-पांच सौ लग गये। छेद करने वाले कीड़े लगे तो दवा के छिड़काव में तीन सौ पचास घुल गये । उसके बावजूद हाईब्रीड गोभी में फूल का ठिकाना न था। यह देख परिवार पालने की चिंता कपार को तपाती रही। परदेशी चाहते थे कि ऐसे समय में बड़ा बेटा होने के नाते जितेन्दर उनकी चिंताओं को बांटे । खेती-बारी के काम में हाथ बंटाये। अभी से जिम्मेदारी नहीं लेगा तो बुढ़ापे का सहारा कैसे बनेगा ? बड़ी होती बहन की शादी का खर्च अभी से जोड़ना था। मगर जितेन्दर को बाबूजी के प्रवचनों से कुछ लेना-देना नहीं था। वह एक कान से सुनता, दूसरे से निकाल देता। ‘भैंस के आगे बीन बजाये, भैंस बैठ पगुराय’, परदेशी खीझकर संतुलन खोते गरिआते।
प्रताप ठाकुर से जितेन्दर की दांतकाटी यारी थी। नये जुमलों की यारी । बेमेल यारी के अपने समीकरण और सरोकार होते हैं । सो यहां भी थे। दोनों ने साथ-साथ बेमन पढ़ाई की थी। प्रताप सिंह को मालूम था कि उन्हें बाबूजी की साहूकारी संभालनी है, जहां अक्ल से ज्यादा हेकड़ी का काम था । पर जितेन्दर के बाप के पास खेत, कुदाल, घारी-बारी के अलावा था क्या ? इसलिए परदेशी चाहते थे कि बेटा मन लगा कर पढ़े पर दोस्ती ने सिनेमा, आरकेस्ट्रा और धार्मिक जुलूसों में उलझा कर किताब-कॉपी से नाता छुड़ा दिया था । फिर भी इंटर पास करना कठिन न रहा। कॉपी पर नाम, अनुक्रमांक लिखना ही पर्याप्त था।
‘अंदर के पन्नों में कुछ लिख देना। शेरो-शायरी भी चलेगी।’ सुझाये थे चंद्रिका मास्टर ।
‘वाह मास्टर साहब !’ जितेन्दर को जैसे विश्वास न हुआ हो।
‘कापी जांचते समय पढ़ने की फुर्सत किसे ? ज्यादा से ज्यादा कापी निबटाने की कोशिश होती है ।’ चंद्रिका मास्टर ने अनुभव के आधार पर बताया था। ‘ज्यादा कापी जांचने पर ज्यादा पैसा मिलता है। सरकार का यह भी आदेश है कि कोई फेल नहीं होना चाहिए।’ कुल मिलाकर चन्द्रिका मास्टर ने आश्वस्त कर दिया था। इसी तरह जितेन्दर और प्रताप ठाकुर ने बी.ए. भी पास कर लिया । स्मार्ट फोन के जमाने में गांव वालों को इससे अधिक पढ़ाई की जरूरत न थी। जितेन्दर की शादी में थोड़ी दिक्कत जरूर थी, दहेज में बाइक को लेकर मगर उसका समाधान भी प्रताप सिंह के पास था। एक दिन खेत में काम करने गइं लड़कियों को छेड़ने निकले प्रताप सिंह ने मौका देख, मेड़ पर बैठा कर जितेन्दर को समझाया-‘अपने बाबूजी से कहो कि शादी-वादी का चक्कर छोड़ें । दुबई रिटर्न वालों को साठ-सत्तर हजार की बाइक मिल जाती है, बिना खेत-बारी देखे। एक बार खाड़ी देश में काम मिल जाये, देखना किस्मत बदल जायेगी ।’
‘मगर जाने की व्यवस्था?’ जितेन्दर ने जरूरी सवाल पूछा था। प्रताप ठाकुर की ओर ताकती आंखें कुछ पल के लिए तिरछी हुई थीं।
‘जहां चाह, वहां राह ?’ प्रताप सिंह ने एक आंख दबा दी थी । दोनों के होंठों पर मुस्कुराहट लौट आई थी।
‘फिर भी, कुल कितना लगेगा ?’ एक बारगी जितेन्दर को लगा, पैसा मनुष्य से बड़ा तो होता ही है।
‘यही कोई एक लाख। पासपोर्ट बनवाने का दस हजार अलग से । पासपोर्ट आफिस के दलाल यह काम करा देंगे। रहा दुबई जाने का तो उसका जिम्मा मुंबई के एजेंटों का है ।’ लाख का नाम सुन, जितेन्दर का गला खिचखिचा गया था। कहां से आयेंगे इतने पैसे? एक बार फिर मन में मुरझाते धान और गन्ने की पत्तियों की चुभन महसूस हुई । जैसे कमजोर फसलों के रूखे सिरों से सट कर चेहरे को छूती हवा तप रही हो। जितेन्दर के माथे पर पसीने की बूंदों ने दस्तक दिया। प्रताप ठाकुर शांत थे। उन पर सूखे और बाढ़ का असर नहीं होता। उनके पास जितेन्दर को भेजने की पूरी योजना थी। योजना तैयार करने में स्वर्ण सिंह की नीति शामिल थी। ऐसी योजनाओं में जुमलों के साथ-साथ जमीन से सतरंगी आसमान दिखाने की कला होती है।
ठाकुर प्रताप सिंह, मुंबई के एजेंटों के पास जितने लड़कों को भेजते थे, प्रति केस दस हजार कमा लेते थे। कभी-कभी ज्यादा भी । एजेंटों को उन्हीं जैसे गांव-देहात के दबंगों की जरूरत थी । बाकी कमाई और काम दिलाने का बवाल मुंबई वालों का। उनका कोई रिस्क नहीं ? वह पहले ही समझा देते, ‘भाई तुम मुंबई वाले एजेंट से हर बात साफ-साफ समझ लेना । अगर वह काम न दिला पाये तो पैसे वापसी की गारंटी देख लेना । मैं तुम्हारी सिफारिश कर दूंगा पर गारंटी नहीं लूंगा।’
जितेन्दर के दिमाग में ‘लाख से ऊपर का खर्च’ नाचने लगा । वह बाबूजी का मिजाज जानता था। सुनते ही बरसेंगे, ‘घर में नहीं दाने, बीवी चली भुनाने ? पुराने ख्याल के आदमी हैं । उन्हें समझाना मुश्किल है ।’ सोचता रहा जितेन्दर । मन में दुबई जाने की चाह पूरे उफान पर था । उसने अड़ियल रुख अपना लिया । जिन खेतों से उपजे अन्न को बेच, वह मोबाइल और इंटरनेट का मजा ले रहा था, उनकी ओर कभी झांकने नहीं जाता। अपने आप से खीझता और कहता-‘उसे नहीं जाना धूल-माटी में ? ’
जब स्मार्ट फोन का जमाना नहीं आया था, जितेन्दर छोटा था। तब खेतों की जुताई ट्रैक्टर से नहीं, दो बैलों की जोड़ी से होती थी। वह माई-बाबूजी से चिपका रहता था। खेत-बारी, हर कहीं साथ न छोड़ता। परदेशी हल जोतते तो वह बैलों के गले में खनकते घुंघरुओं की टनटनाहट सुनने, पीछे-पीछे भागता । परदेशी एक हाथ में परिहथ थामते, दूसरे में पैना और बैलों को साजते हुए बेटे को बरजते- ‘दूर बाबू….दूर…, बैल लात मार देंगे।…. मेंड़ पर बैठो ।’
जितेन्दर अपने नन्हें पांवों से खेत में दौडता, लोटता और घास बीनता । जब पांव बड़े हो गये तो हल चलाना, घास चिखुरना, निराई, गुड़ाई, सिंचाई, कटनी, पिटनी, ओसवनी जैसे काम अनपढ़ों के लगने लगे थे। वह तो पढ़ा-लिखा है । बी.ए. है। सुबह नहा-धो कर पैंट शर्ट पहन, मां-बाबूजी से लड़-झगड़ कर बीस-तीस रुपए लेकर यार-दोस्तों के साथ बाजार में मटरगस्ती करने निकल जाता । कोई फंस जाये तो अंग्रेजी शराब का जुगाड़ हो जाता । नरेगा मजदूरों के खातों से पैसा निकलवाने और प्रधान के हाथ में ले जाकर रख देने का काम भी जितेन्दर जैसे युवकों के सहारे ही संभव था। कोई चूं, चा नहीं करता। इसलिए गांव के प्रधान उसे हर महीने चार-पांच सौ रुपए पकड़ा देते।
परदेशी अपने मन की बात बताते, ‘इ लफंगां की नई जमात है । काम न धाम, बढ़िया भोजन, फैशन और शान।’ मगर जितेन्दर के एफ.एम. पर कुछ अलग तरीके से मन की बात सुनाई देती। वह अपने बाबूजी के मन की बात का मजाक उड़ाता । कहता, ‘बाबूजी की बातें जुमला हैं और उसकी सोच आज की जरूरत। ये भदेश लोग हैं।….. पीटें अपना ढोल-मंजीरा ।’
सचमुच देश में भदेशों की अलग संस्कृति है । वहां भूख और अभावों के बीच सारे संबंध छीना-झपटी, मार-पीट के बीच, निभाये जाते हैं, कुक्कुरहट की तरह । भौं-भौं, कूं…कूं… कांय करते हुए । परदेशी के मन की बात का यही सार है। जितेन्दर सुघड़ बनना चाहता है । सुघड़ बनने के लिए खेत-बारी के गंधाने से दूर रहना होगा। पांक में पांव धंसाने से पांव सा जीवन होता है। दुबई सी चमकती दुनिया पाने के लिए एड़ी को जमीन से उठा कर चलना होता है।
नये बीज, खाद, कीटनाशक और बाजार नीति ने गांव के परदेशी जैसों को न खेत का, न कारखाने का रहने दिया था । मसलन पहले जब परदेशी का गन्ना चीनी मिल पर जाता, दो-तीन महीने में उसका पैसा हाथ पर आ जाता। नगदी आती तो खाद-पानी का जुगाड़ हो जाता । कपड़े-लत्ते बन जाते । सरकारी मिल थे तो हर गांव के एकाध लोगों को काम मिला हुआ था। देशी हुक्मरानों ने सरकारी चीनी मिलों को कौड़ियों के भाव बेच दिया और निजी मिल मालिकों के लिए लाल कालीन बिछा दी। अब उन्हीं निजी चीनी मिलों के मालिक, गन्ना मूल्य भुगतान न करने के सौ-सौ बहाने ढूंढ लिए थे। पर साल के गन्ने का दाम अभी नहीं मिला था परदेशी को ।
परदेशी ने जितेन्दर को बहुत समझाया । मनाया । कहा, ‘पढ़ाई पार नहीं लगती तो खेती-बारी संभालो । जिनगी की गाड़ी खीच-खांच कर चल जायेगी।’ दूसरे का मुंह न देखना पड़ेगा। पर नहीं, जितेन्दर को हर हाल में दुबई जाना है । विदेशी रुपए की तासीर ही कुछ और है ? उसे बढ़िया स्मार्ट फोन लाना है। फेसबुक, वाट्सअप और यू ट्यूब के साथ दुनिया मुट्ठी में करनी है ।
परदेशी का देशी ज्ञान बेढंगा है। क्रोध में उनका स्वर, बेसुरा हो जाता है। कहते हैं, ‘पूत मांगे गंइनी, भतार गंवा के अइनी।…. ससुर! न खेती करेंगे और न चाकरी मिलेगी ? कहीं चोर-उचक्कों के संग फंस गये तो बुढ़ापे में दाग लगा जायेंगे ।’ जितेन्दर को परदेशी की समझ घारी से बारी तक दिखती तो परदेशी को जितेन्दर की समझ, नालायक औलाद की लगती । वह कहते, ‘जो अपनी माटी को कपार पर ना लगायेगा, वह परदेश में घी-मलीदा नहीं खायेगा ?’
‘अब तो चाकरी में ही चासनी है।’ जितेन्दर का जवाब होता।
तीन दिनों से परदेशी को बुखार था। राजमती ने कई बार काढ़ा बना कर दिया। मुनिया ने कपार पर तेल मला। मगर जितेन्दर…. एक बार भी बाप का हाल पूछने नहीं गया । धान के खेत में घास निकालने गये थे परदेशी, धूप से माथा तपने लगा । प्यास लगी और घर आते-आते बिस्तर पर पड़ गये । बाजार नागा हो गया । गोंयड़े के खेत का बैगन और फूलगोभी बेचने लायक हो गये थे । परदेशी ने राजमती से कहा,‘ जितेन्दर की माई! बाबू से कहिये, साइकिल पर सब्जी लाद कर, पांचू कुंजड़ा की दुकान पर गिरा आएं। नहीं बेचेंगे तो बैगन जुआ जायेगा, गोभी फूलभंगा हो जायेगा। ….यह भी कहियेगा कि पहले बाजार-भाव पता कर लेंगे । दो-चार सब्जी बेचने वालों से पूछ लेंगे । नहीं तो अनाड़ी जान कर ठग देगा पांचू। और हां, मौर्या बीज भंडार वाले से पूछ लेंगे कि गोभी का कैसा बीज दिये थे ? दो सौ का एक पैकट दिये थे न, हाईब्रीड बीज बताकर ? कहे थे कि दो किलो से कम एक गोभी का फूल निकले तो आकर बताना ? बाबू बतायें कि दो किलो को मारो गोली, आधे में तो एको फूल नहीं लगा । बांझ हो गये पेड़ । पौधे तो ऐसे बढ़े थे कि लगता था, खेत में घुसना दूभर हो जायेगा ?’
‘इ दुनियाभर का बवाल हमसे ना होगा? बैगन, गोभी तो गांव के दीपचन्द ही खरीद लेंगे ? बाजार ले जाने की क्या जरूरत ?’ माई को झिड़क दिया था जितेन्दर ने।
‘बुरबक कहीं का ? दीपचन्द कम दाम देंगे । बाजार में ज्यादा मिलेगा। बाजार भाव, बाजार देख कर पता चलता है । मूरख, हमारी बात समझे तब न ! कोई बात कहो तो फट से इनकार! अरे हम अनपढ़ थे मगर मां-बाबूजी की बात काटते नहीं थे। एक यह नालायक हैं । बात निकली नहीं कि जवाब हाजिर ! घर में दाल नहीं है । बाजार जायेंगे तो दाल भी खरीद लेंगे ?’ परदेशी का बेसुरा राग चालू था। जितेन्दर को बाप का बड़बड़ाना पसंद नहीं । वह प्रताप ठाकुर की हवेली की ओर खिसक गया । परदेशी ठकुवाये बिस्तर पर पड़े रह गये ।
‘आप फिकर ना करिये ? हम माई-बेटी बाजार चली जायेंगी ।’ बोली थी राजमती।
‘अब यही दिन देखना बाकी था क्या? ….जाने दो। दीपचन्द को ही खेत में बुला लो ।’ परदेशी का चेहरा मलिन हो गया था। मन में कड़ुवाहट उतर आई थी।
रात में फिर दुबई का जिन्न प्रकट हो गया। ‘माई ! बाबूजी को समझाती काहें ना ? एक बार दुबई में काम मिल गया तो खेती-किसानी से जिनगी भर का छुटकारा समझो । शहर में मकान बनवा लेंगे। प्रताप बाबू कह रहे थे कि यहां के हिसाब से तीस हजार से कम तनख्वाह नहीं ?’
‘मगर एक लाख आसमान से टपकेगा ?’ इस बार राजमती का स्वर भी उचट गया । वह मरद की हालत देख गुस्से में फनफनाने लगी।
‘प्रताप ठाकुर मदद कर रहे हैं।’ जितेन्दर ने आवाज धीमी कर मां को समझाने की कोशिश की।
‘ठाकुर लोग मुफ्त में मदद नहीं करते ? समझे ? साठ साल से इन्हें देख रहा हूं ?’ परदेशी के कानों में राजमती और जितेन्दर की आवाज पहुंच गई थी। वह मां-बेटे की बातों पर कान लगाये थे। जितेन्दर की बात सुन बिगड़ गये थे परदेशी।
‘यही कहे होंगे न कि उनके मकान के सामने जो अपना गोंयड़े वाला दस कट्ठा खेत है, उन्हें बेच दूं ?’
‘बेचने को नहीं कह रहे हैं?’
‘तो रेहन रखने के लिए कहे होंगे ? दस साल से फांसने में लगे हैं स्वर्ण सिंह। अपने दुआर के सामने मेरी जमीन देखना नहीं चाहते । वहां उन्हें राइस मिल बैठानी है। कम्बाइन, ट्रैक्टर और ट्रक खड़े करने हैं।’
जितेन्दर कुछ पल के लिए हैरान रह गया । ‘बाबूजी बिन बताये कैसे जान लिए ? किसने बताया होगा ? प्रताप ठाकुर ने तो केवल हमीं से कहा था ? रही बात फांसने की, तो फांसेंगे कैसे ? तीन साल का समय दे ही रहे हैं ? रेहन में लिखा जायेगा कि अगर तीन साल में एक लाख नहीं लौटाया तब खेत रजिस्ट्री करनी पड़ेगी ।’
वह फिर समझाने लगा-‘बाबूजी! लोगों को पता भी न चलेगा और दो साल के अंदर खेत छुड़ा लूंगा । रेहन अवधि में भी जोतेंगे-बोयेंगे आप ही ?’
‘न लौटाया तो ?’ परदेशी ने आशंकित मन सवाल किया।
‘काहें न लौटायेंगे ? दुबई जाने के बाद, पहला काम यही करूंगा । आप क्या समझते हैं, वहां जाकर अवारागर्दी करूंगा ?’

आखिर परदेशी को झुकना पड़ा । जितेन्दर की माई ने हस्तक्षेप किया, ‘लिख दीजिए रेहन । बाकी जमीन बेचकर बेटी की शादी कर दीजिएगा । हम दोनों परानी भीख मांग कर या वृद्धा पेंशन पर जिनगी गुजार लेंगे । बाबू का मन करेगा तो कफन देने आयेंगे । नहीं आयेंगे तो कोई न कोई क्रिया-कर्म कर ही देगा।’
अंततः गोंयड़े के खेत को परदेशी ने स्वर्ण सिंह के नाम रेहन लिख दिया । उधर स्वर्ण सिंह ने परदेशी के हाथ में एक लाख रुपए रखते हुए जमींदारी काल की बेदखली वाली मुस्कान बिखेरी थी।
दोस्त के लिए प्रताप सिंह ने दुबई भेजने की गारंटी नहीं ली। पहले तो काम दिलाने की गारंटी ले रहे थे लेकिन रेहन के बाद पुराने ढर्रे पर आ गये । उनके बाबूजी ने कुछ हिदायत दी थी। तभी प्रताप ठाकुर ने जितेन्दर को समझाया था, ‘देखो दोस्त! मुंबई में हसन गल्फ वर्कर्स एजेंसी से मैंने तुम्हारे लिए बात की है । वैसे तो वहां जेदा वर्कर्स वीजा एजेंसी भी बेहतर काम उपलब्ध करा रही है लेकिन तुम दोनों में से जो ठीक लगे, उसी से बात करना। मुझको अपना कमीशन नहीं चाहिए। दोस्त से क्या कमीशन ? तत्काल पासपोर्ट बनवाने के लिए मैं तुम्हारे वास्ते एजेंट के पास चलूंगा।’

फोटो- ज़फर अंसारी

जितेन्दर का पासपोर्ट बन गया और वह मुम्बई के लिए प्रस्थान कर गया था । चलते समय बाबूजी ने कई बार रुपये संभाल कर रखने की हिदायत दी थी।
मुंबई के जिस एजेंट के पास जितेन्दर गया, उसने उसे एक महीना रोके रखा। दुबई की नौकरी के लिए बाकायदा थाणे थाने के एक बाहरी इलाके में इन्टरव्यू हुआ । हफ्ते भर बाद, सुबह 11 बजे उसे एक रेस्टोरेंट में बुलाया गया। वहां उससे दो लोग मिले । दोनों ने अपने को इन्टरव्यू लेने वाली एजेंसी का एजेंट बताया। आकर्षक वेतन आदि के बारे में बताते हुए बधाई दी। खाना खिलाया । फिर कार में बैठाकर एक लाख रुपए लिए और दुबई की नौकरी के संबंध में अंग्रेजी में लिखा नियुक्ति पत्र थमाया । कहा, शाम 7 बजे दुबई की फ्लाइट है । तुम यहीं इंतजार करो । वीजा, हवाई टिकट लेकर हम दोपहर बाद, तीन बजे इसी रेस्टोरेंट में मिलेंगे और तुम्हें हवाई अड्डे ले चलेंगे ।
जितेन्दर की खुशी का ठिकाना न रहा । सबसे पहले उसने प्रताप ठाकुर का फोन कर एहसान जताया । इस शुभ समाचार को माई-बाबूजी को बताने को कहा। उसके बाद उसने कुछ अन्य दोस्तों को भी फोन किया और एजेंसी वालों के इंतजार में बैठ गया ।
तीन बजे… फिर चार…,मगर कोई आया नहीं । जितेन्दर की धड़कनें थोड़ी तेज हुईं तो उसने एजेंट का मोबाइल नम्बर मिलाया। जो मोबाइल नम्बर पिछले कई दिनों से आराम से मिल रहे थे, अब स्वीच ऑफ थे। पता नहीं क्यों, दिल कांपने लगा । पांच और फिर शाम छः बजते-बजते वह थरथरा कर सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठ गया। आने-जाने वालों ने कई बार किनारे बैठने को कहा, मगर उसके कान बहरे हो चुके थे। अब तो हवाई अड्डा पहुंचना संभव ही नही ? कहीं फ्लाइट का समय बदल तो नहीं गया ? कहीं जाने की तिथि तो नहीं बदल गई ? आखिर किससे संपर्क करे वह ? उसके चेहरे का रंग बदलने लगा था। दिल की धड़कन तेज हो गई थी। होंठ सूख गये थे। एजेंटों के मोबाइल नम्बर अभी भी बंद थे। भाग कर वह इंटरव्यू वाली जगह पर गया मगर उस दुकाननुमा दफ्तर में तो ताला लगा था। जितेन्दर बेतहाशा सड़क पर भागने लगा था।
उसके बाद क्या हुआ किसी को जानकारी नहीं । जितेन्दर का मोबाइल नम्बर भी स्वीच ऑफ बताने लगा था। माई ने प्रताप ठाकुर से कई बार जानना चाहा, मगर वह कुछ बताने की स्थिति में नहीं थे।
दूसरी विपत्ति ठीक उस दिन आई, जिस दिन सरकारी ‘किसान चैनल’ की शुरुआत हुई थी। बेटा दुबई गया या नहीं, प्रताप बाबू बता नहीं रहे थे। यह देख परदेशी हदसते जा रहे थे। न प्रताप ठाकुर मन की बात बता रहे थे, न परदेशी के मन की बात समझना चाहते थे। ‘हो सकता है बेटा दुबई चला गया हो और अभी वहां मोबाइल नम्बर न मिला हो ? परदेश का कानून कोई क्या जाने ?’ बेचैन मन को दिलासा देते परदेशी।
दो माह तक जितेन्दर की कोई खबर न मिली तो परदेशी के साथ पूरे परिवार ने अन्न-जल त्याग दिया था। पति-पत्नी हर शाम, प्रताप बाबू के दरवाजे पर हाथ जोड़े बैठे रहते । कहते, ‘ठाकुर साहब! मेरे बेटे का पता लगाइये ? प्रताप ठाकुर, परदेशी को ओर ताकते तक नहीं ? मुंह फेर कर जवाब देते, ‘जहां तुम हो, वहीं मैं हूं । क्या बताऊं कि कहां है जितेन्दर ? बदमाश तो था ही । नौकरी के घमंड में हमें भूल गया होगा ?’
गेहूं की कटाई की जिस दिन शुरुआत थी, उसी दिन हाथ में हंसिया लिए, कटे पेड़ की तरह खेत में पसर गये थे परदेशी। गांव वाले जब तक अस्पताल पहुंचाते, वह हार्ट अटैक से चल बसे । राजमती विधवा हो गई ।
‘बाबू हो ….कहां बाड़ ….. तोहार बाबूजी ……’ दहाड़ मार कर गिर पड़ी थी राजमती ? मुनिया के साथ-साथ गोंयड़े के खेत को टुअर होता देख, उसके स्वर अकबका रहे थे। टुअर होते वक्त में स्वर्ण सिंह ने अपने मन की बात यूं जाहिर की थी, ‘मैं तो चाहता था, परदेशी के अच्छे दिन आएं…पर प्रभु की इच्छा ! …… खैर ! जब तक मैं जिंदा हूं, राजमती और उसकी बेटी को अकेला नहीं छोड़ूंगा।’
तीन साल बाद जब ठाकुर साहब की राइस मिल चालू हुई थी, राजमती और मुनिया को सूप फटकारने, चावल की खुद्दी और भूसी को बोरों में भरने का काम मिल गया था।

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    By: सुभाष चन्द्र कुशवाहा

    जन्म- उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में 1961 में,
    कविता-संग्रह ‘आशा’, ‘कैद में है जिंदगी’ और ‘गाँव हुए बेगाने अब’ और तीन कहानी-संग्रह ‘हाकिम सराय का आखिरी आदमी’, ‘बूचड़खाना’ और ‘होशियारी खटक रही है’ प्रकाशित हुए हैं। इसके अलावा उन्होंने ‘कथा में गाँव’ (कहानी-संग्रह), ‘जातिदंश की कहानियाँ’, ‘लोकरंग’ (1 और 2) आदि पुस्तकें संपादित की हैं।
    ‘लाला हरपाल के जूते’ कहानी संग्रह हाल ही में बैस्ट सेलर में शामिल हुआ है |
    1998 से ‘लोकरंग’ पत्रिका का संपादन कर रहे हैं।
    संपर्क – बी 4/140 विशालखंड
    गोमतीनगर,लखनऊ 226010
    mail- sckushwaha@gmail.com

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    भटकुंइयां इनार का खजाना: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)
    अमीन मियां सनक गये हैं: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

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