हमरंग प्रतिवद्ध है उन तमाम संभावनाओं से परिपूर्ण कलमकारों को स्थान देने के लिए जो अपनी रचनाओं को लेकर किसी विशिष्टता के विभ्रम में नहीं हैं बल्कि स्पष्ट और प्रयासरत हैं, वेहतर सउद्देश्य रचनाशीलता के लिए | इस कड़ी में आज हमरंग पर स्वागत है अनुकृति झाका जो व्यावसायिक मीडिया के लिए लेख-आलेख लिखती रहीं हैं इधर यथार्थवादी अभिव्यक्ति को शब्द देने की सार्थक पहल के साथ आपने साहित्य लेखन की ओर रुख किया है | आज हमरंग पर मानव निर्मित त्रासदियों की विषम विडम्बनाओं और कराहटों को स्त्री मन के कोमल एहसासों से देखने, समझने और व्यक्त करने का वेहतर प्रयास करतीं आपकी कवितायें …..| संपादक 

दो गज़ ज़मीन 

अनुकृति झा

अनुकृति झा

यह लड़ाई थी दो गज़ ज़मीन के लिए
रोज़ लोग मरते थे, रोज़ लोग लड़ते थे,
कफ़न में लिपटी लाशें, पड़ी रहतीं
और “वो”
रोज़ एक बहस में उलझे रहते,
एक नामियादी बहस में-
महज, दो गज़ ज़मीन के लिए।
एक श्मशान था, या शायद-
एक कब्रिस्तान था।
जी हाँ, बहस यही थी।
आज तक फैसला हो न पाया
कि उस ज़मीं पर-
लाशें जलाई जाएँ या दफनाई
कफ़न में लिपटी लाशें आज भी पड़ी हैं
“उनकी” बात, आज भी,
इसी जिद पर अड़ी है
कि “हम जलाएंगे”,
“अरे नहीं भई! हम दफनायेंगे”
ज़रा देखो उन लाशों को
जो चाहे दफनाई जाएँ या जलाई,
उन्हें मिलना है अब इसी मिटटी में,
जाना है वहीँ, जहाँ
न नाम है, ना ज़मीन की कोई ईकाई
फिर भी बेबस पड़ी हैं,
इसी फैसले के इंतज़ार में-
कहाँ नसीब होगी उन्हें,
दो गज़ ज़मीन।

तेरे मेरे बीच 

तेरे और मेरे सपनों के बीच
एक बात है आम
नहीं शायद “ख़ास”
दोनों ही मिलने से पहले
अक्सर
टूट जाया करते हैं I
और हम
टूटे हुए पन्नों को समेट
युग- युगों से
यूँ ही
अविरल
अबाध
आँखें मूँद
सपनों का ताना- बाना बुन
हर पल, हर छिन
बस एक ही खाब
देखें जा रहे हैं I

तेरे और मेरे सपनों के बीच
काल, क्षण, घड़ियाँ
सब सपाट
सब कोने में दुबक बैठी हैं
तमाशा देखने I
“लो फिर शुरू हुआ ताना- बाना,
रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं,
अभी थक के चूर होंगीं
अभी ढेर होंगी,
टूटेंगें, आह निकलेगी
और फिर चुप” I
बस सपने ही तो हैं
तेरे और मेरे बीच I

वो कहीं नहीं… 

साभार google से

साभार google से

कलाई पर लाल निशान थे
माथे पर कई सलवटें
गर्दन की खरोंच,
ओढ़नी से छुपाए
बैठी थी वो।
हाँ वही… जो कल चहकती, इतराती, बलखाती,
मधुरम गीत गुनगुनाती,
पैर पटकती, नाज़ दिखाती,
बालों को झटकती,
आँखों से बतियाती।
आज…
सहमी, उलझी, सवालों से लङती।
कभी आगे चलती,
कभी पीछे मुङती।
रखा जो कन्धे पर हाथ
डरकर, झुँझलाकर,
उसने की अजनबियों-सी बात।
पीछे कुछ छोङ आई।
दौङती, फाँदती थी,
अब लङखङाई।
हम भूल गए किस राह चली
हम सुन ना सके जो बात कही
वो टीस दबाकर चली गई
हम ताक रहे वो कहीं नहीं…
हम ताक रहे वो कहीं नहीं…

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    By: अनुकृति झा

    जन्म- 03 दिसंबर, 1983 , भागलपुर, बिहार
    पेशेवर लेखिका (विज्ञापन लेखन एवं सम्पादकीय), नयी दिल्ली
    क्षेत्र- कविता, कहानी, लेख, सम्पादन, ब्लॉगिंग, अनुवाद
    सम्पर्क- [email protected]
    फ़ोन- 09711041714

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