डकार’ पर जांच कराना टेढ़ी खीर है. जांच का शिरा हर सरकार से जुड़ता है इसलिए ‘सरकार’ इससे बच रही है. इतिहास कहता है कि एक विशाल प्रदेश का मुख्यमंत्री भी यह नहीं समझ पाया कि गरीब के पेट को कितना चारा चाहिए? कई बार अनुमान फेल हो जाते हैं.” (युवा लेखक डॉ कर्मानंद आर्यका व्यंग्य )

डकार की दरकार 

गरीबी का अपना ‘शास्त्र’ होता है. हालाँकि पूरा संस्कृत वांग्मय खगालने के बाद भी मुझे कोई ऐसी संहिता नहीं मिली जो केवल गरीबो के बारे में लिखी गई हो. हर बात में ‘शास्त्र’ की दुहाई देने वाले देश में यह एक विडंबना की तरह है. पंडित चुप. शास्त्र मौन. अजीब साठ-गाँठ है. आजादी के बाद ‘आजाद सरकारें’ ‘गरीबों’ का भला कर रही है. ‘गरीब’ हैं देवता की तरह स्थिर हैं कि चढ़ावा मिलने के बाद भी डकार नहीं लेते. अभी तक के इतिहास में डकार लेने वाले केवल एक देवता हुए. उनका नाम था कृष्ण. कहते हैं उनकी डकार के बाद ‘भक्तों’ का पेट भर आया. वर्तमान सरकार को ऐसे कृष्ण की दरकार है. कई बार अनुदान मिलने के बाद भी गरीब ‘सुरसा’ की तरह मुंह बाए खड़े हैं. अब कृष्ण क्या करें? सरकार कई कान्हों पर ट्रायल मार चुकी है पर कोई डकार लेने को तैयार नहीं. सरकार के लिए यही ‘धर्मसंकट’ है. सरकार जांच बैठा सकती है पर ‘डकार’ पर जांच कराना टेढ़ी खीर है. जांच का शिरा हर सरकार से जुड़ता है इसलिए ‘सरकार’ इससे बच रही है. इतिहास कहता है कि एक विशाल प्रदेश का मुख्यमंत्री भी यह नहीं समझ पाया कि गरीब के पेट को कितना चारा चाहिए? कई बार अनुमान फेल हो जाते हैं.

सरकार वस्तुतः विभागों के मेल से बनती है. सरकार को कुछ विभाग विशेष प्रिय होते हैं. कुछ में विस्तार की असीम संभावनाएं रहती हैं. वहीँ सरकार के कुछ विभाग अनुकम्पा के बल पर चलते हैं. अनुदान न आये तो उनका सांस लेना दूभर हो जाए. इसी क्रम में गरीब लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए पशुपालन विभाग ने अब तक की सबसे लेटेस्ट योजना तैयार की. पहले भी पशुपालन विभाग लेटेस्ट और उपयोगी योजनाओं के लिए जाना जाता रहा है. इस मामले में केवल कृषि विभाग से उसकी होड़ रहती है.

पांच साल पहले विभाग ने गरीबी रेखा से नीचे के परिवार की आर्थिक स्थिति के सुधार के लिए एक योजना बनाई थी. यह योजना उसकी लोकप्रिय योजनाओं में से एक थी. योजना का एक क्रायटेरिया था. गरीबों में पांच-पांच मुर्गे बंटवाने का प्रोग्राम. विभाग की हिदायत थी कि इन मुर्गों का बीमा करा लिया जाए. यदि मुर्गों का कुछ हो गया तो सरकार की जिल्लत हो जाएगी. सरकार इस योजना में सब गरीबों को शामिल नहीं कर पायी क्योंकि सरकार ने जो आंकड़ा जुटाया था उससे कहीं अधिक जनसँख्या गरीबों की थी. इस मामले में हर कोई गरीब था. विभागीय सूचना थी कि उसमें कुछ ‘बोलेरो क्लास’ भी शामिल हो गए है. सरकार समझदार. एक स्थानीय अखबार ने जब इस मुद्दे को उठाया तो सरकार की चिंता बढ़ गई. सरकार ने सोचा कि अगर लाभुकों को मुर्गे की जगह चूजे बंटवाये जाए तो उसे जिल्लत से मुक्ति मिल सकती है. क्योंकि ‘बोलेरो क्लास’ मुर्गे पालता नहीं बल्कि उसका सेवन करता है.

सरकार यह उम्मीद किये बैठी थी कि अगले पांच बरस में चूजा बांटने का यह काम पूरा कर लिया जाएगा. मुर्गी पालन से जुड़े एक बड़े व्यवसायी पर सरकार लगातार दबाव कि मुद्रा में थी. मुर्गों के समय में इस एजेंसी ने सरकार को कुछ अतिरिक्त सुविधाएँ दी थी. इसी से प्रेरित होकर सरकार के एक बड़े अधिकारी ने यह सलाह मुख्यमंत्री तक पहुंचाई थी कि गरीबों में बकरी आबंटन की योजना चलाई जाय. बकरी पालन के बाद सरकार की मिनी डेयरी की योजना भी परवान चढ़ने को थी. वहां का बजट बड़ा होता तो शायद वहाँ कोई डकार लेने वाला कृष्ण मिल पाता.

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