क्रूर भूख के अट्टाहास के बीच रोटी के लिए मानवीय संघर्षों के रास्ते इंसानी बेवशी को बयाँ करतीं ‘अनीश कुमार’ की दो कवितायेँ …….

दुनिया बदल गई 

अनीश कुमार

काली रात के
अतल गहराइयों में
टिमटिमाता छोटा सा दिया
उसके झुरमुट में
बेनाम शख्स
एक अदद रोटी के इंतजार में
देहरी से सटकर बैठा है।
काली स्याह रात में
कुत्तो की आवाज
भूख के आगे बौनी हो गई है।
आंख लगातार बंद होने का इंतजार कर रही है
तभी कुछ हलचल होती है
आंख तुरंत उसी ओर गई
शायद कोई रोटी लेकर
सामने खड़ा था
वह शख्स जोर से उठ खड़ा हुआ
आवाज गायब थी
सामने कोई नहीं था
पेट लाचार था
आंखें बेबस थीं
सुबह हुई
दुनिया जैसे बदल गई
मौसम बदल गया
उसके सामने
अब नहीं थी समस्या
खाने की
क्योंकि आंखे बंद थी
पेट शांत था
वह अब इस दुनिया में
नहीं था।।।

भूख का उत्सव 

साभार google से

भूख की आवाज

सुबह-सुबह ज्यादा भयावह होती है

उस भूख का इंतजार करना

और अधिक दुष्कर हो जाता है

देहरी के ऊपर बैठे बच्चों

की भूख की आवाज सुनकर

ऐसा लगता है कि

जैसे उसकी माँ भूख

उत्सव मना रही हो

सुबह-सुबह उठकर जाएगी

वह किसी पतिपावन

ब्राह्मण के यहाँ

बर्तन साफ करेगी,

गंदे कपड़े व पखना साफ करेगी

अपनी नियति मानकर

नित्य की तरह

तब उसे कहीं मिलेगी शाम की बची हुई

रोटियाँ

ये रोटियाँ वह कपड़े में छुपते हुए लाएगी

देहरी पर रखते ही

निढाल पड़े बच्चों की छीनाझपटी

देखकर किसी उत्सव से

कम नहीं लगता

शायद उसकी जिंदगी भी

इसी तरह एक उत्सव बन कर रह गई है भूख की

Leave a Reply

Your email address will not be published.