अतृप्त मानवीय इच्छाओं के ऊपर बेहतर ज़िंदगी का भ्रमित आवरण बुनते सुकोमल सपने दिखा कर, इंसानी जज़्बातों से खेलते हुए उन्हें अपने क़ब्ज़े में कर, इस्तेमाल की वस्तु बना लेने की सरल प्रक्रिया का, वर्तमान तकनीकी समय में और मज़बूत होना यक़ीनन चिंतित करता है । हाँ ! घोर नैराश्य के गहन अंधकार में ही हमेशा उजली किरणें भी प्रस्फुटित होती रही हैं यह न केवल वक़्ती ज़रूरत है बल्कि विज्ञान है, इंसानी उद्वेगों का टूट्ते मानवीय धैर्य की पराकाष्ठा के बीच भी पनपते इंसानी प्रेम का । मानव मन के इन्हीं सूक्ष्म मनोभावों से टकराती हुई गुज़रतीं “दीबा नियाज़ी” की प्रस्तुत कविताएँ इस कथन की सामाजिक प्रमाणिकता जान पड़ती हैं । जहाँ राजनैतिक भ्रमजाल को भेदकर, यथार्थपूर्ण सामाजिक सच को देख लेने की वैचारिक क्षमता से भरी हुई युवा दृष्टि साफ़ दिखाई देती है॰॰॰॰॰॰॰। – सम्पादक

१- 

बोलो

दीबा नियाज़ी

प्रेम का यह सीमित अर्थ किसने बतलाया तुम्हें?

कल जब मैंने कहा था

प्रेम है एक साठ साल के व्यक्ति से मुझे

तुमने क्यूँ देखा था मुझे यूँ अजीब से?

प्रेमपूछा हो जैसे मैं नही हूँ अपने हवासों मे

ऐसा क्या कह दिया था मैंने?

बोलो

जब अपनी साथी को मैंने यूँ ही दे दिया था गुलाब

तो क्यू पढाया था तुमने मुझे समलैंगिकता का पाठ?

ऐसा कौन सा प्रेम सूंघ लिया था तुमने उस गुलाब में

जो यूँ सवालिया नज़रों से ताक रहे थे आप?

बोलो

यूँ ही राहों में भूले भटके बच्चों से भी होजाता है प्रेम

कोई सीमा तो नहीं,कोई बंधन तो नहीं

कोमल सा सहज भाव है यह प्रेम

फिर प्रेम का यह सीमित अर्थ किसने बतलाया तुम्हें?

बोलो!

वेलेंटाइन डे पे माँ को दिया था मैंने वो कार्ड

तब तुमने खूब उड़ाया था मेरा उपहास

तुम्हें क्यूँ इतना चुभ गया था वो प्रेम

बोलो

पड़ोस का कुत्ता भी मुझे लगता है बहुत प्यारा

और गली के वो कुत्ते भी

जो होते हैं बहुत आवारा!

क्यूँ पूछते रहते हो मुझसे के यह है कैसा प्रेम?

बोलो

प्रेम का यह सीमित अर्थ किसने बतलाया तुम्हें?

वो हिन्दू लड़का जो लगा था मुझे बहुत प्यारा

तुमने क्यूँ धर्म का सारा ज्ञान मुझपे पेल मारा

धर्म के बंधन में कब बंधा है प्रेम

बोलो

प्रेम का यह सीमित अर्थ किसने बतलाया तुम्हें

क्या प्रेम को तुमने बस लड़का-लड़की से ही पहचाना

उनका मिल जाना,बिछड़ जाना

क्या यही है बस प्रेम का पैमाना

इतना उथला सा अर्थ किसने समझाया तुम्हें?

क्या प्रेम को तुमने बस इतना ही पहचाना?

डूबे ही नहीं कभी तुम प्रेम के इस सागर में

अजी छोड़ो भी,फिर काहे का फसाना

बोलो

प्रेम का यह सीमित अर्थ किसने बतलाया तुम्हें….

२-

सुनो! मैंने दुनिया में जन्नत देखी है

कितने ही रूप में कितनी ही जगह

बिखरी बिखरी सी महकी महकी

मैंने दुनिया में ही जन्नत देखी है।

छोटे छोटे मासूमो की हंसी में मिलती

जो बन के रस कानों में घुलती

कभी उनं आवाज़ों में चहकती

तो कभी छोटी बन्द मुट्ठियों में

बड़े बड़े सपने ले कर यूँ ही उछलती फिरती

मैंने दुनिया में ही जन्नत देखी है

कभी सच्चे से आंसुओं में जो दिल की ज़बां बनते हैं

तो किसी की बेबाक हंसी में

जो आंसुओं में ढलते हैं

आह!कितनी सुंदर मैंने दुनिया में जन्नत देखी है

तुमने देखा है  कभी माँ की आँखों में अपना अक्स?

महसूस भी किया है कभी खुद को पापा की बातों में?

देख के मुझको  डांटती ,लड़ती हंसती इतराती

मैंने दुनिया की जन्नत देखी है

तुमने झाँका है मेहनतकशों की आँखों में कभी?

रोज़ गहरे गहरे उलझते जीवन में

तुमने उनकी सुलझी नींद को देखा क्या कभी?

मैंने उन आँखों में रोज़  बनती बिगड़ती जन्नत देखी है

सुनो तुमने बेज़ुबानों को देर तक छू कर देखा है कभी?

उनके मन की ज़बान को पढ़ा भी है कभी??

उनके खेल में कभी खुद को खोया पाया है

मैंने ऐसी हंसती खेलती जन्नत देखी है..

तुम किस जन्नत की बातें करते हो?

जन्नत के लिए दुनिया में इतना डरते हो

पागल क्या जन्नत भी किसी को डराती है

डरा डरा क भीे कभी सजदे कराती है।

तुम कहते हो दुनिया फ़ानी है

दुःख सुख भूल चलो बनो सन्यासी

के दुनिया एक दिन मिट जानी है

सुनो पागल! यह सब एक झूठी कहानी है

दिल की आंखें खोल कर कभी देखो तो सही

जन्नत यही हैं और हमें यही बनानी है।

दुनिया से डर के जो भाग रहे हैं

दुःख दर्द में डूब के इसे दोज़ख मान रहे हैं

हमें उनको यहीं जन्नत दिखानी है।

क्या करोगे सजदों से पाई जन्नत में जा कर

अकेले अकेले रहोगे ,किसको देख के हंसोग

ख़ुशी ख़ुशी पा कर रोने को तरसोगे

कितना बोर हो जाओगे पागल!

उठो देखो तो सही इस दुनिया की अधूरी सी जन्नत को

कुछ ईंटे तो लगाओ सही,इसे मुकम्मल तो बनाओ सही

यह दोज़ख है चलो यह भरम मिटा दो

हर किसी को यह ज़िंदा जन्नत दिखा दो

जिसके आगे झुकते हो उसे भी बताओ

बहुत डर गए अब थोड़ा उसे भी डराओ

इतराओ कहदो के अधूरी ही सही

पर हमने अपनी जन्नत देखी है

दुनिया में जन्नत देखी है…….

३-   

साभार google से

हाँ उसका रेप हुआ था

क्यूँ क्या हुआ

ऐसा क्या ग्लक्त किया था उसने

बस यही कि उसका रेप हुआ था?

उसका ही नाम ,चेहरा,पूरा अस्तित्व ही

क्यू दुनिया से छिपाया तुमने,

ऐसा करके जानते हो उसे कितना गिराया तुमने

तरह तरह के सवालों से सताया तुमने

बिन गलती के उसका सर क्यू झुकाया तुमने।

क्यूँ हुआ?कैसे हुआ ,कब हुआ

क्यू तुमने इतनी शालीन उत्सुकता से पूछा था

पीड़ा को उसकी बढ़ाने का यह कैसा तरीका तुम्हें सूझा था

इंसानियत को मार एक ही पल में तुम कैसे जानवर हो गए

बस इसलिए के उसका रेप हुआ था?

कैमरे पे उसका नाम तुमने क्यू नहीं लिया था

क्यू पल में ही  अस्तित्व को उसके काल्पनिक किया था

आखिर उसने ऐसा भी क्या किया था

जो छोड़ के अपराधी को तुमने उसे अपराधी बना दिया था

बस यही कि उसका रेप हुआ था?

कौन सी किताब पढ़ी थी तुमने,कौन सा दिमाग लगाया था

जो पीड़ित को  ही तुमने अपराधी बनाया था।

हर पल हर दम छली थी वो

दर्द के न जाने कितने स्तरों से गुजरी थी वो

आख़िर किस बात की सज़ा थी यह

बस यही कि उसका रेप हुआ था?

कैसे एक ही पल में अपवित्र होगयी

उसकी हस्ती कैसे एक ही पल में खो गयी

उसके जीवन पे इतना हक़ तुम्हें कैसे मिला था

क्यूँ के उसका रेप हुआ था?

सुनो हत्यारे हो तुम,हाँ हाँ हत्यारे हो तुम

उसके सपनो ,आकांक्षाओ के हत्यारे

बाप के गर्व के

उसकी माँ की ममता के हत्यारे

भाई के हत्यारे

उसकी जीने की इच्छा के हत्यारे

एक साथ कई हत्याओं से रंगे हैं तुम्हारे हाथ

हत्यारे हो तुम।

वो भी जीना चाहती है बिलकुल तुम्हारी ही तरह

फूलों से,रंगों से,खुशयों से,जीवन से उसे प्रेम है

बिलकुल तुम्हारी ही तरह

क्यू उसके सपनों को रेप के तराजू में तोला?

मार दिया उसको!और आत्महत्या बोला

बढ़ना चाहा जब जब उसने इन अंधेरों से आगे

तुमने क्यू पकड़ पकड़ के उसे पीछे धकेला

उस एक दिन को क्यू तुमने हर दिन दिखाया उसको

मार के उसको क्या मज़ा आया तुमको

छी!हत्यारे हो तुम।

बड़े जोश से कहते हो अपराधी को सज़ा होगी

फिर न किसी महिला की यह दुर्दशा होगी

तो झांको खुद में और लटक जाओ फांसी

क्यू के अपराधी हो तुम

केवल तुम!

एक नहीं न जाने कितनी हत्याओं से रंगे हैं तुम्हारे हाथ

छी!हत्यारे हो तुम….अपराधी हो तुम..

दीबा,”नियाज़ी”,शोधार्थी,अमुवि।

 

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    By: दीबा नियाज़ी

    शोधार्थी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़

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One Response

  1. ओमप्रकाश

    आंसुओ में ढलती जन्नत..!!!

    बेहतरीन कविताएँ

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