सामाजिक ताने बाने में इंसानी जीवन, एकलता और सामयिक स्पंदन का सूक्ष्म विश्लेषण करती माया मृगकी कवितायें….

दौड़ से बाहर 

मायामृग

मैं दौड़ा नहीं पर बाहर नहीं हूं दौड़ से
मेरे हिस्‍से में है एक रास्‍ता, तुम्‍हारे रास्‍तों से अलग
जिसमें नहीं छपे मेरे कदमों के निशान
पर इससे क्‍या—
मैंने परिणामों को परखने में नहीं बिताई उम्र
जानता था दौड़ का एक ही परिणाम तय है—खत्‍म हो जाना।

आसमान की चुनौतियों के बाद भी
मैं नहीं उड़ा
ना ही मैंने मांगे पंख दुआ में
इससे कम नहीं हुआ मेरे हिस्‍से का आसमान
मैं अब भी देखता हूं वहां तक
जहां तक जाती है मेरी नज़र—
तुम भी तो इतना ही देख पाते हो—।

गीलाई छोड़ गया गुज़रा हुआ समन्‍दर
मैं तैरा नहीं
मेरे भीतर भी टकराती रहीं लहरें
मैंने चट्टान नहीं छोड़ी
पर हक नहीं छोड़ा समन्‍दर पर से भी
तुम्‍हारी नाव जितना पानी काटती रही
उतना जोड़ता गया मैं अपने हिस्‍से में—।

कुछ हरा है मेरे भी भीतर
तुम्‍हारे लहलहाते खेतों जैसा
फर्क इतना सा है तुमने बोया, मुझमें उगा
बोया काट लिया जाएगा,
उगा हुआ उगता रहेगा रह रहकर—।

बचाकर रख लिए हैं वक्‍त की तहों में
सांस भर हवा, चुटकी भर आसमान और अंजुरी भर समन्‍दर
हरापन तुम्‍हारे भी हिस्‍से है, मेरे भी
तुम काटने की जल्‍दी में हो
मैं उगने के इंतजार में—-।

सबसे बुरी बात

छोटी सी ज़मीन थी
बहुत सारा पानी
पानी में मछलियां
ज़मीन पर लोग थे, पेड़ थे, घास थी
लोग खुश थे, लोग उदास थे
खुशियों की वजह कुछ नहीं थी
उदासियों की वजह समझ नहीं आती थी….

खुशियों के बीच लोगों ने बनाया एक शब्‍द रचा….’अच्‍छा’
उदासियों के बीच अच्‍छे के खांचे में रखकर देखा हर किसी को
जो नहीं आ सका पूरा..उसे कहा ‘बुरा’
इस तरह अच्‍छे और बुरे से शुरु हुई एक दुनिया…

अच्‍छे को रोज जिया अच्‍छे से
बुरे को लपेट लिया सूखे पत्‍तों में
और रख लिया बचाकर कोटर में, जहां रखी थी सूखी मछलियां
बुरे दिनों के लिए….

देवता रचे, पूजा रची और विधान भी रचे
कामना जगी, वासना जगी और पतन व अवसान भी जगे
देवताओं के लिए गढ़ी प्रार्थनाएं, ऋचाएं और मंत्र
कामनाओं के लिए बनाई गालियां, दुत्‍कार और भर्त्‍सनाएं
देवताओं को जमा दिया पीपल और बड़ के नीचे
कामनाओं को लपेट कर रख लिया प्रेम में
श्रद्धा के कमरे में छिपाकर
जहां रखी थी वासनाएं अकेेले समय के लिए….

गढ़ना भी चल रहा है और बनाना भी
धीरे धीरे समझ आएगा
अच्‍छे को जीना, बुरे के साथ….

‘अच्‍छा’ लोगों की विलासिता थी

और ‘बुरा’ लोगों की चालाकी
इसलिए बुरा बीच से शुरु हुआ
जबकि
बात वहां से शुरु हो सकती थी
जहां ना कुछ अच्‍छा था ना बुरा
थोड़ी सी ज़मीन थी, बहुत सारा पानी
पानी में मछलियां….।

तुम्‍हारी छलनियों ने छाना

तुम्‍हारी छलनियों ने बहुत छाना
मैं छन ना सका
जो छन गया वो जल था
जल होना छन जाना है कि छनकर हो जाना होता है जल
पता नहीं—।

तुम्‍हारी छलनियों ने छाना
छन गई जो हवा थी
सांस भर जो घुला रही, वह आखिरी उम्‍मीद थी
मैं सांस भर गिनता रहा हवा मेंं
एक तीखी गंध थी जो छन छन कर अाती रही
किन छलनियों में छनती है गंध, पता नहीं—-।

छनती गई जो धरती वो मिट्टी थी
मुझे गर्व था हमेशा मिट्टी से उठ जाने का
उंगुलियों की दराज में चिपकी किरचती रही जो
वह रेत किस ज़मीन की थी
अपनी ही धरती पर छनकर गिरे जो, वे कौन लोग थे—।

तुम्‍हारी छलनियों ने छाना
छनकर एक एक गिरते गए सवाल
खदबदाती रही बेचैनियां, मैं सवाल लेकर आया था,
तुम्‍हारे उस दूर देश में नहीं पहुंचते मेरे सवाल
भले ही बरसा देते हो तुम मनोंमन जवाब—।

तुम्‍हारे जवाब खिले रहे पेड़ों पर
चहकते रहे चिड़िया के साथ
तैरते रहे हवा में हवा होकर
घुले रहे जल में जल होकर
बने रहे मिट्टी मेंं मिट्टी के होकर—।

मैं जल नहीं था, ना हवा ना मिट्टी
मैं देखता रहा जवाबों को मुंह फाड़े—-।

मैं कहता तुमसे,
अगर तुम आ सकते छलनियां छोड़कर
तुम सुन सकते अगर मैं आ सकता छलनियों से छनकर
जवाब मिल जाने भर से खत्‍म नहीं हो जाते सवाल
तुम नहीं जान सकते जवाबों के देश में बैठकर—।

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    By: मायामृग

    जन्म – अगस्त २६,१९६५
    जन्म स्थान – हनुमानगढ़, राजस्‍थान
    शिक्षा -एम ए, बीएड, एम फिल (हिन्‍दी साहित्‍य)
    अपने बारे में मायामृग कहते हैं –
    पिछले तकरीबन 20 साल से जयपुर में हूं
    पहले कुछ नौकरियां की, रेडियो में अस्‍थाई, सरकारी स्‍कूल में, एक दो कॉलेजों में पढ़ाया
    अखबारों में काम किया, हैंडीक्राफ्ट के काम से जुड़ा रहा, अब प्रकाशन और मुद्रण के काम में
    लिखने-पढ़ने की आदत रही, पिताजी की पुस्‍तकों के ढेर से धूल झाड़ते पौंछते किताबों से प्रेम हुआ, जो छूटा नहीं कभी
    प्रकाशित पुस्तकें- 1988 में ‘शब्‍द बोलते हैं’ 1999 में “… कि जीवन ठहर ना जाए”
    विधाएं – कविता, कहानी, ललित निबन्‍ध, रेडियो नाटक व व्‍यंग्‍य लेखन
    सम्पर्क- बोधि प्रकाशन, एफ 77, करतारपुरा इंडस्‍ट्रीयल एरिया, बाइस गोदाम, जयपुर – 302006 (राजस्‍थान)
    ईमेल : bodhip[email protected]

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    ‘मायामृग’ की दो कविताएँ….

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