युवा छात्र, संस्कृत कर्मियों की बनती यह सामाजिक दृष्टि अपने दौर की एक सुखद छाँव की अनिभूति से भर देती है, कुछ यही एहसास कराती हिन्दू कॉलेज में बी.ए.(आनर्स) सैकंड इयर के छात्र अनुपम त्रिपाठीकी यह कविता …..| – संपादक 

तारकोल की सड़क पर

अनुपम त्रिपाठी

उसका घर
मेरे घर से कुछ दूर है,
एक मौन बस स्टैंड,
यह चमकता चौराहा है उसका आँगन,
लगता है उसे देखने से,
कि,
अभी गर्भ से निकला है,
अभी
इस चिलमिलाती धूप में,
इस तारकोल की सड़क पर।

मैने घूर कर देखा है उसे,
किसी सरकारी गाड़ी के नीचे,
धुएं का अर्घ्य पाकर,
गर्भ से तारकोल की चादर ओढ़कर
उसने लिया है,
इस प्रतियोगिता मेँ भाग,
प्रतियोगिता पहियोँ की,
जीतने पर मिलेगा,
पूरा एक रुपया।

यह एक रुपया वह नहीं,
जिसे,दिया करती थीं अम्मा,
हमारे रोने पर उस इमली वाले के लिये,
जिसके पीछे-पीछे हम पूरी गली घूमते,
और
अंत में चाहते
खरीदना उसकी पूरी ठेली।
यह तो एक सिक्का है,
जिसके बीच में बना है
एक खूंखार शेर
जो चाहता है काट लेना,
उसका हाथ,
और छीन लेना उसका एक रुपया।
जानते हैं,
वह शेर दारु पीकर क्या कहता है?
“बच्चे देश का भविष्य हैं”

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    By: अनुपम त्रिपाठी

    अनुपम,हिन्दू कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय), में हिंदी प्रतिष्ठा तृतीय वर्ष के छात्र ।
    जन्म तिथि-22/7/1995
    साहित्य,शास्त्रीय संगीत,नाटक के प्रति मेरा विशेष रुझान रहता है।

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    ‘जपते रहो’ कविता (अनुपम त्रिपाठी)

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