फारवर्ड ब्लाक आजकल एक दूसरे का कान फोड़ रहे हैं. गरिया रहे हैं अपने पूर्वजों को. सालों और बनो प्रगतिशील और भला करो मनुष्यों का. आदमी को आदमी समझो बहुत बोलते थे अब भुगतो. ‘एमए इन हिंदी’ सांप घुस गया है छाती में. काटता है तो कलेजे में लहर भी नहीं उठती |”  ‘डॉ. कर्मानंद आर्य‘  की व्यंग्य रचना से गुजरते हुए …..

दुलारी बाई @ एमए इन हिंदी  

उदईया पासवान की पहली पीढ़ी ने एमए कर लिया. एमए इन हिंदी. लाड़मान की दुलारी बिटिया विश्वविद्यालय क्या गई गाँव के छिछोरों में हलचल मच गई. खाने को घर में हुआ नहीं बकरी चली भूसा पचाने. सुन्दर, सांवली, सुशील, सभ्य, सौम्य, साक्षर, सतर्क कन्या के भाव ही बढ़ गए हैं. स्टाइल मारने में वह किसी भूमिहार कि कन्या से कम थोड़े ही है बल्कि ऊन ही होगी. लाज शर्म को तो उसने कब का लात मार दिया. शर्माने से उन्नति होती तो लडकियां ‘जिल्ला टाप’ लगने लगती. जमाना बदल गया भाई अपने लोगों का. अब किसका किसका मुंह पकड़े जब पेट कि गैस मुंह से बाहर आ रही है.

फारवर्ड ब्लाक आजकल एक दूसरे का कान फोड़ रहे हैं. गरिया रहे हैं अपने पूर्वजों को. सालों और बनो प्रगतिशील और भला करो मनुष्यों का. आदमी को आदमी समझो बहुत बोलते थे अब भुगतो. ‘एमए इन हिंदी’ सांप घुस गया है छाती में. काटता है तो कलेजे में लहर भी नहीं उठती. सदियों से चौकीदारी करने, मजूरी मारने, चोरी चकारी करने वाली जात अब पढ़ चुकी है ठीक से विश्वास नहीं होता छिछोरो को. अब साला कौन कहेगा कि अहीर साठ साल का हो जाये तब तक बच्चा होता है. चमार की अकल उसके घुटने में होती है. मुसहर का ठिकाना मूस कि बिल तक जाता है. तेली गया तेल लेने. बच्चे पढ़ लिख रहे हैं भाई. अब कोई तेल लेने नहीं जाता. तेल लेने तो अब वही जाता है जो तेल लगाना जानता है. आप ही सोचिये पढाई लिखाई से किसका भला हुआ है? अब ये मत कहियेगा केवल बाभन का हुआ, बनिया का हुआ, ठाकुर का नहीं हुआ. अब केवल सवर्ण ही नहीं एकाध दलित की भी नौकरी लगती है. सफाई कर्मी ही सही. जिसकी लग गई कूदने लगता है असमय. भाई, पढाई के नाम पर ही तो विद्वान् बनाया मूर्खों को. खुद तो पतरा बांच लिया और कुंडली मार बैठ गए मलाई खाने. पंडिताइन को छोड़ दिया अनपढ़. अरे पंडिताइन भी जो दलित ठहरी बस अंतर इतना कि उनके हाथ का खाना खाने से भरष्ट नहीं हुए आजतक.

अब जब उदईया की सुन्दर, सांवली, सुशील, सभ्य, सौम्य, साक्षर, सतर्क होनहार बिटिया ‘दबंग गर्ल’ बन गई तो गाँव के पांडे पुजारी गणेश पर दूध कि धार डालने लगे. प्रार्थना की जगह इस बात का चिंतन होने लगा कि इन मजलूमों को पढ़ने लिखने से कैसे रोका जाय. संगठित योजना बनाई गई कि मजलूमों के मोहल्ले में जाकर मुनादी कर दी जाय कि पढ़ने लिखने से आदमी पागल हो जाता है लेकिन यह नियम ब्राह्मणों पर लागू नहीं है. सौ मर्ज कि एक दवा, हल्दी लगे न फिटकरी रंग चोखा आये. गाँव के मुख्य पुरोहित पंडित धरणींधर शास्त्री, गेवाल बिगहा ने तुलसी के हवाले से यह ज्ञान दिया कि अधर्म उतर आया है धरती पर. अतिशूद्रों के पढ़ने का ही परिणाम है कि नदियों में बाढ़ आ रही है, जलजले उठ रहे हैं, भूकम्प से धरती डोल रही है. किसी ने तो यह अफवाह भी फैला दी कि जबसे ये नीच लोग पढ़ लिख रहे हैं शिक्षा का स्तर गिर गया है. पढाई तो पहले होती थी जब एक खास वर्ग पढ़ता था अब शिक्षा को भी जनरल बोगी बना दो. किसकी मत मारी गई थी जो इनके पढ़ने का प्रावधान कर गया. गरीब गुरबा संस्कृति के दुश्मन बन गए है और यह सौ प्रतिशत सच है कि इन्हीं के पढ़ने लिखने से भारतीय संस्कृति का नाश हो रहा है. विदेशी खानपान, कपड़े लत्ते पहनकर ये बौरा गए हैं. मोबाइल क्या हाथ में आ गया ये खुद को ज्ञान का राजा मान बैठे. ज़माना बदल गया नहीं तो इनकी जात का जो ये पढ़ने का ख्वाब भी देख पाते.

इधर गाँव में खलबली मची हुई है उधर ‘एमए इन हिंदी’ यानी ‘विष्णुवाद, राधावाद, मार्क्सवाद’ में निष्णात कन्या यह नहीं समझ पायी कि आखिर हिंदी में इसके अलावा भी कुछ लिखा पढ़ा गया क्या? हिंदी को डायरेक्टली जातिवादी साहित्य तो कह नहीं सकते. शुक्ल जी के हिंदी साहित्य के इतिहास को तो उत्तरप्रदेश के हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं कहना चाहिए और काल विभाजन को केवल दो ही भागों में नहीं बांटना चाहिए एक- ब्राह्मणकाल और दूसरा शुद्र्काल. ये द्विवेदी काल, शुक्लकाल, शर्माकाल कहने से बच्चों को याद करने में कठिनाई महसूस होती है तो होने दो. कठिनाई भी मजेदार चीज है सिर्फ गरीब गुरबों पर आती है. नामवर को किताब लिखने में आसानी होगी और उनके चेलों से किताब कोई भी खरीद लेगा. हिंदी को जोड़ने वाला विषय होना चाहिए कि तोड़ने वाला यह सीखना हो तो नामवर कि शरण लेनी चाहिए. अरे आप नामवर को नहीं जानते क्या ? घोर कलियुग आ गया है जो आप नामवरों को भूल रहे हो. नानामुखी नामवर, मिस्टर नटवरलाल, मिस्टर इंडिया का तीसरा संस्करण. रामविलास ने जिस जातीय साहित्य कि कल्पना की थी उसका पूरा का पूरा नामवरों में साकार हुआ. भला हो कालीचरण निर्मोही का जिन्होंने अपने दिव्यज्ञान से सुकुमार कन्या को ‘गर्ल विथ दबंग एटीट्यूड’ बना दिया. जाने कितनी कन्याओं का उद्धार उनके हाथों हुआ है. दबंग गर्ल आजकल पीएचडी का सपना पाल रही है. ‘एमए इन हिंदी’ से कुछ नहीं होता.

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