कालाकार कभी अपनी चमक खोते नहीं हैं, बल्कि इनकी चमक कभी न डूबने वाले, कभी न टूटने वाले सितारों के समान है, जो दिन में, रात में अपनी आभा लिए झिलमिला रहे हैं। रवींद्र जैनएक ऐसी पक्के साधक वाली शख्सियत का नाम है, जिसमें गीत, शास्त्रीय संगीत, लोकसंगीत और गायन सारी कलाएं और खूबियाँ एकसाथ मुखर हो जाती हैं और जनमानस के बीच पहुँचकर उनके प्रतिनिधि कलाकार का रूप ले लेती है। रवींद्र जैन को अंतिम विदाई देते हुए मोहसिन खानका आलेख …..संपादक

थम गया संगीत का एक और स्वर: “रवींद्र जैन”

रविन्द्र जैन

भारतीय फिल्म संगीत के मैदान में कई संगीतकार, गीतकार और गायकों ने समय के साथ पदार्पण किया और भारतीय फिल्म संगीत को अपनी अनमोल धरोहर देकर अमर हो गए। भले ही वे सशरीर इस नश्वर संसार में न हों, लेकिन उनकी उपस्थिति हर समय कहीं न कहीं निरंतर हमारे आसपास बनी रहती है। ये समस्त कालाकार कभी अपनी चमक खोते नहीं हैं, बल्कि इनकी चमक कभी न डूबने वाले, कभी न टूटने वाले सितारों के समान है, जो दिन में, रात में अपनी आभा लिए झिलमिला रहे हैं। रवींद्र जैन एक ऐसी पक्के साधक वाली शख्सियत का नाम है, जिसमें गीत, शास्त्रीय संगीत, लोकसंगीत और गायन सारी कलाएं और खूबियाँ एकसाथ मुखर हो जाती हैं और जनमानस के बीच पहुँचकर उनके प्रतिनिधि कलाकार का रूप ले लेती है।

इस महान गायक, संगीतकार और गीतकार का जन्म 28 फरवरी, 1944 को अलीगढ़ (उ.प्र) में संस्कृत के प्रकांड पंडित और आयुर्वेद विज्ञानी इंद्रमणि जैन के यहाँ हुआ था। चार साल की कम उम्र में ही उन्होंने संगीत के क्षेत्र में कदम रख दिया था। इस लंबी, लेकिन कठिन यात्रा में वे कई अच्छे-बुरे दौर से गुज़रते हुए रुपहले परदे से लेकर छोटे पर्दे पर अपने करियर में छाए रहे। कड़े संघर्ष ने उन्हें जीवन में कभी असफलता का मुंह भी दिखाया था। वे पहले पहल इस क्षेत्र में बड़ी आसानी से नकार दिये गए, देश के पाँच रेडियो स्टेशनों में ऑडिशन के दौरान रवींद्र जैन को साफ तौर पर नकार दिया गया था। पश्चात में जब रवींद्र जैन ने अपना करियर फिल्मों में प्रारम्भ किया, तो अपने समय में एक बेहतरीन और मौलिक गायक, संगीतकार और गीतकार की सफल छवि के साथ हमेशा के लिए स्थापित हो गए। उन्होंने 70 के दशक में बॉलीवुड संगीतकार के रूप में अपना करियर शुरू किया और ‘चोर मचाए शोर’ (1974), ‘गीत गाता चल’ (1975), ‘चितचोर’ (1976), ‘अखियों के झरोखों से’ (1978) जैसी हिंदी फिल्मों में संगीत दिया। इस संगीत ने उस समय में एक अनोखे संगीत और गीत को सबके जीवन में उतार दिया, वे अपनी धुनों में लोकसंगीत का स्वर लेकर उपस्थित हुए, जिससे आम जनता कहीं न कहीं बड़ी गहराई के साथ जुड़ी हुई थी।

उनके द्वारा रचित संगीतबद्ध गीत मुझे याद आ रहे हैं। “घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूँ।”

“जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना है।” “जाते हुए ये पलछिन क्यों जीवन लिए जाते।” हिंदी सिनेमा जगत को रवींद्र जैन ने ‘अखियों के झरोखों से’, ‘कौन दिशा में लेके’, ‘सजना है मुझे सजना के लिए’, ‘हुस्न पहाड़ों का’, ‘सुन साहिबा सुन’, ‘अनार दाना’, ‘देर न हो जाए’, ‘मैं हूं खुशरंग हिना’, जैसे अनगिनत मशहूर सुमधुर गीत दिए हैं, जो अपने दौर में काफी लोकप्रिय हुए। करियर की शुरुआत में ही 1976 में आई फिल्म ‘चितचोर’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। इसके बाद 1978 में फिल्म ‘अखियों के झरोखों से’ के लिए भी सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन और फिल्म के शीर्षक गीत गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। वर्ष 1985 में फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में संगीत देने के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक और 1991 में फिल्म ‘हिना’ के गीत ‘मैं हूँ खुशरंग हिना’ के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके अतिरिक्त उनके संगीत की महत्ता उनके द्वारा संगीतबद्ध भजनों के कारण भी मानी जानी चाहिए। उस समय में मात्र वे ही ऐसे संगीतकार थे, जिन्होंने अपने करियर में देश की उस ग्रामीण जनता को आनंद के साथ मंगल कामना दी, जो भक्ति संगीत में अधिक रुचि रखते हैं। ग्रामीण जनता के साथ शहरी जनता ने भी उनके भक्ति संगीत को सराहा और शिरोधार्य कर लिया। भक्ति संगीत की जो पराकाष्ठा उनके माध्यम से स्थापित हुई है, उसकी बात तो कुछ और ही कही जाएगी। जब कानों में यह अमर स्वर घुलता है-“मंगल भवन अमंगल हारी।” तो आत्मा शीतल होने के साथ निर्मल हो जाती है। रामायण धारावाहिक का संगीत भी उन्हीं की देन है। रामानंद सागर की रामायण में अपने काम को लेकर ईश्वर की सदिच्छा का परिणाम मानते थे और उनका मानना था- “जापर कृपा राम की होई” । उनका रामायण धारावाहिक का शीर्षक गीत से लेकर रामायण में उपस्थित समस्त अर्थपूर्ण गीतों ने जनता का मन मोह लिया था और एक बार फिर समस्त भारत में रामायण की चौपाइयाँ और दोहे जनता के कंठ में विराजित हो गए थे। मुझे याद है, जब मेरे गाँव में टेलीविज़न आया था और उस समय रामायण धारावाहिक के लिए जो भीड़ उमड़ आती थी, वह भीड़ राम जी के प्रति श्रद्धा और आकर्षण वाली कथा के साथ साथ उत्तम संगीत जो रवींद्र जी की देन था, उसके लिए भी मोहित हो जाती थी।

रविन्द्र जैन

रवीद्र जी ने अपने समय में अपना दौर बना लिया था और एक ऐसा दौर जहाँ शांति शीतलता थी और एक ऐसी दुनिया थी जहाँ अपना ही लोकसंगीत मुखरित हो रहा था। उन्होंने माया नगरी की चमक भले ही अपनी आँखों से न देखी हो, लेकिन वे इसकी चमक के मोह और प्रभाव में कभी फंसे नहीं। जो कलाकार ज़मीन से जुड़ा होता है, वह कभी भी अपनी मिट्टी की सुगंध से दूर नहीं जा सकता है। रवींद्र जी इसके एक बड़े सशक्त उदाहरण कहे जा सकते हैं, एक तरफ वह व्यवसायी संगीत की सर्जना करते हैं, तो दूसरी तरफ वे लोक संगीत की धुनों को और गीतों को अपनी कला का आधार बनाते हैं। अपनी धुन में मगन रहने वाले रवींद्र ने एक बार कहा था कि वह संगीत के सुरों को अलग-अलग लोगों को करीब लाने का ज़रिया मानते हैं और अपने गीतों, अपनी रचनाओं से पीढ़ियों, सरहदों और ज़ुबानों के फ़ासले कम करना चाहते हैं। उन्होंने अपने संगीत के के माध्यम से दिलों को जोड़ा है, उनकी गीतों, संगीत में कहीं भी अत्याधुनिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता दिखाई नहीं देता है। वे संगीत को एक साधना की दृष्टि से देखते थे। उनका साफ-साफ मानना था कि संगीत गुरु परंपरा से ही सीखा जा सकता है। 30 से अधिक भाषाओं में गाने वाली मशहूर गायिका हेमलता रवींद्र जी की ही शिष्या हैं। वे संगीत को साधना के द्वारा सीखने और सिखाने के पक्षपाती थे। उनकी रचनाएं भारतीय संगीत जगत की यादगार रचनाएं हैं। वह मानते हैं कि संगीत के लिए धैर्य और साधना की जरूरत होती है। रवींद्र जैन संगीत में शार्टकट तरीके इस्तेमाल करने के पक्षधर कभी नहीं रहे, उनका मानना था कि वास्तविक प्रसिद्धि धैर्य और साधना से ही मिल सकती है। वे भारतीय संस्कृति के पक्षधर थे इसलिए उनका मानना था कि शॉर्ट कट से कहीं भी कोई भी चीज़ हंसिल नहीं की जा सकती है, न ही किसी मंज़िल तक पहुँचा जा सकता है। सत्य संगीत के लिए साधना के पक्ष की गहरी आवश्यकता होती है। इसी दृष्टि से वे एक साधक के रूप में संगीत के क्षेत्र में उभरे और उन्होंने सफलता के कदम चूमे।

रवींद्र जैन जी की संगीत सम्राट तानसेन पर फिल्म बनाने की भी योजना थी, कार्य कहाँ तक पहुँचा इसका तो अंदाज़ा तो नहीं, लेकिन उनकी दृष्टि का पता चल जाता है कि वे इस घोर व्यावसायिक दौर में भी कला और कलाकारों की महत्ता को पहचानते हुए पुनः संसार के समक्ष उनके अप्रतिम योगदान को पुनर्स्थापित करना चाहते थे। उनकी तानसेन को लेकर फ़िल्म बनाने की योजना महत्त्व रखती है लगभग 15 गानों से सुसज्जित फ़िल्म एक अलग ही पहचान बना सकती है, क्योंकि वे उसमे भारतीय संगीत के शास्त्रीय पक्षों के साथ लोकसंगीत को भी लेकर रचनाशील थे। उनकी योजना में था कि तानसेन के दौर को दर्शाया जाए इसलिए उन्होंने तानसेन के गुरुदेव स्वामी हरिदास, सूरदास, मीरा बाई जैसे गीतकार व संगीतज्ञ उसी काल में हुए इसलिए संगीत के इस स्वर्णकाल को रेखाकित करने की कोशिश की की थी। फिल्म की नायिका तानी के सुरों में कुछ लोक गीत कि योजना रखी थी। शेष गीत शास्त्रीय धुनों पर आधारित थे। वे शस्त्रीय संगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते थे,  आज की नई पीढ़ी के लिए वे एक प्रयोगात्मक संगीत देना चाहते थे जो कि संगीत को सहज व ग्राह्य बना सकें। उनका मानना था कि नई पीढ़ी में भी अच्छी प्रतिभाएं आ रही हैं, उनका स्वागत होना चाहिए लेकिन वे आजकल के संगीत से बहुत ज़्यादा संतुष्ट न थे। आजकल के गानों में हो रहे अँग्रेजी के प्रयोगों को अनुचित मानते हुए उनका कहना था कि आजकल तो गानों में गालियों तक का प्रौओग हो रहा है, ऐसे करने से हमारी संस्कृतिक शुचिता कहीं न कहीं मेली हो रही है। उनका मानना था कि अब शास्त्रीय संगीत आधारित कथा न मिलने के कारण अब शास्त्रीय संगीत आधारित फिल्में बनाने का दौर खत्म हो गया है। आज के गीतों में बोल होते ही नहीं जो संगीत उन्हें सवार सके। रवींद्र जैन जी दुनिया भर का संगीत अच्छा मानते थे और उसकी खुलकर सराहना और साथ ही आलोचना भी बराबर करते थे। रवींद्र जी परंपराओं से जुड़े हैं, इसलिए उनकी निष्ठा भारतीय संगीत के प्रति ज्यादा है। उनके कहने के अनुसार कुछ पाक गायकों ने भारतीय संगीत के रागों में वाद्ययंत्रों में थोड़ा परिवर्तन करके उन्हें अपना राग घोषित कर दिया। यह चिंता का विषय नहीं है, क्योंकि संगीत देशों की सीमा से परे होता है। उसे किसी धर्म अथवा जाति में नहीं बांटा जाना चाहिए।

रवीन्द्र जैन हिन्दी फ़िल्मों के जाने-माने संगीतकार और गीतकार थे। इन्होंने अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत फ़िल्म सौदागर से की और भरपूर मात्रा में वे अपने करियर में सफल रहे हैं। हिंदी सिनेमा का एक ऐसा नक्षत्र जिसने अपने नेत्रों से संसार से के उन रंगों को नहीं देखा जिसे सब आँख वाले लोग देख पाते हैं, लेकिन जो रंग उन्होंने अपने गीतों में भरा और सुरों में सजाया वो रंग समय की गति में भी कभी फीके नहीं पड़ सकते हैं। फ़िल्मी सफ़र में उन्होंने नायाब और अविस्मरणीय गीतों की माला गूँथी है, साथ ही भजनों की परंपरा को मुखरित भी किया है। इसी संगीत की अमर देन कारण रवींद्र जी को चौथे सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्मश्री के लिए चुना गया। संगीत संसार का एक अनमोल रतन इस दुनिया से (09/10/2015) अलविदा कर गया। अमर संगीतकार गायक और बेहतरीन इंसान रवीन्द्र जैन जी को श्रद्धांजलि। आज मुम्बई के लीलावती अस्पताल में इस महान, विरल संगीतकार ने अपने जीवन की अंतिम सांस ली, उनकी आयु 71 वर्ष की रही। उनके परिवार में उनकी पत्नी दिव्या जैन और पुत्र आयुष्मान जैन हैं।

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