क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाये जायेंगे……. हाँ जुल्मतों के दौर में ही गीत गाये जायेंगे‘ ….. प्रेम गीत, जिसका हर शब्द इंसानियत के भीतर संवेदना बनकर स्पंदन करने की क्षमता रखता हो | यूं तो निवेदिता की कविताएँ मानवीय पहाड़ से फूटते किसी प्रेम झरने की तरह ही होतीं हैं …. आज, खासकर इस हफ्ते जब प्रेम, उत्पाद के रूप में बाज़ार में सज़ा है तब यह कविता कहीं ज्यादा प्रासंगिक है इंसानी रूप में प्रेम को परिभाषित करते हुए …… | संपादक  

दिल के खोह से बाहर आओ प्रेम  

निवेदिता

निवेदिता

दिल के खोह से बाहर निकल आओ प्रेम
तुम्हें वर्षों पड़े रहने की आदत हो आयी है
तुम ही तो थे जो बरसते थे
और भीग जाता था मन का पोर-पोर
नदिया अब भी बहती हैं
खिलते है कचनार के फूल
विशाल वृक्षों की शाखाएं
चाँद रातों में झुक जाती थी
और भोर होने तक हमारे आँगन महक उठते थे
एक नाजुक त्वचा की गंध
अधखुले ओठ,
हिम जैसे श्वेत फेन में
डूब जाते थे हम
मैं पूछती थी क्या है जो तुम निहार रहे हो
तुम कहते तुम्हारा मन जो
हरे हरे बांस की तरह बज उठा है
हवा गुजरती है सुर के झरने बहते हैं
उठो फिर जन्म लो प्रेम
अपने विषादों से भरे मन से बाहर
देखो मुझे
गहरे-गहरे डूब जाओ
प्रेम

रोहित वेमुला की याद में

साभार google से

साभार google से

गहराई से मुझे सब कुछ कह लेने दो
जो हुआ, जो हो रहा है!
याद करो कि किस तरह हुआ ये
बिलखने दो मुझे
मेरे हिर्दय को छलनी होने दो
झुलस जाने दो
दिखाओ मुझे अपनी पीठ पर कोड़ो के निशान
कह दो हमें भरोसा नहीं है उनपर
नहीं चाहिए रक्त रंजित न्याय
नहीं चाहिए धरती पर बीजों के मृत पुंज
सुनो वो जो कह रहा है
एक वैज्ञानिक की तरह
किसी संत की तरह
उसके रक्त में भीगे ख़त लहरा दो आसमान में
उसकी आवाज की गूंज हमारे निष्प्राण मुखों से बाहर आओ
बाहर आओ प्रेम

ढ़ोलों और नगाड़ों पर
रक्त रंजित
हमारा इतिहास बाहर आओ
आओ ग्रीष्म के गहरे घाव के बीच
रौशनी और अँधेरे के बीच
हलवाहे ,जुलाहे, चरवाहों
के साथ
दुःख से लड़ते
लोगों के साथ
दफ़न हो रहे किसानों के लिए
आओ
उन युवाओ के लिए
जो जिन्दगी को प्यार करते हुए
खुद को ख़त्म कर रहे हैं
उनके खून से भीगी जमीं दिखाओ
और कहो कि नहीं होने देंगे सपनों का अंत
पर क्या हम भूल जाएँ मृत्यु की तरह ले जाने वाली षड्यंत्र करती सत्ता को
क्या भूल जाएँ रक्त की बूंदे
क्यूँकि सिंघासनों से घोषित किया गया की
कोई दोषी नहीं है
क्या हम अब भी उबल नहीं रहे हैं
ओह धिक्कार है
इस मौन पर!
देखो वह हमारे दिल में चमका
देखो वो बाहर आया अटल लहरों के भीतर
हमारी शिराओं में बहते हुए
देखो उसे सितारों में
हवा ने उसके चेहरे सहला दिए
नीली बयार और लौह पर्वतमालाएं दे रहीं हैं थपकियाँ
पृथ्वी जीवित है उसके भीतर
एक खिड़की खुलती है बादलों में
एक नदी चट्टानों के साथ गाती हुयी आ रही है
आकाश में जितने ग्रह हैं
उतर रहें है
हम अब भी पूछ रहे हैं क्या कर सकते हैं ? क्या कर सकते हैं?
हम लड़ सकते हैं अपनी जली हुयी त्वचा से
भीची हुयी मुठियों से
हम सामना कर सकते हैं सत्ता की गोलियों से
हमें याद रखना होगा
उन्हें, जिन्हें जिन्दा जलाया गया
जिनका रक्त बहाया गया, जिन्हें गलियां दी गयी
जिन्हें अपमानित किया गया
क्या पृथ्वी पर कोई आँख नहीं बची जो गवाही दे ….?

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    By: निवेदिता

    4 अप्रैल 1965 में बिहार के गया में जन्मी निवेदिता ने अपने सफर की शुरुआत रंगमंच और छात्र आन्दोलन से की।
    पटना विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एम.ए. किया। माँ इन्दु रानी झा, पिता नीतिरंजन झा की पहली सन्तान।
    पत्रकारिता का लम्बा अनुभव। विभिन्न अखबारों नवभारत टाइम्स, आज, राष्ट्रीय सहारा, नई दुनिया में कई वर्षों तक काम किया। अभी स्वतन्त्र पत्रकार के रूप में दिल्ली, पटना से प्रकाशित होने वाले दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में लेखन का काम जारी। फिलहाल ग्रीन पीस इंडिया में मीडिया कंसलटेंट के रूप में कार्यरत। महिला मुद्दों पर बेहतरीन पत्रकारिता के लिए उन्हें 2010-11 का लाडली मीडिया अवार्ड एवं वन वर्ल्ड अक्षयपात्रा मीडिया अवार्ड 2012 मिला। नेशनल फाउंडेशन ने 1997 में बच्चों की स्थिति पर काम करने के लिए मीडिया फेलोशिप दिया। यूएनएफपीए के तहत विजनरी लीडरशिप फेलोशिप 2004 में मिला। बालिका शोषण की अनकही कहानी – 1999 में बुक फॉर चेन द्वारा प्रकाशित की गयी। केन्या, फिलीपींस, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, भूटान, अरब अमीरात में यात्रा करने के बाद पटना में रह रही हैं।

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