(किसी  लेखक  की भाषा जब भावनाओं को आकार देने लगे और पाठक से संवाद  का  रिश्ता कायम कर ले तब  उस लेखक को और-और लिखना चाहिए…क्योंकि भाषा अपनी ताकत के साथ अभिव्यक्ति को एक नया आयाम देती है. प्रतिभा का लेखन ऐसा ही लेखन है..humrang  के  पाठकों के लिए प्रतिभा के तीन शब्द चित्र )

तीन  शब्द-चित्र  :  प्रतिभा  

प्रतिभा

प्रतिभा

एक : कभी-कभी 

कभी ख़ाली होना इतना
कि लबालब भर जाना ख़ालीपन से
छलक पड़ना किसी काग़ज़ पर
और भर देना उसे आकंठ …..

दो

समय की वलय-गाथा

कभी ऐसा लगता है जैसे जिंदगी बस शुरू होकर एक ऐसे मोड पर चली गई है जहा स्टेयरिंग या तो किसी और के हाथ में होता है या ऑटो पायलेट मोड पर चला जाता है ।
इस गाड़ी में बैठा हर शख़्स ड्राइवर है बस मेरे अलावा …. स्ट्रेंज ! कभी ऐसी फीलिंग आती है मानों लिफ़्ट मांगकर चढ़ गई हूँ इस गाड़ी में…
पहले इस बात पर बहुत झल्लाहट होती थी अब वो आदत भी जाती रही …
हताश होकर बस बैठने भर की जगह ढूंढ़ती हूँ लेकिन देखती हूँ कोई जगह ख़ाली नहीं है सारी सीटें फुल !
मैं चुपचाप पीछे चली जाती हूँ डिक्की के काँच के पास बैठकर उसे धीरे से हटा देती हूँ और ताज़ी हवा फेफड़ो में भर लेती हूँ ..
रफ़्तार की विपरीत दिशा में बैठना भी कितना सुकून देता है कभी-कभी ….
जी भरकर देखती हूँ जाते हुए नज़ारों को, दोनों हाथ बाहर निकालकर उन्हें छू लेती हूँ, अलविदा कहते चलती हूँ …..
आगे जिंदगी का तेज़ संगीत बज रहा है जो मुझ तक आते-आते आवाज़, संगीत और शब्दों में टूट जाता है मैं जोड़ने की कोशिश भी करती हूँ तब भी वह रिदम वापस नहीं आ पाती … हर टूटन के बीच पड़ी दरारों से बह जाती है लय ।
हटाये हुए काँच की जगह से भीतर आती बारिश और धूप में खुद को चमकते देखती हूँ तो लगता है जैसे
सदियों से चलती हुई ज़िन्दगी और छूटते हुए दृश्यों के बीच पड़े-पड़े मैं फॉसिल से बनने वाला खूबसूरत और बहुमूल्य ‘एम्बर स्टोन’ बन गई हूँ …. समय की वलय गाथा कहता हुआ ….

तीन

खामोशियाँ पहनती रूह… 

साभार google से

साभार google से

किसी शाम झील के किनारे निकल जाती हूँ लेकिन पहुँचते ही भीड़ को देखकर एक हताशा घेर लेती है …
जाने इन झीलों, नदियों, समन्दरों को शाम ढ़ले यूँ मज़मा लगाने की आदत क्यों होती है ?
दूर हो जाना चाहती हूँ इन शहरों से इन मज़मों से … चुपचाप घर लौट आती हूँ
आईने में ख़ुद को देखती हूँ तो मैडम तुसाद का वैक्स म्युज़ियम याद आता है मैं घबराकर गर्म पानी की फुहारों के नीचे खड़ी होकर धीमे-धीमे पिघला देती हूँ तुम्हारे नाम का मोम अपने शरीर से,
मेरी त्वचा को साँस लिए बहुत दिन हो गए है …
दरवाज़े के पीछे टंगे अपने पुराने दिन धूल झाड़कर वापस पहन लेती हूँ
गुलदस्ते के नीचे दबा अपना अस्तित्व उठाकर चाय के साथ उबालती हूँ और पी जाती हूँ
छनाक !! से एक आँसू गिरता है, मैं कप को और कसकर पकड़ लेती हूँ …
भीतर कुछ बेआवाज़ टूटता है, एक स्तब्ध सी ख़ामोशी कानों से होती हुई रूह में उतर आती है …. क्या टूटा ?
कितनी तरह की ख़ामोशियों को पहनती है रूह तमाम उम्र ?
मैं अपना ध्यान भटकाने के लिए किसी क़िताब में उतर जाना चाहती हूँ लेकिन अक्षर फिर बाहर धकेल देते है कहाँ जाऊँ समझ नहीं आता !
जाने आँखों के बाहर नींद है या रात ? दोनों का रंग काला है ….
अँधेरा इतना कि सपने भी राह भटक जाय, दूर कही कुछ अजनबी से सपने दिखते है …
एक औरत घबराकर कब्र से बाहर आती है और चैन की एक गहरी साँस लेती है उसकी आँखों में विस्मय और उल्लास दिखाई पड़ता है ।
हर चीज़ को देखती उसकी नज़र ऐसे लगती है मानों पहली बार अपनी आँखों से देखने का सुख ले रही हो, औरत डगमगाती हुई चल पड़ती है कि तभी एक हाथ उसकी ओर बढ़ता है, उसे थाम लेता है … औरत खिलखिला कर हँस पड़ती है
अगले ही पल हाथ उसे दूसरी कब्र में ले जाकर छोड़ देता है औरत फिर विस्मय से हाथ की तरफ देखती है और मुस्कुराती हुई क़ब्र में लेट जाती है एक निश्चिंतता के साथ….

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