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डर…

         अनिरुद्ध गुप्ता

मैं डरता हूं,
उन पीपल के पेड़ो से
उन बंद कमरों के अंधेरे से।
डर लगता है उस नंदू को देखकर जो हर सुबह निकल जाता है,
रिक्शा और तराजू लेकर,
मुझे डर है कि कहीं उसकी पढ़ाई छूट ना जाए।
मै डरता हूं उन बड़े बड़े भाषणों से,
जो मुझ पर असर डालते है।
मुझे डर लगता है,
उन नेताओं से जो करते है विभाजन और असहिष्णुता की बातें,
मुझे डर है कि कहीं तीन साल से चार दीवारी में कैद शालिनी अपनी पहचान न खो दे।
मेरा डर लाज़मी है,
क्योंकि दिन-प्रितिदिन बड़ रही झुलसा देने वाली मंहगाई झुलसा रही है मध्यम वर्गीय परिवारों को।
मुझे डर है उन मंदिर की मूर्तियों से,

मस्ज़िद के मक़वरों से,
पंजाब की तलवारों से।
मै डरता हूं,
उनसे जो छीनना चहते है मुझ से मेरे बोलने की आज़ादी।
मुझे डर है उन सामजिक भेद-भावों से,
जो मुझे जात-पात, ऊँच-नीच के लिए उकसाते हैं।
पर अब मै नहीं डरूंगा,
क्योंकि मेरे पास ताक़त है एक जुट होने की,
अब वो डरेंगे मुझ से कि कहीं मै उन से डरना न छोड़ दूँ. |

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