देश के किसी भी नागरिक को समय पर न्याय न मिल पाना भी हमारे सरकारी तंत्र और लचर क़ानून व्यवस्था की पोल तो खोलता ही है, साथ में यह भी दर्शाता है कि  सदियों बीत जाती है पर बेबस और लाचार लोगों को इन्साफ नहीं मिल पाता है, उनकी आवाजों कहीं फाइलों में ही दबी रह जाती हैं | ऐसा की कुछ सच दिखाने का प्रास करती तरसेम कौर की कविता …...संपादक  

तारीख पे तारीख…. 

तरसेम कौर

तरसेम कौर

तारीखों में ही दबी
रह जाती है इंसाफ
के लिये आवाज़
बस मशालों तक ही
जलती है
इंसाफ के लिये आवाज़
इक युग बीत जाता है
मिलती हैं बस तारीखें
दर्द मर जाता है
चीख चीख कर
एक सुनसान जंगल में
गूंज कर जैसे वापिस
लौट आती हैं आवाजें
आंसू जम जाते हैं
नही पिघलतीं
इंसाफ के लिये आवाजें
रुकता नही है काफिला
जिंदगी का
बढ़ता चला जाता है
हाईवे पे जैसे
दिशाहीन सा
बुढ़ा जाते हैं बाल भी
पथरा जाती आंखें भी
खाली से हाथों में
भरी रहती हैं
बस तारीखें ।

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