नमिता सिंह

     डा0 नमिता सिंह

तीन मुलाकातें

मेरी और मिताली की पहली मुलाकात देहरादून में हुई थी। वहाँ के गवर्नमेंट गर्ल्स कालेज में दो दिन की सेमिनार थी। कथा साहित्य पर कोई विषय था। ‘विचार और सर्जनात्मकता’ या ‘सर्जनात्मकता का रूपांतरण और कथा साहित्य’ या ऐसा ही कुछ था। विषय ठीक से याद नहीं है अब। मेरी एक परिचित संयोजन समिति में थी, शायद इसीलिये मुझे भी इस सेमिनार का निमंत्रण मिला। अक्सर इसी तरह के लेनदेन के आधार पर आजकल सेमिनारों, संगोष्ठियों का आयोजन होता है। बहुत दूर की सोचा करते हैं आयोजकगण और कर्ता धर्ता। आखिर पैसे खर्च करते हैं तो कुछ अपना भी हित सोचेंगे ही।
मेरा एक कहानी संग्रह छप कर आया था। सोचा, वहाँ जाऊँगी तो कुछ ‘प्रमोशनल ’ प्रोग्राम भी हो जायेगा। अब तो ऐसा ही चलन है। फिल्में हों या साहित्य या व्यापार… विशिष्ट योजनाकारों द्वारा प्रमोशन कार्यक्रम अब ज़रूरी होने लगे हैं।
छपे हुए कार्ड में आमंत्रित करने वालों में प्राचार्या डा0 वीना घोषाल का और मुख्य संयोजक के रूप में डा0 मिताली गुप्ता का नाम था। डा0 मिताली से मेरा कोई पूर्व परिचय नहीं था। उसकी कुछेक समीक्षाएँ यदा-कदा पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ी थीं। लोगों का कहना था कि मेहनत करके लिखती है, आगे विकास करेगी। उसी कार्ड में मेरी मित्र उमा ने हाथ से दो लाइनें लिख दी थीं,
– ‘तुम्हें ज़रूर आना है। एक मौका है मिलने का…’
मैंने तुरंत स्वीकृति भेजी और पर्चा लिखने की तैयारी करने लगी। उद्घाटन के लिये जोशी जी को आना था। सोचा, इस बहाने उन्हें अपना संग्रह भी भेंट कर दूँगी। जोशी जी की जिस पर नज़र पड़ जाये, उसे साहित्य की चोटी पर चढ़ा समझो। मैंने कार्ड पर नज़र डाली। आलेख पढ़ने वाली सभी महिलाएँ थीं। कुछ अध्यापिकाएँ, कुछ हम जैसी लेखिकाएँ। एक सुधा वासुदेव थीं महिला मुद्दों पर काम करने वाली चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता। उनसे मेरा पत्र व्यवहार था। सोचकर अच्छा लगा कि उनसे भी मुलाकात होगी। आने जाने का किराया मिल रहा है, दो दिन देहरादून जैसी जगह में रहना। एक दिन सहस्रधारा और मसूरी जाने के लिये। वहाँ का कैम्पटी फॉल देखना है। सब कुछ अच्छा ही अच्छा। हामी भरने में कोई परेशानी नहीं थी।
मैं देहरादून पहुँच गयी। नवंबर का महीना। मौसम खुशगवार था। यूँ पहाड़ पहले जैसे तो रहे नहीं। बचपन में हमारी नानी अल्मोड़ा से हमें चिट्ठी लिखा करती थीं। गर्मी की छुट्टियों में उनका आग्रह वहाँ आने के लिये होता था। उनका एक वाक्य हमेशा चिट्ठी में रहता-‘और तो मैं क्या कर सकती हूँ, क्या दे सकती हूँ, ठंडी हवा और ठंडे पानी का निमंत्रण दे रही हूँ… नानी चली गयी और अपने साथ ही ठंडा पानी और हवा ले गयी। पहाडों़ में भी अब कितनी गर्मी होने लगी है। पंखे चलते हैं। ठंडा पानी जैसे भाप बनकर हवा हो गया है और बर्फ देखना जैसे ईद का चाँद।
बहरहाल, उस समय दिल खुश हुआ। सबेरे पहुँची थी ट्रेन। गुलाबी जाड़े का समय। इस समय तो हरसिंगार फूला करते हैं और हवाओं में खुशबू होती है। खुशग़वार मौसम था। स्टेशन पर मिताली को देखकर सुखद लगा। नीचे उतरकर थोड़ा आगे बढ़ी तो वह प्लेटफार्म पर खड़ी दिखी। मेरा मन फूलकर कुप्पा हो गया। उसने चिट्ठी में कालेज पहुँचने के लिये लिखा था और अब स्वयं स्टेशन पर मौजूद। उसने हँसकर हाथ मिलाया,-‘‘ आइये रजनी जी। सफ़र कैसा रहा-’’और बिना मेरा जवाब सुने आगे बढ़ गयी,
– ‘‘आप गेट के पास पहुँचिये, मैं आ रही हूँ-‘‘वह शायद किन्हीं दूसरे लोगों के आगमन और स्वागत के लिये रुकी थी।
पाँच मिनट बाद ही वह बाहर निकलने वाले दरवाजे पर थी। उसके पीछे कुली था सामान लिये। साथ में जोशी जी थे और उनके साथ थे शास्त्री जी, प्रभाकर शास्त्री।
मैंने दोनों को ही झुककर नमस्कार किया। एक ठहरे बड़े कथाकार-संपादक तो दूसरे हिन्दी के शीर्ष आलोचकों में से एक। जोशी जी हमेशा की तरह बेहद सजग। सत्तर साल की उम्र में भी तना-कसा शरीर। बाल घने और काले। होठों पर हर समय मौजूद मुस्कान, आत्म विश्वास और किंचित शरारत से भरी हुई।
शास्त्री जी से पहले इसी तरह के किसी आयोजन में मिलना हो चुका था। लेकिन, वे मुझे क्या पहचानते। पैंट-शर्ट में कसे कसाये। अपनी उम्र से कहीं अधिक जवान नज़र आ रहे थे। पता नहीं उनके नाम के आगे शास्त्री कैसे लगने लगा होगा। अत्यंत आधुनिक व्यक्ति। देखने में चुस्त-दुरुस्त। यूँ शास्त्री कहने से धोती-कुर्ता पहनने वाले किसी परंपरागत किस्म के आदमी का चित्र उभरता है। पिछले पाँच साल से इतनी बड़ी यूनिवर्सटी में प्रोफ़ेसर थे, अध्यक्ष भी रह चुके थे।
मिताली बहुत उत्साहित लग रही थीं। जोशी जी पहुँच चुके थे। उद्घाटनकर्ता ही अगर मौके पर गच्चा दे जाय तो किसी भी सेमिनार का आधा बंटाधार तो हो ही जाता है। अब जोशी जी मौजूद थे और प्रभाकर शास्त्री को अपने साथ लाये थे इसलिये मिताली की खुशी दोगुनी हो रही थी।
सरकारी गेस्ट हाउस में खास मेहमानों के लिये तीन कमरे बुक थे। जोशी जी और शास्त्री जी के लिये एक-एक कमरा। बचा तीसरा कमरा मिताली ने अपने लिये रखा होगा। मैं बीच में फाँस जैसी अनजाने में अड़ गयी थी। निकालना मुश्किल था इसलिये मिताली ने मुझे अपने कमरे में ही एडजस्ट कर लिया। यूँ भी अकेले उन वी.आई.पी. मेहमानों के साथ वहाँ ठहरने से कोई अप्रिय सवाल उनके कॉलेज या संयोजन समिति में उठ सकते थे। हम तीनों बाहर के मेहमान एक साथ पहुँचे थे इसलिये यही उचित लगा होगा कि हम तीनों एक ही जगह ठहराये जायें। बाकी आने वाले लोगों की दो अन्य गेस्ट हाउसों में व्यवस्था की गयी थी।
मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ। शास्त्री जी का नाम निमंत्रण पत्र में नहीं था। उन जैसी साहित्य में प्रतिष्ठित हस्ती बिना बुलाये आ जाय…। खैर मुुझे क्या करना, यह सोचकर मैंने भी अपने कंधे उचका दिये।
– ‘‘रजनी, ये कमरा… तुम्हें मेरे साथ… कोई परेशानी तो नहीं होगी…?’’
– ‘‘कैसी बात कर रही हैं मिताली। ये तो मेरा सौभाग्य… आय, फील आॅनर्ड…’’
– ‘‘ओ0के0’’-और उसकी खूबसूरत धवल मुस्कान उसके चेहरे को जैसे और उजला कर गयी।
0 0 0

img-20150130-wa0001

        फराह नज़ीर

उद्घाटन सत्र भव्य था। हॉल खचाखच भरा हुआ था। जोशी जी तो विलक्षण वक्ता ठहरे। फिर प्रतिष्ठित कन्या महाविद्यालय। शहर के गणमान्य लोग, पत्रकार, लेखक और बड़ी संख्या में छात्राएँ, अन्य महाविद्यालयों के छात्र-अध्यापक। समकालीन साहित्य की नयी प्रवृत्तियों पर सारगर्भित उद्घाटन भाषण था जोशी जी का। उन्होंने विशेष रूप से स्त्रियों के बेबाक लेखन और खुलेपन का जि़क्र किया था। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अब स्त्री का परंपरागत रूप और गृहस्थ जीवन का प्रचलित स्वरूप, उसकी बंदिशें ध्वस्त हो रही हैं। इन्हीं ध्वस्त होते परंपरा के खंडहरों से नये समाज का, नये स्त्री जीवन का निर्माण हो रहा है… यहीं से नया साहित्य लिखा जा रहा है।
देर तक तालियाँ बजती रहीं।
– ‘‘इट्स रॉकिंग… वंडरफुल…’’ वाइस प्रिंसिपल मिस वंदना खड़े होकर जोर-जोर से कह रही थीं।
प्रभाकर शास्त्री विशिष्ट अतिथि थे। पता नहीं क्यों वे उखड़े-उखड़े से लग रहे थे। जैसे शरीर यहाँ है तो मन कहीं और। दाना चुगने के लिये तत्पर सावधान और सतर्क गौरैया की तरह इधर-उधर देखते, वातावरण को परखते-सूँघते। शायद इसी दुविधाग्रस्त मनःस्थिति के कारण उन्होंने ऐलान किया कि-वे इस सत्र में भाषण नहीं देंगे। उन्होंने मज़ाक करते हुए यह भी कहा कि कन्या महाविद्यालय में वह बिन बुलाये आये हैं… लेकिन वे प्रसन्न हैं और कल अपना वक्तव्य देंगे।
– ‘‘मैम! प्रो0 शास्त्री को तो हम जब चाहें बुला लें। उन्होंने पहले मना कर दिया था अपनी व्यस्तता के कारण…’’ मिताली प्रिंसिपल मैम को समझा रही थी और प्रो0 शास्त्री के ऐलान पर हंस रही थी।
प्राचार्या डॉ0 वीना घोषाल सचमुच गद्गद थीं।
– ‘‘मिताली, थैंक्स। तुमने जोशी जी को यहाँ बुला लिया। और हाँ! प्रो0 शास्त्री को कैसे एडजस्ट करना होगा, तुम देख लेना।’’ डा0 घोषाल चाय पर कह रहीं थीं।
– ‘‘मैम! प्रो0 शास्त्री को मैंने इसीलिये बुलाया। वे ही जोशी जी को लेकर आये हैं..’’

सच! मिताली जानती है काम कैसे होता है। अपना प्रभामंडल तो बनाना पड़ता है। घोषाल मैम को शायद मालूम नहीं होगा कि मिताली गुप्ता, प्रो0 शास्त्री की छात्रा रह चुकी है। उनका वरदहस्त रहा है उसके ऊपर! लगातार लिखने-पढ़ने के लिये वे प्रोत्साहित करते रहते हैं… यह जानकारी मिताली ने शाम को दी जब उस दिन का दूसरा सत्र समाप्त होने के बाद हम लोग गेस्ट हाउस जा रहे थे।
0 0 0
मिताली थोड़ी देर बाद अपना बैग लेकर आ गयी।
– ‘‘आराम कर रही हो रजनी…’’ मुझे लेटा देखकर बोली वह। हम लोगों के बीच खासी बेतकल्लुफी पैदा हो चुकी थी।
उसने मुँह हाथ धोया। साड़ी बदली और चली गयी। कह रही थी कि कल की व्यवस्था देखनी है उसे।
नौ बज गये। मैं थकी हुयी थी। कल का अपना पेपर निकाल कर दोहराया जो मुझे पढ़ना था। डायनिंग हॉल से फोन कॉल आ चुकी थी। मैं अकेले ही खाना खाने चली गयी। वी.आई.पी. गेस्ट अभी नहीं आये थे। वे लोग ठहरे बड़े साहित्यकार-लेखक। रात का डिनर ऐसे ही सूखे-सूखे थोड़ी लेते। अच्छा है दो जने हैं। एक दूसरे का साथ दे रहे होंगे।
मैं खाना खाकर आई तो देखा उन लोगों का कमरा बंद था। अपने कमरे में आकर मैंने नाइट गाउन डाला और सो गयी। मिताली का इंतजार करना बेकार था।
आँख लगी ही थी कि दरवाजे़ पर खट्-खट् हुई। दरवाज़ा खोला। मिताली थी।
– ‘‘अरे सो गयीं।’’
मैं उनीदी आँखों से देखती रही उसे चुपचाप!
– ‘‘चलो, थोड़ी देर बाहर बैठते हैं…’’
– ‘‘अब! इस वक्त!! टाइम देखा…’’
– ‘‘अरे ग्यारह भी तो नहीं बजा! चलो लॉन में चलते हैं…’’
मेरे चेहरे पर कोई उत्साह न देखकर फिर बोली,
– ‘‘कुर्सियाँ निकलवा ली हैं मैंने… अरे वो लोग इंतज़ार कर रहे हैं भई…’’
– ‘‘कौन लोग ?’’ मेरी भौहें अभी भी चढ़ी हुई थीं।
– ‘‘अरे जोशी जी और प्रो0 शास्त्री! जोशी जी पूछ रहे थे तुम्हें…’’ वो मानो मुझे बहला रही हो,
– ‘‘डा0 मिताली, मैंने कपड़े बदल लिये हैं। बार-बार ड्रेस चेंज करना मेरे बस की नहीं… और इस नाइट गाउन में मैं नहीं जा सकती बाहर।’’
– ‘‘ओफ फोे… तुम भी…’’
– ‘‘हाँ, आय’म ओल्ड फैशन्ड यार। पुराने ज़माने की समझ लो मुझे।’’
दो सेकिंड सोचते हुए उसने अपना बैग खोला। एक शॉल निकाली। हल्की-फुल्की सी शॉल थी।
– ‘‘लो! दादी अम्मां! इसे लपेट लो, और चलो अब…’’
दरवाजे पर सांकल चढ़ा, लगभग खींचती हुई सी ले गयी वह मुझे बाहर, लॉन में।
दो कुर्सियों पर जोशी जी और प्रो0 शास्त्री डटे हुए थे। दो खाली कुर्सियाँ हमारे लिये थीं। बीच में एक छोटी तिपाई थी और उस पर एक ऐश ट्रे। जोशी जी की सिगरेट के किस्से तो मशहूर थे लेकिन प्रो0 शास्त्री भी इतनी सिगरेट पीते हैं, मुझे मालूम नहीं था।
दोनों ने बहुत गर्मजोशी से हमारा नहीं, ऐसा लगा कि मेरा ही स्वागत किया। मैं पकड़कर लाई गयी हूँ, शायद इसका आभास उन्हें था।
जासूसी किस्सों में एक मुख्य कर्ता होता है और एक उसका कवर होता है। मुझे शीघ्र लग गया कि मेरी भूमिका कवर की है। शायद मिताली का कवर बनी थी मैं। प्रो0 शास्त्री अब भी वैसे ही चुप थे। शाम के तरल-गरल का कार्यक्रम शायद उन्हें कुछ सुकून दे पाया हो। मैं सचमुच उनींदी हो रही थी। बातें सिर्फ कानों से सुन रही थी… दिमाग खाली थी।
अचानक मुझे लगा कि बातचीत विवाह संस्था की निरर्थकता पर चल रही है। आधुनिक स्त्री के संदर्भ में इसको गै़र जरूरी और बाधक साबित कर रहे थे जोशी जी।
फिर उन्होंने एक कहानी सुनायी। पश्चिम की स्त्री की ईमानदारी और यौन संबंधों की स्वतंत्रता पर। कहानी का सारांश यह कि एक स्त्री अपने एक अंतरंग पुरुष मित्र के पास जाती है। उससे कहती है कि आज रात वह उसके साथ रहेगी। वह गद्गद हो उठता है। आधी रात को उस स्त्री के पति का फोन आता है। वह पुरुष मित्र फोन उठाता है और मना कर देता है कि उसकी पत्नी यहाँ नहीं आई थी। थोड़ी देर बाद फिर पति का फोन आता है-वह कहता है कि फोन उसकी पत्नी को दे दिया जाय। उसे मालूम है कि वह वहीं है और उसके साथ बिस्तर पर है। वह खुद उसे बताकर गयी थी कि रात वह अपने उस मित्र के साथ बितायेगी…
– ‘‘देखिये! इसे कहते हैं स्वाधीन स्त्री का चरित्र। उसकी बोल्डनेस। इससे भी ज़्यादा स्त्री-पुरुष संबंधों में ईमानदारी… क्यों!!’’ मानीखेज़ नज़रों से देखते हुए जोशी जी मुस्कुराये। पहले मेरी ओर देखा… कहानी का प्रभाव मेरे चेहरे पर टटोलते हुए और फिर मिताली को देखते हुए प्रो0 शास्त्री के चेहरे पर नज़रें गड़ा दीं-
– ‘‘क्यों! क्या कहते हो प्रोफ़ेसर!’’
– ‘‘मैं सहमत हूँ आपसे पूरी तरह। ये टैबूज़… ये रीति-रिवाज़… चलती चली आ रही लुटी पिटी जर्जर परंपराएँ… जिं़दगी इनसे मुश्किल हो जाती है… जीवन उन्मुक्त होगा तो मन-मस्तिष्क भी मुक्ताकाश में उड़ेंगे, आसमान छुएँगे। यूँ ही जिं़दगी में दुविधाएँ-बाधाएँ कम हैं जो मन की गाँठें और बढ़ा लें…’’
मेरा दिल किया कि इस पर कुछ अपनी बात कहूँ…. यह तो ऐसी बात थी जिस पर लंबी बहस की जा सकती थी….
लेकिन मैं चुप रही। मुझे लगा कि यह सब शायद किसी योजना के तहत कहा जा रहा है। विशेष प्रयोजन है इसका। एकाएक अपनी कवर वाली भूमिका का बहुत ज़ोर से अहसास होने लगा…
– ‘‘बापरे… बारह बज गये’’-मैंने उठते हुए कहा।
– ‘‘अरे तो क्या दूध पीती बच्ची हो, या अम्माँ डांटेगी… कम आॅन रजनी। मुझे तो समझ नहीं आता, कैसे कहानियाँ लिख लेती हो तुम…
– ‘‘अब मिताली लिखेंगी नयी कहानी-क्यों?’’ और मैं हँसती हुई अपने कमरे की ओर चल दी।
दस-पंद्रह मिनट बाद मिताली आई। उसके हाथ में एक किताब थी। मुस्कुराते हुये, गर्दन तानकर उसने मेरी ओर बढ़ाई।
मध्यकालीन भक्ति काव्य पर सद्यः प्रकाशित पुस्तक थी वह प्रो0 शास्त्री की जिसे उन्होंने मिताली को समर्पित किया था। अक्षर चमक रहे थे-‘‘मिताली के लिये जिसके सहयोग के बिना इस कृति की रचना असंभव तो नहीं लेकिन मुश्किल ज़रूर थी।’’
– ‘‘प्रोफ़ेसर साहब ने यह मुझेे डैडीकेट की है…’’ उसका खिला हुआ चेहरा एक बहुत बड़ी उपलब्धि की कहानी बयान कर रहा था।
– ‘‘बधाई बहुत-बहुत मिताली!’’ मैंने खुशी से थरथराते उसके दोनों हाथों को थाम कर पूरे सम्मान के साथ उसे पुस्तक सौंप दी।
मैं अपने बेड पर लेट चुकी थी। उसने मुँह धोकर नाइटी पहनी और अपने बिस्तर पर आ गयी।
– ‘‘लाइट आॅफ़ कर दूँ-’’
– ‘‘श्योर’’
मैंने आँखें बंद लीं। अचानक मेरे मुँह से निकला-
– मिताली, आर यू हैप्पी? बहुत खुश हो ना आज।’’
– ‘‘बहुत! बहुत खुश हूँ मैं। रियली, आय’म वेरी-वेरी हैप्पी…’’
अँधेरे में उसकी खुशी महक रही थी। उसके चेहरे की चमक से पूरा कमरा आकाश गंगा की दूधिया चाँदनी से गमक रहा था।
0 0 0
तीन साल बाद! हाँ, लगभग इतना ही अर्सा हुआ होगा, मैं अपने कॉलेज के काम से दिल्ली पहुँची। लखनऊ से हमारी ट्रेन सबेरे ही दिल्ली पहुँच गयी थी। मेरे साथ मेरे विभाग की एक सीनियर लेक्चरर भी थीं। अबकी एक राष्ट्रीय संगोष्ठी करने के लिये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से हमारे कालेज को भी अनुदान मिल गया था। जो तीन लोग हमारी लिस्ट में मुख्य अतिथि के लिये चिन्हित थे उसमें से दो का आना निश्चित नहीं हो पा रहा था। तीसरे नंबर पर प्रो0 शास्त्री का नाम था। हमारी प्राचार्या महोदया का आग्रह था कि खुद जाकर उनसे मिलना चाहिये ताकि स्थिति साफ हो और कार्यक्रम की रूपरेखा जल्दी से जल्दी मुकम्मल हो सके।
स्टेशन के वेटिंग रूम में ही हम दोनों तैयार हो गये। इरादा था कि सबेरे ही उन्हें पकड़ लें। दिल्ली में तो लोग सबेरे के निकले हुए कब वापिस दरवाजे की चौखट लाँघे, मालूम नहीं। फिर प्रोफ़ेसर साहब सिर्फ अध्यापक ही नहीं लेखक भी हैं इधर-उधर कार्यक्रमों में व्यस्त रहते हैं। सुना था घर-परिवार साथ नहीं रखते…. इसलिये जल्दी पहुँचना और भी ज़रूरी था। बहरहाल, हम नौ बजे के लगभग घर के दरवाजे पर थे।
बाहर के हिस्से की सजावट… बेहद सुरुचिपूर्ण। लॉन की हरी घास और करीने से लगे पौधे और फूल बता रहे थे कि उनकी देखभाल नियमित होती है और मन से होती है। छोटा-सा चौकोर बरामदा। कोने में अजंता-एलोरा की तीन चार मूर्तियों की टेराकोटा में अनुकृतियाँ रखी हुई थीं। छोटे गमलों में लगे फर्न्स। ऊपर से एक शुभचिन्ह जैसा कुछ लटक रहा था। कौन कहेगा अकेले रहते हैं प्रोफ़ेसर साहब। अच्छा लगा उनके व्यक्तित्व के इस खूबसूरत पहलू को देखकर। घंटी बजानी चाही, लेकिन कहीं दिख नहीं रही थी। मेरे साथ खड़ी मिसेज वर्मा ने दरवाजे के पास दीवार पर लगे एक छोटे से बया के घोंसले की ओर इशारा किया। सच… घोंसले के सामने के बड़े गोल छेद से घंटी के स्विच से बंधी एक छोटी-सी डोरी लटक रही थी।
– ‘‘क्या बात है! एक दम नया आइडिया…’’
घंटी तो बजी…. लेकिन कोई उत्तर नहीं। एक मिनट बाद फिर जोर से दो बार डोरी खींची गयी… तीसरी बार की जरूरत नहीं पड़ी, शायद कोई आ रहा था।
दरवाज़ा खुला। सामने कमरे की चौखट के भीतर एक महिला थी… चेहरे पर असंपृक्त सा भाव। माथे के बल दरवाज़ा खोलने की नाखुशी जता रहे थे। शायद हम गलत समय पर आये थे…. नाइट गाउन पहने महिला को कपड़े बदलने का समय नहीं मिला था।
एक सेकेंड के लिये मैंने अपने दिमाग पर जोर डाला।
– ‘‘डा0 मिताली गुप्ता! आप!! कैसे…’’ फिर अचानक मेरे दिमाग में कुछ कौंधा और मैंने अपने सवालों पर एकदम लगाम लगाई। अपना स्वर सामान्य किया,
– कैसी है डा0 मिताली। हमें प्रो0 शास्त्री से मिलना था.. क्या अंदर नहीं हैं…
यह पहचान मिताली के लिये परेशानी पैदा करने लगी। पहले की तरह ऊर्जा से भरी-छलकी नहीं लग रही थी। नज़रें भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पा रही थीं। कभी ऊपर देखती-कभी नीचे… मिताली दुविधा ग्रस्त थी।
मुझे लगा हमने यहाँ आकर बड़ी गलती कर दी। मिसेज वर्मा खड़ी हम दोनों का मुँह ताक रही थीं।
– ‘‘पूरे तीन साल बाद मुलाकात हो रही है। याद है देहरादून में… आर.टी.डी.सी. के गेस्ट हाउस में…। कितनी गप्पें मारी थीं हमने… दो दिन बहुत अच्छे बीते थे मिताली जी…’’ मैंने पहचान का सूत्र थमाना चाहा ताकि उन यादों के रास्ते पर वह और मैं खड़े होकर सामान्य हो सकें।
हल्के से मुस्कुराई मिताली। दरवाजे के सामने से हटकर हमें रास्ता देते हुये बोली,
– ‘‘रजनी शर्मा हैं न आप। पहचान गयी मैं-अंदर आइये…’’
मैंने मन ही मन राहत की साँस ली।
– ‘‘दरअसल, प्रोफ़ेसर साहब हैं नहीं! कल रात निकल गये वह। शायद आज रात तक आ जायं…’’
फिर बेहद उतावलेपन बोली,
– ‘‘प्रोफ़ेसर साहब आज कल नई किताब पर काम कर रहे हैं, हम दोनों के नाम से ही जायेगी किताब… इसी वजह से मैं….’’
उन्हें और उलझन में पड़ने का मौका दिये बिना मैं बोल पड़ी,
– ‘‘बहुत बधाई डा0 मिताली, एडवांस में। आपकी किताब जल्दी आये, और किताबें भी आयें। आपकी मेहनत सफल हो… आॅल द बेस्ट मिताली जी…’’
हम लोग फिर उठ लिये। अपनी प्राचार्या की ओर से लिखा गया अनुरोध पत्र हमने उन्हें ही सौंप दिया और कहा कि वे हमारी सिफारिश करें कि प्रोफ़ेसर साहब हमारा आतिथ्य ग्रहण करने को तैयार हो जायं । इस अनुरोध पर एक बार फिर उसका चेहरा चमकने लगा। वह पत्र हाथ में लेेते हुए अब नॉरमल थी। शायद यह जिम्मेदारी का अहसास था।
हम चलने लगे। उसे और ज़्यादा तनाव नहीं देना चाहते थे। बेचारी तभी सो कर उठी होगी। बाहर निकलते-निकलते मैंने शरारतन पूछ लिया,
– अब देहरादून नहीं रहतीं आप…
उसकी ज़बान फिर अटकने लगी। पहचान न होती तो वह हमें डाँट देती, लेकिन अब संभव नहीं था। गेस्ट हाउस, वहाँ का लॉन, जोशी जी और शास्त्री जी के साथ आधी रात तक गप-शप! जोशी जी की कहानी… सब कुछ तो हमें याद था।
– नहीं… छुट्टी पर हूँ… स्टडी लीव…
– ‘‘अरे वाह! फिर तो एक क्या दो किताबें तैयार कीजिये। और बताऊँ… डी0लिट् भी कर डालिये लगे हाथ…’’
फिर वही बुरी आदत, मैं बिना मांगे सलाह दे रही थी।
– ‘‘चलिये! डा0 मिताली गुप्ता, आज आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। खुश तो हैं न अब आप…’’
मेरी ओर नज़रें उठाकर ‘फिक्क’ से हंस दी वह। फिर वही सफेद मोती जैसे दांतों की लड़ी चमक गयी। बच्चों जैसी हंसी थी उसकी जिसे उसका मनचाहा मिल गया हो। अपनी उम्र से कहीं छोटी… ताज़गी भरी लग रही थी।
लौटते हुए मैंने सोचा कि आदमी को उसका मनचाहा मिल जाय, इससे बड़ा सुख-सौभाग्य और क्या हो सकता है। एक जिं़दगी, उसमें भी गिरते-पड़ते रहे…. तरस-तरस कर जिये… क्या अक्लमंदी है।
0 0 0
डा0 मिताली गुप्ता से इसके बाद पिछले पाँच-छह साल तक मिलना नहीं हुआ।
तीसरी मुलाकात तो अभी हुई। पंद्रह दिन पहले पुस्तक मेला में। यूँ तो हर तीसरे साल दिल्ली में यह एक बड़ा हलचल भरा आयोजन होता है जिसमें सिर्फ दिल्ली वाले ही नहीं, पूरे देश के लोग इसमें शामिल हो जाते हैं। पुस्तक प्रेमी और गै़र प्रेमी…. सभी अपनी उपस्थिति दर्ज करना जैसे कर्तव्य समझते हों। किताबें उलटना पलटना… फैशन भी तो है… पढ़े लिखे होने का भावात्मक संतोष भी देता है। किताबों के बीच से गुजरते हुए, किताबों की गंध के बीच एक सुखद अहसास होता है। आउटिंग और मेल मिलाप का भी अवसर है यह।
मैं तो शायद हमेशा की तरह फिर घर-गृहस्थी की झंझटों में उलझकर रह जाती, अगर लाइब्रेरी की ओर से मुझे पुस्तक मेला में जाने और बीस हज़ार की किताबें आर्डर करने की जिम्मेदारी न सौंपी गयी होती। लाइब्रेरी ग्रांट का पैसा आया था और मार्च तक उसे बराबर करके हिसाब देना था।
यूँ इस बीच कई उड़ती-उड़ती खबरें आती रहीं। प्रो0 शास्त्री के बारे में भी अक्सर तरह-तरह की बातें हवा में तैरती रहतीं। अब गुरु और शिष्याओं के बीच संबंध चर्चा का विषय नहीं बनते। उदारीकरण के माहौल ने स्त्री-पुरुष संबंधों को भी सहजता प्रदान की है। अनेक समस्याओं का निराकरण किया है और जीवन को सहज बनाया है। बदलते सामाजिक मूल्यों में जीवन की सहजता एक बड़ी उपलब्धि है। यह सहजता ही तो खुशी का माध्यम बनती है।
सुना था कि प्रो0 शास्त्री का परिवार कभी उनके साथ नहीं रहा। कैसे रहता? वे बौद्धिकता के शिखर पर, साहित्य, समाज के लिये समर्पित। कितनी योजनाएँ-कितने विचार-कितना कुछ करना! सब इसी जीवन में। हर साल गर्मियों में गाँव जाते। खूब पैसा-टका देकर आते। बड़ा-शानदार घर बनवा दिया था जो गाँव के लोगों के लिये ईर्ष्या का सबब था।
डा0 मिताली गुप्ता ने देहरादून छोड़ दिया। सुना था दिल्ली में किसी सरकारी संस्थान में राजभाषा अधिकारी हो गयी है। ये अच्छा हुआ। घरवालों को छोड़कर आई और अपनी मजऱ्ी का जीवन जी रही है, फिर किसी किस्म का अपराध बोध क्यों हो! अपना कमाओ-ठसके से रहो… दुनिया ठेंगे पर।
लेकिन अबकी बार मिताली से मुलाकात हुई तो अजीब लगा। पता ही नहीं चला कौन किसे ठेंगा दिखा रहा है। दरअसल उसको तो मैंने बाद में देखा। फव्वारे के पास प्रो0 शास्त्री थे। लंबे-लंबे डग भरते चल रहे थे। चार-पाँच लोग दायें-बायें। पूरी मित्रमंडली साथ थी उनके। पुस्तक मेला के आखिरी दो दिन बचे थे इसलिये भीड़ भी ज़्यादा थी। प्रगति मैदान की विशालता और गेट से लेकर विभिन्न हॉलों तक जाने का इतना लंबा रास्ता कि अच्छे भले आदमी को थका दे। फिर भीड़ से बचने की अलग चिन्ता। ऐसे में किसे ध्यान रहेगा कि कौन आपके पास से गुज़र गया।
उनकी खनखनाती हंसी ने ध्यान खींचा। कुछ लोगों की आवाज़ को आप हज़ारों की भीड़ में भी पहचान सकते हैं। प्रो0 शास्त्री की हँसी मानो उनके पूरे व्यक्तित्व को साकार कर देती है। ऊर्जा से भरी उनकी जोरदार हंसी।
मैंने घूम कर देखा। प्रो0 शास्त्री ही थे। हँसते-बतियाते। शायद कोई मज़ाक-कोई लतीफ़ा चल रहा था। अब कहाँ सबके बीच में घुसकर नमस्कार करूँ-मैं चुपचाप कट ली वहाँ से।
हम लोग आगे बढ़ रहे थे रेस्त्रां की ओर कि कुछ पेट पूजा हो जाय। तभी नज़र पड़ी डा0 मिताली गुप्ता पर। मैंने घूमकर देखा… प्रो0 शास्त्री तो खासे आगे थे। यह अकेली-अकेली कहाँ टहल रही हैं ?
लेकिन मिताली को हुआ क्या? बीमार नज़र आ रही थी! आर्थराइटिस की मरीज़ हो गयी थी शायद। पैंतीस-चालीस के बाद तो सत्तर-अस्सी प्रतिशत लोग कमोबेश आर्थराइटिस के मरीज हो जाते हैं। हड्डियाँ चटखने लगती हैं या कि चटखारे लेने लगती हैं। उसका एक पैर लचक रहा था। लगता था जैसे खींच रही हो आगे बढ़ने के लिये। दाँये-बाँये झुकती-पैर खींचती… क्या अपनी तरफ़ कोई ध्यान नहीं देती?
मेरे सामने देहरादून के गेस्ट हाउस के लॉन में खिली-खिली, कुछ शरमायी-कुछ सकुचाई ताज़ा हवा के झोंके सी मिताली कौंध गयी। बिल्कुल ही भूल गयी है अपने को! साड़ी का पल्लू कहीं जा रहा है, शॉल कहीं लटक रही है….
– ‘‘हाय, मिताली जी’’ मैं फौरन उसके सामने पहुँच गयी थी, जैसे रास्ता रोक रही हूँ….’’ कैसी हैं! और…
– ‘‘अरे! रंजनी’’-मुस्कुराहट तैर आई उसके होठों पर। लेकिन नज़र सामने टिकी थी-किसी को ढूँढ़ती… पीछा करती…। प्रो0 शास्त्री शायद किसी हॉल में चले गये थे, इसलिये नज़र नहीं आ रहे थे।
– ‘‘और सब ठीक’’! मिताली बातों को कट शार्ट करना चाहती थी। मैं उसकी दुविधा समझ गयी।
– ‘‘आप प्रो0 साहब को देख रही हैं न! वे मुझे अभी हॉल नंबर बारह की ओर जाते दिखे थे।’’
– ‘‘मित्रों के साथ होंगे! बस! मित्रगण मिल जायं तो सब भूल जाते हैं। उन्हें शायद याद भी नहीं कि मैं साथ में हूँ। अच्छा चलती हूँ, इधर-उधर हो गये तो ढूँढ़ना मुश्किल होगा…’’ वह बोलने में कुछ हाँफ रही थी। जल्दी-जल्दी चलने की कोशिश से था शायद।
– ‘‘मिताली जी’’…. मैं आवाज़ देते-देते रह गयी। नहीं, अब कुछ नहीं कहूँगी। मैं पूछना चाहती थी,
मिताली… आप खुश तो हैं न! आर यू हैप्पी…।
अब खुशी रास्ता चलते थोड़ी दिखाई देती है! यह तो अंदर की चीज़ है न!

Leave a Reply

Your email address will not be published.