आधुनिक समाज में भी सदियों  से चली आ रहे  जातीय पुरुषवादी वर्चस्व को नकारते हुए, अपना अस्तित्व बनाए रखना किसी भी महिला के लिए आज भी उतना ही  मुश्किल हैं  जितना कि वर्षों पहले था | बेशक महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई हो लेकिन इस पित्रसत्तात्मक समाज में अभी भी पुरुषों की मानसिकता में कोई ज्यादा बड़े परिवर्तन दिखाई नहीं देते हैं चाहे पक्ष फिर प्रेम का ही क्यों न हो | इसी जातीय प्रेम के दंश को बयाँ करती है डॉ कौशल पंवारकी कहानी | संपादक 

तेरे कप की चाय नहीं  

पंवार कौशल

पंवार कौशल

“देखो न नेहा, वो मुझसे प्यार नहीं करती, ऐसे कैसे हो सकता है……कि वो मुझसे प्यार न करे.” लगभग गिड़गड़ाते से लहजे से कहा था उसने. थूक गले में अटक सा गया था ओमप्रकाशा गुप्ता जी का. उसे इस तरह से गिड़गडाते देखकर नेहा को सरोज पर गुस्सा भी आया कि ओमप्रकाश कितना चाहता है उसे , पर… वो है कि उसे कोई भाव नहीं देती, ऐसे नजरदांज करती है जैसे वो कोई सामने पडी हुई चींटी हो | और अपने पैरों को बचाकर निकल जाती है, कई बार उसके इस व्यवहार से नेहा खिन्न सी महसूस करती पर ये उसकी अपनी चाहत थी कि वह किसे चाहे | क्या सोचने लगी हो, लगभग टोकते हुए से गुप्ता जी ने पूछा था उससे ? मैं क्या कर सकती हूं, सुनकर उसने फ़िर कहा कि “तुम बात करो न उससे. “तुम” सम्बोधन सुनकर नेहा को अच्छा नहीं लगा क्योंकि वह तो उसे आप कहकर ही बोल रही थी, पर फ़िर उसने इस बात को नजरदांज कर दिया | हां तो मैं क्या कर सकती हूं…..रुआंसी सी होकर कहा नेहा ने | तुम कुछ नहीं कर सकती? उखड़कर बोला वह…! नेहा मेरे गांव में अगर वह होती न तो इन जैसे चूहड़े-चमारों की लोंडियों की तरफ़ तो मै देखता तक नहीं और आज यह मेरे प्रेम को ठुकरा रही है, मेरा प्रेम वह कैसे नकार सकती है, उसकी इतनी मजाल की वह मेरे प्रेम को टुकरा दे | गुप्ता जी अपनी ही धुन में बोले जा रहे थे. पर नेहा तो दंग रह गयी उसकी बात सुनकर | फ़टी-फ़टी आंखों से उसे घूरती रही | उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उसको अपना दोस्त कहने वाले ओमप्रकाश में जातीय वर्चस्व कूट कूट कर भरा था. बस्स….. लगभग चिखते हुए नेहा ने उसके पास जाकर कहा-“ बस अब और नहीं, एक शब्द भी अगर अब तुमने सरोज के खिलाफ़ बोला तो मेरा हाथ उठ जायेगा, दफ़ा हो जाओ यहां से | प्रेम नहीं तुम्हारे जातीय वर्चस्व को तोड़ा है उसने. ये अधिकार तुम्हे किसने दिया कि “कोई भी तुमसे प्रेम कर सकता है……तुम जैसे लोग हम जैसी लड़कियों को अपनी जागिर समझते है. भोगा और फ़ेंक दिया. और इसे तुम प्रेम कहते हो…….तुम तो किसी के साथ बैठने के लायक तक नहीं. नेहा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था. विश्वविद्यालय के प्रांगण में बैठे सभी छात्र-छात्राएं ये सब देखकर दंग रह गये थे. ओमप्रकाश के गाल पर, उसके जातीय अहं पर जबरदस्त प्रहार किया था नेहा ने. न सिर्फ़ उस पर ही बल्कि उन तमाम छात्र-छात्राओं पर भी , जो एक दूसरे को अपना दोस्त समझते थे, वे सोचने पर मजबूर हो गये थे कि जब भी उनके जातीय वर्चस्व पर खतरा मडराता है तो उनके जातीय अहंकार कुछए के समान पैर फ़ैला देते है.

समय के अन्तराल ने नेहा को समाज के साथ कदमताल करना सिखा तो दिया था पर लीक पर चलने की उसकी आदत कभी नहीं बनी. उसने अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बनाकर लड़ना सीख लिया था. बचपन से ही उसकी भावनाएं, इच्छाएं बहुत सीमित रही थी, सबके साथ घूलना-मिलना उसकी आदत थी.इसलिए सभी उससे बात करने के लिए ललायित भी रहते थे. कुछ चोर निगाहों से उसे घुरते थे पर सामने आकर कुछ भी कहना उनके लिए “आ बल मुझे मार” जैसा था. ब्रहाणवाद से लड़ते हुए ही उसका बचपन बीत गया था, बहुत गहरे से महसूसा था उसने इन कड़वे अनुभवों को, इन सब से गुजरकर अपनी मंजिल तक पहुंचना हर एक की बस की बात नहीं थी, उसकी दोनों सहेलियों ने तो परिस्थितियों के सामने हार मानकर विश्वविद्यालय से मुंह ही फ़ेर लिया था पर नेहा तो पत्थर की बन गयी थी.

समय पंख लगाकर उड़ गया था मानो, आज वह अपनी जिन्दगी से खुश थी और पूरी तरह से संतुष्ट भी. पर ये खुशी ज्यादा दिन नहीं टीक पायी थी. अब उसके दिल की धड़कनों पर किसी की मधुर गूंज सुनाई देने लगी थी. इस स्वपन-सी दुनिया में नेहा गोते लगाने लगी थी. उम्र के जिस पड़ाव पर आकर उसमे स्थिरता आनी चाहिए थी उस पर मनो स्थिर तालाब में दूर से किसी ने ककंड़ फ़ेंक दिया था. लहरे अपनी-अपनी परिधि को छोड़कर मानो उस ककड़ के अनुसार ही ढ़लने लगी थीं . हवा के झोंके की तरह वह उसकी दुनिया में आ गया था. उमड़ती-घुमड़ती उसकी भावनाओं को कब उसने अपने आगोश मे लिए लिया, उसे तनिक भी अहसास नहीं हुआ. अपने अस्तित्व को तो मानो उसने बिसरा ही दिया था.

झटके से उठी नेहा, अगर वह नहीं सम्भली होती तो वह गिर ही जाती.पर मन जब अथाह पीड़ा से भरा हो तो सुध-बुध कहां रहती है कि आस-पास खड़े लोग उसके इस तरह से लड़खड़ाने ने खि-खि-खी खी कर हंस रहे हैं. वह फ़िर उसी अतीत मे पहुंच गयी थी.

साभार google

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नेहा ने उसे मेल मे लिखा-“ बहुत दुख पहुंचा आज मुझे, इसलिए नहीं की आप नहीं आये बल्कि इसलिए कि मैं अपने आप से ही हार गयी, कितना द्वंद्ध चल रहा था मेरे भीतर कि क्या मुझे जाना चाहिए. आपके पिछले व्यवहार को देखते हुए दिमाग बार- बार यही कहता रहा कि नहीं जाना चाहिए, पर कहीं न कहीं मन के कोने में उम्मीद थी कि शायद आप आ ही जाये. मैं चली आयी थी, पर आज मुझे अपने आपसे घॄणा सी हो रही हैं, एक अलग तरह की नफ़रत सी हो गयी अपनी भावनाओं से, मै किस ओर चली गयी थी.चलो अच्छा हुआ, मेरी आंखों के सामने जो कोहरा मेरी कमजोर भावनाओं के कारण मेरे चारों ओर छा गया था, छंट गया.आपसे कोई शिकायत नहीं कि आप क्यूं नहीं आये.बस अफ़सोस जरुर रहेगा, कि मेरी चाहत इतनी छोटी और कमजोर थी कि वे सामने आकर एक बार कह भी नहीं पाये कि ‘मैं जो सोच रही हूँ उसके बारे में, वो न सोचूं.’ अगर कभी आमना-सामना हुआ तो देखना भी मत मुझे, मुझमे अब सिर्फ़ नफ़रत दिखाई देगी. और मैं कम -से -कम नहीं चाहूंगी कि कोई मेरी भावनाओं का मजाक उड़ाये.

उसने इस मेल का जवाब देना उचित नहीं समझा.

होना तो यह चाहिए था कि वह उसे, अपनी भावनाओं से और दिमाग से निकाल बाहर करती पर ऐसा नहीं हुआ. ’प्रेम’ था उसे उससे. मन की गहराईयों से चाहा था उसे उसने, इसलिए कैसे भूल जाती. पर उसने भी तो उसे कहां भूलने दिया था. अपनी उपस्थिति वह जता देता था और वह भी थोड़े दिनों के बाद फ़िर उसी ओर खींची चली जाती.

“बस यूं ही………” जवाब दिया था नेहा ने अपनी उलझी और बेतरतीब बिखरे हुए बालों में उंगलियां डालते हुए..
“ फ़िर भी सुबह से तो तुम इतनी एक्साइटड थी उससे मिलने के लिए , सब कुछ मैनेज किया उसके लिए, अपने ऑफ़िस का काम , जो दिन भर में पूरा करती हो, जल्दी जल्दी निपटाया, खाना भी नहीं खाया कि कहीं लेट न हो जाओ , तुम्हारी मुहब्बत तुम्हारी आंखे बयां कर ही थी, तो फ़िर…….इतनी जल्दी लौट भी आयी,’ कहा राकेश ने उसे, उसका चेहरा अपनी ओर घूमाते हुए,उसकी आंखों में उसे सूनापन नजर आया था. एक बारगी तो वह भी सहम सा गया था. कितनी खुश थी वह आज, पर ये क्या अब उदासी ने उसके चेहरे की रौनक ही छीन ली थी. उसकी भींची सी आंखों की नमी उसकी उदासी और दर्द को छुपा नहीं पा रही थी.हालांकि उसने बहुत कोशिश की थी अपने इस दर्द को राकेश से छुपाने की.पर आंखे तो सब कुछ बोल जाती है.अपने कप्कंपाते होठों पर जबरदस्ती की मुस्कान बिखरते हुए उसने अपना मुंह फ़ेर लिया था और छत को निहारने लगी थी कि मानो पूछ रही हो जिस तरह से छत स्थिर है वैसी वह क्यों नहीं हो पायी.

आज वह ग्लानी से भर उठी थी.अपना ही कद आज उसकी भावनाओं के सामने बौना पड़ गया था.मैट्रो के हौले-हौले झोल उसे अपनी ही इन्द्रियों पर झन्नाटे के जैसे महसूस हो रहे थे. उसने अपना सिर राकेश के कन्धे पर रख दिया था. थोडी देर के लिए दोनों के बीच चुप्पी छा गयी थी,अन्यथा तो बातों का तारतम्य, सवाल-जवाब अगर यूं ही होता, तो रो ही पड़ती आज सबके सामने, बिना परवाह किये की आस-पास की सवारियां उन्हे ही देख रही हैं.इतना कमजोर उसने कभी नहीं पाया था अपने आपको. पर आज वह ऐसा ही मान रही थी. राकेश उसे वक्त दे रहा था ताकि नेहा उससे बात कर सके. उसने गमगीन माहौल को हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा-“मेरा रोल तो प्रियवंदा का था, पर तुम तो इतनी जल्दी वापिस आ गयी की मुझे ट्रेन में ही पकड़ लिया…….कहकर उसकी ओर देखने लगा था वह, उसकी नम आंखों को देखकर समझ गया था सब कुछ, आखिर पुरुष वर्चस्व को वह उससे बेहतर जानता था. नेहा का जवाब सुने बिना उसने कहा-“तेरे कप की चाय नहीं है वह……..”।

भावनाओं के साथ किसी से जुड़ाव होना प्रेम है. और प्रेम जबरदस्ती नहीं ही किया जा सकता. विचारों का मिलना भी उसमे महत्वपूर्ण होता है. ओर तुम जिस तरफ़ जा रही हो न नेहा……वहां न तो भावनाएं है और न ही विचारों का मेल.फ़िर प्रेम तो दूर की बात हुई न नेहा, समझाया था राकेश ने उसे पहले भी, पर दिल कहाँ मानता है, उस वक्त तो उसे उपदेश जैसा लगा था ये सब. पर आज जहां वह राकेश को सुन रही थी, वहीं पर आत्मविश्लेषण भी कर रही थी. आज वह राकेश के साथ मिलकर इस पहेली को सुलझाना चाह रही थी. इसलिए उसने बहुत बारिकी से अपने इस सम्बंध का विश्लेषण किया. पर मन की थाह तो खुद मन भी कहां पकड़ पाता है. राकेश ने उसका चेहरा अपनी ओर घूमा लिया था, उसकी आंखे में ढेरों सवाल बादलों की गर्जना की तरह उमड़ आये थे. उसने फ़िर कहना शुरु किया. जिद्द से प्रेम नहीं हासिल किया जा सकता. वह तो हो जाता है. जो प्रेम उसके लिए तुम्हारे मन में है, वह उसकी भवनाएं नहीं है, सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारी कल्पना है. तुम इसे अपनी जिद्द की तरह नहीं पा सकती, बल्कि टूट जाओगी. कहकर थोडी देर के लिए चुप हो गया था राकेश. इन शब्दों ने आज उसके अन्तर्मन को हिला कर रख दिया था.कहीं सच में मेरी वह जिद्द तो नहीं बन गया….सोचकर झटक सा दिया था उसने इस ख्याल को…….अगर ऐसे ही है तो उस दिन वो सब क्यों कहा था उसने की जो मैं महसूसती हूं उसके लिए, वही उसे भी महसूस होता है और भी कुछ बाते…….पर उसने अपने प्रेम का इकरार तो नहीं ही किया था न उस दिन भी. जिसे वह समझ ही नहीं पायी थी आज तक.या यूं कहूं कि जो मेरी भावना थी, मुझे अपनी कल्पना में उसमे भी वही नजर आयी थी.

राकेश ने फ़िर कहा कि वह तुमसे प्रेम नहीं करता.ये मैसेज, मेल व्टसअप करना तो आदत सी हो गयी है उसकी.बस जैसे हम हर रोज दर्पण में अपने आपको देख लेते है पर निहारने की फ़ुरसत कभी कभार ही मिलती है. इसलिए ये सारी तुम्हारी ही कपोल कल्पना मात्र है, तुम चीजों को जिस तरह से देखना चाहती हों, उसी तरह से देख रही हो, उसका दूसरा पहलू तुम देखना ही नहीं चाहती.

नेहा आज उसकी बात चुपचाप सुने जा रही थी. उसकी आवाज आज उसे बहुत गहरे से सुनाई दे रही थी. उसका यह दोस्त उसे अच्छी तरह जानता था. उसकी अच्छाईयों को भी और बुराईयों को भी. पर इन तमाम परिस्थितियों का सामना करते हुए वह आगे बढती आ रही थी. बस यही एक ऐसा मोड़ आया था उसकी जिन्दगी में कि उसने नेहा को तोड़ कर रख दिया था. बार-बार उसे एक बात अन्दर से खाये जा रही थी कि जिस प्रेम का देखने के लिए वह सारी समस्याओं का सामना करने के लिए यहां उससे मिलने पहुंची थी, उसके पास तो उसके लिए समय ही नहीं थी, और राकेश की इस बात को नकारने के लिए आज उसके पास कोई कारण नहीं थे. ऐसा नही ही था कि ऐसा उसने पहली बार किया हो, पर अब की बार तो उसके दोस्त के सामने ही ये सब हुआ था. वह शायद हमेशा की तरह उसकी इस बार की बेरुखी को भी टाल ही जाती और मान लेती कि हो सकता है, उसकी वाकई कोई मजबूरी रही होगी, पर अब कि बार वह ऐसा नहीं ही कर पायी. आज सुबह से ही वह उससे मिलने के लिए बात करने की लिए इतनी उत्सुक थी कि चिलचिलाती धूप में भी वह जब उसके सामने आयी तो इतनी तरोताजा महसूस कर रही थी कि मानो अभी -अभी शावर से निकल आयी हों.पर………उसने तो उसे देखा तक नहीं. जब वे तीनों मिले थे तो लपक कर राकेश ने ही कहा-“आज तो गजब ढा रही हो”. सुनकर उसे अच्छा लगा था, पर उसने तो उसकी तरफ़ देखा तक नहीं था. फ़िर वे तीनों एक कैंटीन मे आकर बैठ गये थे.

नेहा आज उससे बात करना चाहती थी अकेले में. सो उसने राकेश के साथ न जाने के लिए बहाना किया की वह थोड़ी देर में आ जायेगी, वह दोनों को छोड़कर चला गया था. नेहा के पास आज इकरार और इजहार करने का मौका था. बहुत कुछ कहना और पूछना था उसे……………पर वह तो वहां से जाने के लिए बेताब था. उसकी बेचैनी ने नेहा को कुछ भी कहने सुनने के लिए मना कर दिया और………और वह उठकर वापिस आ गयी थी. समझ नहीं पा रही थी कि क्या उसके पास उससे बात करने के लिए इतना भी टाइम नहीं था कि वह दो घड़ी इत्मिनान से उसके साथ बैठ सके.. ये कैसे अपनापन था उसका. सोचते सोचते अपने आपको लगभग घसीटते हुए वह वह मैट्रो तक आ गयी उसे पता नहीं चला.

राकेश के कहे शब्द बार बार उसे याद आ रहे थे. जब उसे पता चला था कि वह किसी के प्रेम में हैं. उसने कहा था-“ जिस तरह के माहौल से निकलकर तुम बाहर आयी हो, उसे आज तुम भूल रही हो. आज भी ये व्यवस्था ऐसी ही है, कुछ नहीं बदला. उन ब्राहमणवादी मूल्यों के खिलाफ़ तुम हमेशा खड़ी रही हो तो आज कैसे उन सब को अपने आप से अलग कर सकती हो. तुम्हारी इस नासमझी पर मैं क्या कहूं , जो व्यक्ति इन्ही संस्करों में पला -बढा हो, वह कैसे इसे बिसराकर तुमसे प्रेम कर सकता है. ठोस सच्चाई तो यही है कि इस तरह के स्तरीकरण से प्रेम फलीभूत नहीं ही हो सकता. जाति-व्यवस्था सम्बंध का आज भी मूलाधार है, यह तुम नहीं भूल सकती.आंख मुंद लेने से बिल्ली चूहे को छोड़ देगी…………ये तो हो नहीं सकता. ये तुम्हारी आत्मिक संतुष्टि का साधन हो सकता है. उससे मानसिक सुख जो तुम पाने के लिए लालायित हो, वह नहीं मिलेगा, और उसका सबसे बड़ा कारण तुम दोनों का जातीय संस्कार है .समाज की ठोस सच्चाई भयानक रूप से सम्बंधों की दिशा बदलती है.जो हर तरह से समर्थ है, वह क्यों तुम्हे इस योग्य भी समझेगा कि तुम उसका प्रेम पाने की अधिकार हो?
पर प्रेम तो उड़ान भरना चाहता था, उसने राकेश के कहे पर पानी फ़ेरकर आगे बढने की कोशिश की थी. आज बार बार यही बात उसे अन्दर तक खाये जा रही थी कि वह क्यों भूल गयी थी अपनी उसकी सचाई को. क्यों नहीं निकलना चाहा था इन सबसे. बहुत समझाने की कोशिश की थी नेहा को उसने. इसलिए आज उसके कहे शब्दों में नेहा को सच्चाई नजर आने लगी थी.

“आ गयी तुम” कहा राकेश ने. वह खामोश रही. उसने फ़िर पूछा क्या हुआ, वह चुप रही. बोल नहीं फ़ूटा था उसके मुंह से राकेश के सामने. पर उसकी सुनी सुनी आंखे ने सब कुछ कह दिया था. उसने अन्तिम बार उसे चेताते हुए कहा था-इन सब के लिए नहीं बनी हो तुम.तुम्हारा व्यवक्तित्व ऐसा नहीं है, जो तुम अपने आपको जबरद्स्ती इसमे धकेल रही हो, जीवन का इतना लम्बा संघर्ष आज तुम खुद भूल रही हो. याद करों ओमप्रकाश गुप्ता के शब्दों को…………..क्या इसे प्रेम कहेंगे. यह उससे भी कड़वा और घिनौना है, जितना मैं समझ सकता हूँ.प्रेम तो दूर की बात है, वह तो तुम्हे अपनी दोस्ती के लायक भी नहीं समझता, उसके संस्कार उसे इसकी इज्जाजत नहीं दे सकते. मै भी उन्ही संस्कारों की एक कड़ी ही हूं इसलिए उसे मुझसे बेहतर कोई नहीं जान सकता. जिस ओर तुम जा रही हो, वह तुम्हारी न तो मंजिल है और न ही रास्ता. उसकी आंखों मे तेरे लिए वो चाहत नहीं है, ये तुम्हारी ही कल्पना है जो तुम्हे उसकी ओर खींच रही है. अपने स्वाभिमान को गिराकर अगर उसे पा भी लोगी क्या अपने आपसे नजरें मिला पाओगी! यही कड़वा सच अगर तुम्हे उसे अपनाने के बाद पता चला तो………..। क्या इसके साथ जी पाओगी..। बाहर निकल आओ इन सब से……..तेरे कप की चाय नहीं है ये…………।

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    By: पंवार कौशल

    जन्म- 10 अक्टूबर १९७७ राजौंद, कैथल हरियाणा
    धर्मशास्त्रिय शूद्र अवधारणा, भारतीय संस्कृती में शूद्र और नारी, मानवाधिकार के सवाल: भारतीय समाज, शुद्राह्निकम, संहिताओं में शूद्र, शूद्र स्त्री:परतंत्रता एवं प्रतिरोध, आदि किताबें प्रकाशित | विभिन्न लेख आलेख और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेमीनार एवं व्यख्यान |
    सम्प्रति- सहायक प्रोफ़ेसर, संस्कृति विभाग, मोतीलाल नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्धालय
    सम्पर्क – RZF 1/224, 2nd फ्लोर गली न० 2, महावीर एन्क्लेव, नई दिल्ली ११००४५
    फ़ोन- 09999439709, 9911886215.
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