(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है ……. ” का चौथा दिन ……… ‘कमलेश पाण्डेय’ का आलेख )

त्रिशंकु अधुनातन और पुरातन के क्षितिजों के बीच लटका एक सुन्दर-सा ग्रह है. गणतंत्र को उसके आदर्शतम स्वरूप में कायम रखने की कवायद में वहां की सस्थाएं अब भी ऐसे रूप में हैं कि दातादीन ने पहले तो एकदम सर ठोंक लिया, ”ये क्या! प्रधानमन्त्री सेवकप्रवर और अधिकारी कर्तव्य-पालक कहलाते हैं. लगता है प्रशासन नहीं परवल-पालक की रसोई है.”

अगले ही दिन दातादीन ने सर्व-सुलभ सेवक-प्रवर से कहा कि यहाँ अधिकार शब्द से इतनी झिझक क्यों है? क्या कर्तव्य भी एक तरह का अधिकार नहीं है? हमारी पूर्ण प्रोफेशनल व्यवस्था में तो ये दोनों शब्द एकाकार है. आप अपने कर्तव्य-पालकों के पदनाम से कर्तव्य शब्द तुरंत हट्वाईये. बेचारे कर्तव्य के बोझ के मारे, काम करने का जोश कहाँ से लायें. इन सब को अधिकारी, नियंत्रक, अधीक्षक, पर्यवेक्षक वगैरह बना कर देखिये, इससे उनकी हैसियत में तो कोई फ़र्क नहीं आयेगा, पर मिजाज़ में ज़ुरूर आ जाएगा. और ज़रा इनके कैडर-सर्विस वगैरह बनवाईये. बड़े-छोटे की कोई पहचान नहीं. ऐसे क्या ख़ाक कर्तव्य-पालन करेंगे. कैडर प्रशासन की वह दीक्षा है जो एक सरकारी नौकर को आदमी का चोला उतार कर सच्चा प्रशासनिक अधिकारी बनाती है. अलग-अलग कैडरों में घमासान प्रतियोगिता बनी रहती है और आप एक को खुश और दूसरे को नाराज रख कर भी मजे से शासन चला सकते हैं |

त्रिशंकु पर दातादीन  

कमलेश पांडे

कमलेश पांडे

हमारी वसुधैव कुटुम्बकम वाली प्राचीन संस्कृति की महानता पर कौन संदेह करेगा! अर्थात कोई नहीं. अगर कोई करने पर आमादा ही हो तो उसे चुप करने को ये आलेख काफी होगा. सृष्टि के आरम्भ से ही हमारी संस्कृति के कद्रदान पूरे ब्रम्हांड में फैले रहे हैं और हमारी विकसित सभ्यता के डंके पूरे अंतरीक्ष में यों गूंजते रहे हैं कि आकाशीय ‘फ्रेंड-रिक्वेस्ट’ की भरमार से हम परेशान रहे. ज़रा बताईये कि हमारे प्राचीन ग्रन्थों में उड़न-तश्तरियों का ज़िक्र क्यों है? सीधी सी बात है कि हमारे सम्बन्ध पड़ोसी ग्रहों से इतने निकट थे कि जब भी पृथ्वी से घंटी बजाकर हम नमक या दाल मांगते थे, पड़ोसी ग्रह से वो चीज़ तश्तरी में रखी हाज़िर हो जाती थी. हालांकि उन ग्रंथों में इसका ज़िक्र नहीं मिलता कि खुद अपने त्योहारी पकवानों को आकाश-गंगा के पड़ोसियों को भेजने के लिए हमने भी कोई उड़ने वाली तश्तरी, डोंगा या परात निर्मित किया हो. मेरे विचार से तो अंतरीक्ष में हमारी स्थिति सदा से प्रधानजी जैसी रही होगी, जहां सिर्फ डालियाँ स्वीकारी जाती थीं और खैरात माँगनेवाले ही अपनी तश्तरियां लेकर द्वार पर आते थे.

ये किस्सा ब्रम्हांड की किसी आकाश-गंगा के त्रिशंकु नामक ग्रह का है जिससे हमारे प्राचीन सम्बन्ध रहे है. वहां हमसे प्रेरणा लेकर सदियों पहले एक अदद गणतंत्र खडा किया गया था. इधर त्रिशंकु में अचानक उस गणतंत्र के नवीनीकरण के तहत प्रशासनिक सुधार करने का विचार हुआ. तत्कालीन भारत सरकार के पास इस आशय का एक निवेदन आया कि यों तो त्रिशंकु में राजकाज मजे में चल रहा है, पर जाने क्यों इधर कर्मचारियों में जोश की कमी दिख रही है. सुना है आपके यहाँ नई आर्थिक नीतियों को लागू करने के लिए पूरे प्रशासन को सुधार कर प्रोफेशनल बना दिया गया है. हमारा भी ऐसा ही करने का इरादा है, सो एक सलाहकार भिजवा दें. इस पत्र से सरकार में चहलकदमी मची. पी एम को एक सचिव स्तर के अधिकारी का नाम सुझाया गया तो वे बोले कि चूँकि प्रस्ताव एक छोटे ग्रह से आया है, प्रोटोकॉल के हिसाब से एक उपसचिव ही ठीक रहेगा. तुरंत ही सेवा की शर्तों, तरह-तरह के भत्तों और न्यूनतम दो वर्ष के कार्यकाल के साथ सचिवालय के एक चुस्त अधिकारी के डेपुटेशन का आर्डर निकाल दिया गया.

नियत दिन श्री दातादीन(डीडी) आई ए एस त्रिशंकु ग्रह से आये विशेष यान से रवाना हो गए. उनके लगेज में सरकारी आदेशो- नियमों-उपनियमों के तमाम खंड-उपखंड, संविधान की अद्यतन कॉपी, दौरे के लिए ख़ास खरीदा गया लैपटॉप और अब तक के प्रशासनिक अनुभवों से निचोड़ कर बनाए गए पॉवर-पॉइंट प्रस्तुतियों का पेन-ड्राइव आदि थे. कागज़ तो सारे लैपटॉप में भी थे पर यूं खाली हाथ दिखना ठीक नहीं लगा. यात्रा के दौरान यान के भीतर सब कुछ प्रोटोकॉल के हिसाब से ही घटा यानी डीडी ने व्योमबाला को सत्ताईस चक्कर लगवाकर मनचाहे ड्रिंक्स आर्डर किये और शेष वक़्त आँखे मूंदे उसे मन ही मन घूरते रहे.
त्रिशंकु अधुनातन और पुरातन के क्षितिजों के बीच लटका एक सुन्दर-सा ग्रह है. गणतंत्र को उसके आदर्शतम स्वरूप में कायम रखने की कवायद में वहां की सस्थाएं अब भी ऐसे रूप में हैं कि डीडी ने पहले तो एकदम सर ठोंक लिया, ”ये क्या! प्रधानमन्त्री सेवकप्रवर और अधिकारी कर्तव्य-पालक कहलाते हैं. लगता है प्रशासन नहीं परवल-पालक की रसोई है.” अगले ही दिन डीडी ने सर्व-सुलभ सेवक-प्रवर से कहा कि यहाँ अधिकार शब्द से इतनी झिझक क्यों है? क्या कर्तव्य भी एक तरह का अधिकार नहीं है? हमारी पूर्ण प्रोफेशनल व्यवस्था में तो ये दोनों शब्द एकाकार है. आप अपने कर्तव्य-पालकों के पदनाम से कर्तव्य शब्द तुरंत हट्वाईये. बेचारे कर्तव्य के बोझ के मारे, काम करने का जोश कहाँ से लायें. इन सब को अधिकारी, नियंत्रक, अधीक्षक, पर्यवेक्षक वगैरह बना कर देखिये, इससे उनकी हैसियत में तो कोई फ़र्क नहीं आयेगा, पर मिजाज़ में ज़ुरूर आ जाएगा. और ज़रा इनके कैडर-सर्विस वगैरह बनवाईये. बड़े-छोटे की कोई पहचान नहीं. ऐसे क्या ख़ाक कर्तव्य-पालन करेंगे. कैडर प्रशासन की वह दीक्षा है जो एक सरकारी नौकर को आदमी का चोला उतार कर सच्चा प्रशासनिक अधिकारी बनाती है. अलग-अलग कैडरों में घमासान प्रतियोगिता बनी रहती है और आप एक को खुश और दूसरे को नाराज रख कर भी मजे से शासन चला सकते हैं.

सेवक-प्रवर को कुछ ख़ास तो समझ में तो नहीं आया पर डीडी की प्रतिभा के आतंक में, उनके यहाँ हरी झंडी के नाम पर जो भी चीज़ थी, उन्होंने हिला दी.
चलते-चलते डीडी ने पञ्च मारा कि आप भी ज़रा प्रधान या चीफ-वीफ कहलाईये. ये क्या सेवकों की तरह हाथ जोड़े रहते हैं. ये मुद्रा चुनाव तक ही शोभती है.
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डीडी कर्तव्य-पालकों की क्लास ले रहे हैं.
“यहाँ की राज-भाषा क्या है?”
“ये क्या चीज़ होती है? यहाँ तो सिर्फ एक भाषा है-त्रिशंकी. गाँव से शहर, टीवी से फिल्मों तक और बाज़ार से सरकार तक वही लिखी-बोली जाती है.”
“तभी!… चलो, ये बताओ कि बाक़ी ग्रहों से आप कैसे बतियाते हो? और त्रिशंकु में बड़े लोग आपस में किस भाषा में बोलते हैं…मसलन सरकारी दावतों में”
“वो तो एक भाषा है-दबंगी. हमारे सौरमंडल के सबसे विकसित ग्रह और संयुक्त-ग्रह-संघ की भाषा. त्रिशंकु में भी अमीर लोग और बुद्धिजीवी आपस में यही भाषा बोलना पसंद करते हैं.”
“तो उसमें क्यों नहीं करते काम? गुणवत्ता बढ़ेगी और जिन्हें राज-काज से मतलब है उनके लिए आसानी भी होगी. अरे भाई, विकास की नीतियाँ जनता की भाषा में बनती हैं कहीं. इतना सीधा-सरल थोड़े ही होता है विकास करना. अब कहोगे कि विकास के मॉडल भी अपने ग्रह से ही उठाते हो.”
“ये मॉडल क्या होता है?”
“देखो, जब विकास करना हो तो हमेशा अपने से बेहतर देश की ओर देखना चाहिए. आप तो जो कर रहे हो सो कर ही रहे हो. मसलन जानना जुरुरी है कि ये दबंग ग्रह किस तरह विकास कर रहा है, वो आपके लिए एक मॉडल हो सकता है. हमारे यहाँ भी अपने देश के सिवा दुनिया भर के मॉडल सीखने विदेशों में जाने की परम्परा है. आप लोग भी दबंग-सबंग ग्रहों में जाकर घुमो-फिरो, कुछ ऐश करो. यहीं बैठे-बैठे सारा विकास कर डालोगे. विकास की खासियत ही है कि उसका होना किसी की समझ में न आये. जिसका होना बाक़ी है वो भी सर खुजाये और जिसका हो चुका वो भी. इस बीच विकास के प्रोजेक्ट में लगे लोगों का विकास अपने-आप ही हो जाए.” फिर उन्होंने प्रोजेक्टर पर कुछ दुरूह से ग्राफ और आंकड़े दिखाए जो त्रिशंकी भाषा में होने के बावजूद किसी के पल्ले न पड़े. पर अंत में उन्होंने फंड के उपयोग के जो तरीके बताये वो सब कर्ताव्य्पालकों के भेजे में सटीक जा घुसे. चलते-चलते डीडी ने एक दबंगी भाषा जानने वाले अफसर को अपना मॉडल पूरा का पूरा अनुवाद करने के लिए दिया और कहा कि देखना उसके बाद कैसे ये मॉडल समझने में किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी.
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अगले रोज़ डीडी ने कुछ फाइलें देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो त्रिशंकु के कर्तव्य-पालको ने पूछा कि ये क्या वस्तु है। इस पर डीडी भड़के, “क्या खाक प्रशासन चलाते हैं आप। अगर फ़ाइल नहीं होती तो क्या कार्यवाही ताम्र पत्रों पर होती है?
“कार्यवाही?” उन्होने मासूमियत से एक ताम्र पत्र सा दिखाया जो उस गृह की किसी चमकीली धातु से बना था। बताया कि ये कार्ड उन्हें विभाग के प्रधान उप-सेवक से मिलता है और इस पर सिर्फ काम का ब्योरा और समय-सीमा लिखी रहती है। काम पूरा हो जाने पर हम इस पर हस्ताक्षर कर देते हैं। डीडी की आँखें चमकीं, “तो! होता है काम पूरा!” कर्तव्य-पालकों की टोली ‘ये तो कुछ खिसका हुआ लगता है’ के भाव से एक दूसरे को देखती हंसने लगी। एक बोला,” पूरा नहीं होगा तो साइन कैसे करेंगे! एक दिन की भी देर हो तो तंख्वाह कटती है।“
डीडी ने धीरज से पूरा मामला समझा। तो ये लोग पुराने ढर्रे पर विकेंद्रीकृत ढंग से काम करते हैं। मंत्री सांसद अपने क्षेत्र के लोगों की मांगों के हिसाब से काम तय कर खजाने में अर्ज़ी लगाते हैं और सेंकशन हो जाने पर अफ़सरान काम करवा कर रिपोर्ट दे देते हैं। फिर जनता की मदद से ऑडिट करा लेते हैं कि काम हुआ, नहीं हुआ या कैसा हुआ। डीडी के अंदर का प्रशासनिक अधिकारी करवटें लेने लगा। ये तो सरासर गुलामी है। केवल आदेश-पालन? टटोलते हुये बोले, “सैलरी कितनी मिलती है आप लोगों को?”
“आपकी दया से सब ठीक-ठाक चल जाता है। आवास और स्कूल सरकार के और गाड़ी अपनी। महीने मे एकाध बार सुरा-पान भी कर लेते हैं। प्रधान-सेवक से लेकर श्रमिक तक सबको इतना तो मिल ही जाता है।“
“समाजवाद” डीडी बुदबुदाये। पूछा, “यहाँ प्राइवेट सेक्टर नहीं है?”कर्तव्य पालकों की शक्ल फिर उजबकों जैसी हो गई।
“मतलब सरकारी ठेके कौन लेता है? अरे सारा काम क्या सरकार ही करती है?” उन्होने थोड़ा साफ किया।
“प्रधान कार्यपालक के पास सभी उद्यमियों की सूची होती है। जिसके योग्य जो काम होता है उससे करवा लेते हैं। इसमे प्राइवेट सेक्टर का क्या काम?”
डीडी ने सर ठोंका, “किस युग के प्राणी हो तुमलोग! अरे, पूंजी कहाँ से आती है?”
“सभी नागरिक अपनी आय का एक भाग ‘योगदान’ मे जमा करते हैं। उसी से सब होता है।“
“कोई जमा न कराये तो?”
“ऐसा भी संभव है क्या?” सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे।
अगले दिन हमेशा सहज सुलभ प्रधान मंत्री उर्फ़ प्रधान-सेवक(प्रसे) से चर्चा में उन्होने प्राइवेट सेक्टर की महत्ता पर ढेरों प्रकाश डाला. बताया कि जीव बिना किसी लाभ-सम्भावना के कभी स्वेच्छा से काम नहीं करता. डीडी ने प्रसे को आश्वस्त किया कि उनके पास विकास के ढेरों बने बनाए मॉडल रखे हैं जिनमें किसी एक में वे त्रिशंकु को मजे से फिट कर देंगे. प्रसे डीडी की सर्वज्ञता और आत्मविश्वास से इतने प्रभावित हुए कि उनसे इच्छानुसार जल्द से जल्द अपना मॉडल लागू करने की गुजारिश की. जैसा त्रिशंकु में काम करने का रिवाज़ था, बेहद त्वरित गति से विकास का मॉडल लागू कर दिया गया. आगे किस गति से काम होना है, इस पर डीडी ने वहां कर्तव्य-पालकों को एक ‘कैश-कोर्स’ के लिए बुलवाया. इस कोर्स में उन्होंने कर्म का सिद्धांत समझाया कि अब से जो भी काम उनके टेबल पर आये उसे तीन नजरियों से परखना होगा. एक- क्या इस काम को किया जाना है. दो- अगर किया जाना है तो किसके द्वारा. तीन- काम को उसको कैसे टिकाना है. इसमें दो बातों पर खास ध्यान देना है. पहला कि ‘किसके द्वारा’ में तय करने वाला किसी भी हालत में शामिल नहीं है और दूसरा काम को किसी के हवाले करने के आधार का उस व्यक्ति के कार्य-वितरण से कोई सम्बन्ध नहीं है क्योंकि वो भी काम के निपटान में यही विधि इस्तेमाल करेगा. इस प्रक्रिया से काम अंततः उस कर्तव्यपालक के पास पहुँच जाएगा जिसे नियति ने इस काम के लिए चुना होगा. चाहें तो इसे कार्य-निष्पादन की नैसर्गिक प्राविधि कह सकते हैं. भारत में वर्तमान गणतंत्र इसी चुस्त विधि के कारण इतने सुचारू ढंग से चल पाता है.
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दो चार महीनों में ही त्रिशंकु का प्रशासनिक मौसम बदलने लगा. लाल-लाल फीतों में फाइलें इतराती घूमने लगीं. कर्तव्य-पालकों में अफसरी ठसक दिखने लगी और चुपचाप कर्तव्यपालन में लगे रहने वाले कर्मचारियों में दबंगी भाषा के बढ़ते चलन से एक आत्मविश्वास-पूर्ण वाचालता आ गयी. दबंगी सह-राजभाषा घोषित हो चुकी थी. अफसरान दबंगी भाषा में अपनी प्रवीणता दिखाने को तत्पर थे सो रोज़ बैठकें और सेमीनार आयोजित किये जाने लगे. अनुवादक नामक एक नई प्रजाति ने जन्म लिया जिसने पहले त्रिशंकी में लिखे सरकारी हर्फों को दबंगी में ढाला, फिर इसका उलटा कर एक ऎसी त्रिशंकी भाषा गढ़ी जो दबंगी से भी दुरूह थी. सभी खुश थे क्योंकि बदलाव हो रहा था. काम करने की नीरस प्रक्रिया में रुकावट नामक तत्व के प्रवेश से एक रोमांच सा पैदा हो गया था. मीटिंग, वर्कशॉप, सेमीनार जैसे मजेदार मौके आयोजित होने लगे थे जिनके अंत में डीडी ने भारतीय परंपरा के अनुसार कॉकटेल भी शामिल करवा दिया था. प्रधान सेवक भी अब खुद को पीएम कहलाने लगे थे और अपने मातहतों की खुशी में खासे खुश थे.
कर्मचारियों को कैडरों और सर्विसों में विभाजित कर में डीडी ने अपनी तीक्ष्ण अनुभवी आँखों का उपयोग किया था. कुछ चुनिन्दा लोगों को जिनका सामान्य ज्ञान विस्तृत था, विकट वाचालता थी और दूसरों को दबाने और हांकने की कुव्वत थी, डीडी ने श्रेष्ठतम कैडर प्रदान कर अधिकाँश विभागों के शीर्ष पर बिठा दिया. डीडी को विशेषज्ञों से चिढ थी सो उन्हें निर्णय-प्रकिया से बाहर रखा. चंद दिनों में ही वहां भी कैडर कबीलों की भाँति हो गए और अपनी पहचान के लिए मरने-मारने को तैयार रहने लगे. कुल मिला कर समां बंधने लगा.
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एक ही कसर बाक़ी रह गयी थी- निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार लाना, जो अब भी पुराने तौर-तरीकों के आदी त्रिशंकी में एक समय-बद्ध और अनिवार्य कर्म माना जाता था. त्रिशंकु में निर्णय लेने के दो ही स्तर थे. हर विभाग का अपना बज़ट था और वे खुद ही अपने कामों की सूची बनाकर ऊपर भेजते थे. काम पर खर्चे के प्रस्ताव पर निर्णय दिन भर में आ जाता और काम शुरू कर दिया जाता. डीडी को इस सरलता पर घोर आपत्ति हुई जिसका कारण उन्होंने ये बताया कि इससे काम पूरा करने की प्रक्रिया में छिद्र छूट सकते थे. दूसरे इसमें उनके मॉडल के सबसे मज़बूत खम्भे यानी प्राइवेट सेक्टर की कोई भागीदारी नहीं थी. डीडी ने परस्पर-लाभ का सिद्धांत और निर्णय-प्रक्रिया के बारीक पहलुओं पर प्रकाश डालने के लिए एक वर्कशॉप बुलवाया.
त्रिशंकु की धूप में कुछ अतिरिक्त चिलचिलाहट होने के कारण वहां खुजलाहट की समस्या आम थी. सरकार की ओर से इसके निदान के लिए मुफ्त लोशन बांटा जाता था. विकास के नए मॉडल के तहत डीडी ने एक अलग लोशन विभाग बनवाया था जिसे आउटसोर्सिंग के जरिये लोशन वितरण का काम करना था. हाल में ही खडी की गयी कुछ कंपनियों से लोशन वितरण के टेंडर आमंत्रित किये गए थे. डीडी ने इसी मामले को केस-स्टडी के तौर पर चुना.
“इस मामले पर क्या कारर्वाई करेंगे आप?” डीडी उवाच.
“करना क्या है. इनमें जो सर्वश्रेष्ठ होगा यानी कम दाम लेकर सबसे अच्छे ढंग से वितरण करने लायक होगा उसे चुन कर काम सौंप देंगे.” एक उत्साही ने कहा.
“गलत! ये निर्णय करने वाले आप कौन हैं. ये कम्पनियां पीएम के विश्वस्त लोगों की हैं. किसे चुनना है ये आदेश ऊपर से ही आएगा और एक बार आ गया तो कार्य निष्पादन की क्षमता, वित्तीय स्थिति वगैरह सारे आधार बेकार हो जायेंगे. इसलिए आप कुछ भी नहीं करेंगे. जिन मामलों में निर्णय आपके हाथ में हों उसमें भी आपकी एक ही टेक होगी- निर्णय तो ऊपर से होना है. ध्यान दें- यहाँ काम महत्वपूर्ण नहीं बल्कि आपका करियर और खुशहाली है. आप कुछ नहीं करेंगे का मतलब है कि फाइल में कोई असंदर्भित सवाल कर उसे नीचे लौटा देंगे या यूं ही अपनी दराज़ में बंद कर देंगे.”
“पर इससे तो विलम्ब के आरोप में सज़ा मिलेगी.” एक सशंकित अफसर ने टोका.
“प्रक्रिया चालू हो तो विलम्ब विलम्ब न भवति. मैंने सब व्यवस्था कर दी है. मंत्रियों, सलाहकारों या विशेषज्ञों या कुछ न हो तो आप लोगों की ही मिली-जुली कुछ समितियां होंगी जो मामले पर विचार करती रहेंगी और एक न एक दिन ऊपरी आदेश के अनुसार निर्णय लेने की अनुशंसा कर देंगी. मामले से प्रभावित पार्टी, मीडिया या कोई भी कुछ पूछे तो आपका एक ही जवाब होगा- ‘निर्णय तो ऊपर से होना है’. क्या कहेंगे?”
“निर्णय तो ऊपर से होना है.” सबने समवेत स्वर में डीडी की जयजयकार के भाव से कहा.
“और इस विलम्ब के लिए आपको सजा नहीं, पुरस्कार मिलेगा, जो वो देंगे, जिनका मामला फंसा है. संकोच न कीजिएगा.” पूरे वर्कशॉप ने हर्ष-ध्वनि के साथ इस चमत्कार को नमस्कार किया.
एक साल बीतते न बीतते त्रिशंकु का प्रशासन धरती के सबसे बड़े गणतंत्र की तरह सुचारू रूप से चलने लगा. बाक़ी टेन्योर को उत्पादक बनाने के लिए डीडी ने एक अनौपचारिक कंसल्टेंसी खोल ली जिसके जरिये त्रिशंकु के उद्यमी थोड़ी ठोस दक्षिणा के एवज में आधुनिक अर्थ-व्यवस्था के गुरु-मन्त्र सीखने लगे. बचे वक़्त में उन्होंने अपने मॉडल की बदौलत लाभ से लबालब हुई प्राइवेट कंपनियों के प्राइवेट जेटों में बैठ कर त्रिशंकु का पर्यटन किया. शामें आभार व्यक्त करने वाली कॉकटेल दावतों में कटने लगीं.
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अभी डेपुटेशन के आठ महीने बाक़ी थे कि एक दिन त्रिशंकु के पीएम ने बुला कर उनसे बचा टर्म छोड़ कर धरती को प्रस्थान करने का निवेदन किया. डीडी ने तत्काल ये कह-कर मना कर दिया कि वे तो टर्म पूरा कर के ही जाना चाहते है और बीच में बुलाने का निर्णय सिर्फ उनका पेरेंट डिपार्टमेंट ही ले सकता है. तब त्रिशंकु के पीएम ने भारत के पीएम को एक ऑफिसियल पत्र लिखा.
सूचना के अधिकार के तहत निकलवाई गयी दबंगी भाषा में लिखी उस चिट्ठी का सार नीचे दिया गया है-
हमने आपसे एक सलाहकार माँगा था अपने यहाँ प्रशासनिक सुधार के लिए पर आपने हमारी सहज-सरल व्यवस्था के संहार हेतु भेज दिया. आपके भेजे सलाहकार श्रीयुत डीडी के सुझाए कदमों के फलस्वरूप आज हमारी व्यवस्था का ये हाल है कि –
– जो निर्णय एक दिन में हो जाया करते थे वो पिछले छह महीने में तो क्या बरसों होते नहीं दिख रहे.
– हमारे कर्मठ, अनुशासित और ईमानदार कर्मचारी अकर्मण्य, ढीठ और भ्रष्ट हो चुके है.
– कर्तव्य-पालन और जन-सेवा जैसे शब्द प्रशासनिक शब्दावली से बाहर फेंक दिए गए हैं.
– हमारी सीधी-सरल जनता इतिहास में पहली बार गरीबी, महंगाई और कुव्यवस्था की मार झेल रही है.
– सरकारी प्रशासन का छूत शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस आदि सभी क्षेत्रों में फ़ैल गया है.
– समाज में वर्ग-विभाजन बढ़ता जा रहा है. प्रशासन के प्रति आक्रोश और परस्पर ईर्ष्या-द्वेष का माहौल है.

क्या-क्या लिखूं. कुल मिला कर यहाँ जो स्थिति है उसे पूर्ण पालिसी-पैरालिसिस कहा जा सकता है. हम ये सोच कर काँप जाते हैं कि जब इतने कम समय में आपके सलाहकार ने हमारे ग्रह पर ऎसी स्थिति पैदा कर दी है तो आपके यहाँ क्या हाल होगा, जहां हर शाख पे उल्लू बैठे होंगे. आपसे सहानुभूति रखते हुए हम निवेदन करते हैं श्री डीडी को तत्काल प्रभाव से वापस बुला लें. हम अपना बाक़ी सुधार खुद ही कर लेंगे.
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कहना न होगा कि डीडी टर्म पूरा होने से पहले ही लौट तो आये. आगे वे सुनिश्चित प्रोमोशन आदि पाकर उचित समय पर आनंदपूर्वक रिटायर हुए.
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    By: कमलेश पांडे

    कमलेश पाण्डेय
    विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य-लेखन, आलोचना और पुस्तक-समीक्षा;
    ग़ज़ल साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका “लफ्ज़” के व्यंग्य-खंड का कुछ वर्षों तक सम्पादन |
    प्रकाशित पुस्तकें- दो व्यंग्य संग्रह – बाईसवीं सदी का विश्वविद्यालय (1999), तुम कब आओगे अतिथि (2012), ,आत्मालाप (2015) ,
    निवास – नोएडा, उत्तर प्रदेश
    सम्प्रति -भारतीय आर्थिक सेवा के अधिकारी के तौर पर सिविल सेवा

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